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गाजीपुर: जहां पानी से पनाह मांगते हैं किसान

गाजीपुर जिले का एक इलाका, जहां के किसान मानसून के पहले ही हताश हो जाते हैं.

Shivaji Rai Updated On: Jul 03, 2017 07:33 PM IST

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गाजीपुर: जहां पानी से पनाह मांगते हैं किसान

'छत टपकती है उसके कच्चे घर की फिर भी वो किसान करता है दुआ बारिश की'

किसी शायर का यह शेर इस बात को दर्शाने के लिए काफी है कि बारिश और खेती-किसानी एक दूसरे के कितने पूरक हैं. बारिश के लिए किसान हर जोग-जतन करता है, दंत कथाओं में हजारों उदाहरण भरे पड़े हैं जब राजाओं ने भगवान इंद्र को प्रसन्न करने के लिए हल चलाया ताकि बारिश हो और राज्य के किसान खुशहाल रहें.

लेकिन उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले का एक इलाका ऐसा भी है जहां के किसान मानसून के दस्तक देने से पहले ही हताश और दुखी हो जाते हैं. यहां के किसान चाहते हैं कि बारिश न हो क्योंकि बारिश के साथ ही गांव के उजड़ने का खतरा सिर पर मंडराने लगता है. बारिश की बूंदों को देखकर चेहरे और आत्मा के बीच संतुलन बनाने की हर कोशिश विफल होने लगती है. यह इलाका है मुहम्मदाबाद तहसील के शेरपुर-सेमरा और शिवराय का पुरा का.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

क्या है किसानों की वेदना की वजह? 

किसानों के इस भय को अनायास नहीं कहा जा सकता. गंगा के कटान का सिलसिलेवार इतिहास देखें तो इनकी वेदना सहज समझ आ जाएगी. 2012 से अब तक इस इलाके के करीब 1500 किसान परिवारों के आशियाने छिन गए हैं.

एक अनुमान के मुताबिक, पिछले 4 सालों में करीब 700 एकड़ से अधिक कृषि भूमि गंगा में समाहित हो चुकी है. इस इलाके के ज्यादातर परिवार या अस्थाई आशियाना बनाकर रह रहे हैं या सार्वजनिक भवनों और स्कूलों में बतौर शरणार्थी शरण लिए हुए हैं.

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पिछले साल की बरसात को देखें तो करीब 60 परिवारों के घर गंगा में समा गए. इस भयावहता से इस इलाके के लोगों की चेतना शून्य के करीब पहुंच चुकी है. क्या करें, क्या ना करें के बीच पूरा भविष्य अंधकारमय दिख रहा है. पैतृक संपदा से लेकर पूर्वजों की स्मृतियों तक, सब कुछ धीरे-धीरे गंगा में समाहित हो रहा है. सबके सामने पेट भरने, नई पीढ़ी का भविष्य संवारने और नए ठिकाने की तलाश में भटकने की जद्दोजहद है.

जब जीवन ही नहीं रहेगा, फिर कर्जमाफी किस काम की 

इन किसानों की वेदना समय-समय पर सरकार तक भी पहुंची. पूर्ववर्ती केंद्र और राज्य की सरकारों ने इलाके को बचाने के लिए समय-समय पर प्रयास भी किया. लेकिन आंशिक होने की वजह से सभी प्रयास ढाक के तीन पात साबित हुए. इलाके के किसानों ने केंद्रीय रेल राज्यमंत्री से लेकर राज्य सरकार के मंत्रियों तक गुहार लगा रहे हैं. आश्वासन भी दिया जा रहा है. पर इन किसानों को मजबूत पहल का इंतजार है.

इलाके के किसानों का कहना है कि किसानों को कर्जमाफी का अभयदान देने वाली सरकार को हम किसानों की भी सुध लेनी चाहिए. हम किसानों की वेदना को भी समझना चाहिए. नमामि गंगे और वरुणा, गोमती को साफ-सुंदर बनाने और गंगा में जल परिवहन से पहले हमारे जीवन को बचाने की कोशिश होनी चाहिए. मन की बात करने वाले प्रधानमंत्री जी को हमारी मन की वेदना भी समझनी चाहिए. आखिर जीवन ही नहीं रहेगा तो फिर कर्जमाफी किस काम की!

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