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'मैं एक हिंदुस्तानी मुसलमान हूं, आप मुझसे बात करें न करें आप की मर्जी'

‘इस्लामोफोबिया’ यानी इस्लाम से खौफ. पिछले एक दशक में ये शब्द दुनिया की शब्दावली में घर कर गया है

Updated On: Jul 24, 2018 10:44 AM IST

Naghma Sahar Naghma Sahar

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'मैं एक हिंदुस्तानी मुसलमान हूं, आप मुझसे बात करें न करें आप की मर्जी'

पिछले दिनों ट्विटर पर एक Hashtag छाया रहा- #TalkToAMuslim. एक बार इसकी शुरुआत हुई तो फिर एक के बाद एक हिंदू, मुसलमान दोस्तों की इस पर प्रतिक्रिया और कई जाने पहचाने लोगों की एक प्लेकार्ड के साथ तस्वीर देख कर मेरी पहली प्रतिक्रिया ये थी कि ऐसा क्या हो गया है कि मुसलमानों से बात करने की ज़रूरत आ पड़ी है.

लोगों ने अपनी सेल्फी लगाई जिसमें वो एक तख्ती पकड़े हुए थे जिस पर ये लिखा था मैं भारतीय मुसलमान हूं, मैं आपसे बात करने को उपलब्ध हूं, मुझसे बात कीजिए. और जिन हिंदुओं ने पोस्ट किया उनकी तख्तियों पर लिखा था मैं हिंदू हूं , मैं मुसलमानों से बात करता/करती हूं.

ये Hashtag चौंकाने वाला था और हमारे समय की त्रासदी की एक तस्वीर थी. सवाल है क्या इस तरह के Hashtag सिर्फ सोशल मीडिया का शोशा नहीं है, क्या ये संवाद कायम करने में मदद करेंगे?

हालांकि ये कहना सही है कि इस तरह के सोशल मीडिया Hashtag सारे मुसलमानों को एक खांचे में ढाल देते हैं, और किसी भी समुदाय की तरह मुसलमान भी आपस में एक दूसरे से बहुत अलग हैं. मुसलमानों की पहचान है क्या? टोपी, हिजाब, जिहाद, रूढ़िवादी नजरिया, तीन तलाक या फिर बाकी लोगों की तरह उनके भी रोजमर्रा के अपने मसले हैं जिनका इन बनी बनाई धारणाओं से कोई लेना-देना नहीं है.

मेहमान नवाज़ लोगों का शहर लाहौर

मुझसे कई बार कई लोगों ने पूरी भलमनसाहत से कहा है कि आप मुस्लिम नहीं लगती, मुझे नहीं पता ये अच्छा है या बुरा. ये सवाल भी कई बार हमारे सामने आ जाता है कि आप-हिंदुस्तानी हैं तो मुसलमान कैसे. मुझे याद आता है साल 2003, जब हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच बस सेवा फिर से शुरू हुई थी. उस सदा-ए-सरहद पर बैठकर मैं पाकिस्तान गई थी. लाहौर कहते हैं जिसने लाहौर नहीं देखा वो जिया नहीं. जिंदादिल, मेहमान नवाज़ लोगों का शहर लाहौर. हैरानी तब हुई जब एक रोज हमारे होटल की लॉबी में एक स्टाफ ने बहुत मासूमियत से मेरा नाम सुनकर मुझसे पूछा कि आप तो मुस्लिम हैं, पर हमसे कहा गया था की आप इंडियन हैं, तो फिर आप मुस्लिम कैसे हो सकती हैं?

फोटो रॉयटर से

ये सवाल मुझे हैरान और लाजवाब कर देने वाला था, क्योंकि इससे पहले मैंने ऐसा कभी सोचा नहीं था, लेकिन यही फर्क रहा है पाकिस्तान और हिंदुस्तान में. यहां हमारी पहचान सिर्फ हमारे मज़हब से नहीं रही. हम बराबर के हिंदुस्तानी रहे हैं. फिर अब ऐसा क्या हो गया है कि मुसलमानों को अलग-थलग पड़ने का डर सताने लगा है और इसलिए कुछ लोगों ने अपनी तरफ से TalkToA Muslim जैसी पहल कर दी. हालांकि ये सिर्फ एक तबके तक ही सीमित रहेगा, उनलोगों तक जो अंग्रेजीदां हैं और ट्विटर इस्तेमाल करते हैं. लेकिन ज्यादा बड़ी फ़िक्र है इस पहल के शुरू होने के पीछे की सोच, वो जरूरत. ये फैल रहे इस्लामोफोबिया से लड़ने की पहल के तौर पर शुरू किया गया, भले ही ये और ज्यादा बंटवारा और ध्रुवीकरण फैला गया.

‘इस्लामोफोबिया’ यानी इस्लाम से खौफ. पिछले एक दशक में ये शब्द दुनिया की शब्दावली में घर कर गया है. यूरोप और अमेरिका में हुए आतंकी हमलों में जब इस्लाम धर्म से जुड़े लोगों का नाम आने लगा, जिसमें कई ऐसे इसाई भी थे जो इस्लाम कबूल करके आतंकवाद की तरफ अपनी किसी काल्पनिक लड़ाई पर निकल पड़े थे. जैसे-जैसे ये बढ़ता गया, मुसलमानों की तरफ नफरत बढ़ती गई और फिर इस्लामोफोबिया जैसा शब्द का इजाद हुआ. हिंदुस्तान की सरज़मीन की मिलीजुली तहजीब की अपनी जो खासियत रही है उसकी वजह से यहां ये लफ्ज बहुत दिनों तक अपनी जगह नहीं बना पाया. वैसे भी हिंदुस्तानी मुसलमान अरब, इराक, ईरान के मुसलमानों से बहुत अलग हैं क्योंकि धर्म के अलावा हर जगह की अपनी तहजीब, वहां का रहन-सहन लोगों पर असर डालता है.

इसलिए हिंदुस्तान में हमेशा से मुसलमानों ने दिवाली और होली में दिल खोलकर हिस्सा लिया है, ठीक वैसे ही जैसे हिंदुओं ने ईद और बकरीद में. ये इंटरफेथ इफ्तार का चलन जो इस बार एक फैशन ट्रेंड की तरह नजर आया वो हमने अपने बचपन से देखा है. इफ्तार में दोस्त और पड़ोसी अक्सर शामिल होते थे. सब बिना ज्यादा आडम्बर के मिल जुलकर ही त्यौहार मानते थे. बल्कि बिहार के गांव में जहां छठ खूब धूमधाम से मनाया जाता था, इससे पहले कि उसमें राज ठाकरे और वोट बैंक की राजनीती शामिल हुई और वो दिल्ली और बॉम्बे की गली-गली में बड़े पैमाने पर मनाया जाने लगा, तो मैंने कई ऐसे गरीब मुसलमानों को देखा था, जो सांस्कृतिक वजहों से गांवभर के साथ छठ पूजा में शामिल होते थे.

लेकिन अब इस्लामोफोबिया हिंदुस्तान के ज़ेहन में भी धीरे-धीरे पैर फैलाने लगा है. मुसलमान वोट बैंक तो हमेशा से बनते रहे और इसलिए उनकी एक अलग पहचान बनाई गई, लेकिन अब ये सामाजिक तौर पर भी एक अलग समूह की तरह अलग-थलग से दिखने लगे हैं. और ऐसे में मुसलमान होने का मतलब क्या है.. क्या सर पर लगी सफ़ेद टोपी, बुर्का पहनी औरतें, निकाह हलाला, तीन तलाक़ और मवेशी की खरीद फरोख्त, जिस बहाने गौरक्षा का नया कारोबार चल पड़ा है, यही है मुसलमानों की पहचान?

टीवी पर चल रही सांप्रदायिक बहसों से जो छवि मुसलमानों की बन रही है उसे खत्म करना

मुसलमान इसके अलावा भी हैं.. वो भी हैं जो आम लोगों की तरह पढ़ते लिखते नौकरियां करते हैं, जिन्हें चौबीसों घंटे अपने मज़हब का तमगा अपने सीने पर लगाने की ज़रूरत महसूस नहीं होती, जो छुट्टियों में घूमने जाते हैं, मुसलमान औरतें सिर्फ हिजाब में लिपटी तीन तलाक की मारी नहीं हैं, वो नौकरियां भी करती हैं, गाड़ियां भी चलाती हैं, होटलों में जाती हैं, सिनेमा भी देखती हैं, गाने सुनती हैं.. यानी किसी भी आम इंसान की तरह. फिर क्यों एक स्टीरियोटाइप, एक बनी बनाईं धारणा मुसलमानों के इर्द गिर्द जकड़ती गई.

कुछ ऐसी ही फिजा में शुरू किया गया ये नया Hashtag #TalkToAMuslim. अलीगढ़ के स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष मशकूर अहमद उस्मान इसे इस्तेमाल करने वाले शुरूआती लोगों में रहे. मशकूर उस्मानी से मैंने जब ये पूछा कि ये तो और ध्रुवीकरण कर रहा है फिर इसका फायदा क्या, उनके मुताबिक मकसद था इस्लामोफोबिया या मुसलमानों के खिलाफ फैल रही नफरत से इस ऑनलाइन कैंपेन के ज़रिए लड़ना. टीवी पर चल रही सांप्रदायिक बहसों से जो छवि मुसलमानों की बन रही है उसे खत्म करना. यानी आप आम मुसलमानों को जितना जानेंगे उतना ही उनके खिलाफ बने माहौल में कमी आएगी. लेकिन अफसोस ट्विटर पर ही इसकी वजह से नफरतें और सामने आने लगीं, दो कैंप में बंट गए लोग.

इसके जवाब में #TalkToABrahmin भी शुरू हो गया. इसका मज़ाक बनने लगा. यहां भी नफरत दिखी. क्या इस तरह के Hashtag वाकई मदद कर सकते हैं इस माहौल को बेहतर करने में या फिर ये सिर्फ सोशल मीडिया का शिगूफा हैं. क्या ये हिंदुस्तान के 180 मिलियन मुसलमानों को और ज्यादा हाशिए पर धकेलने की कोशिश है.

देश में पिछले 6 महीनों में 100 हेट क्राइम दर्ज किए गए हैं जिनमें ज्यादातर अल्पसंख्यकों को टारगेट बनाया गया है

देश में पिछले 6 महीनों में 100 हेट क्राइम दर्ज किए गए हैं जिनमें ज्यादातर अल्पसंख्यकों को टारगेट बनाया गया है

सारे हिंदू गौरक्षक नहीं, न ही मंदिर वहीं बनाएंगे का नारा लगाने वाले हैं

पहल इस तरह की होनी चाहिए जो उनलोगों तक पहुंचे जो ज़मीन पर भीड़ की हिंसा का शिकार हो रहे हैं. राजनीतिक तौर पर भारतीय मुसलमान की पहचान उसके रोज़मर्रा की सामाजिक सांस्कृतिक पहचान से बहुत अलग है. सियासत इसे एक समूह की तरह पेश करती है जिसमें सब एक जैसे हैं, हालांकि असल में इस्लाम के अलावा इन मुसलमनों को जाती, जेंडर, अमीरी-गरीबी वैसे ही बांटती है जैसे किसी और मजहब को. आखिर कोई मुस्लिम कैसे है किस बात से यह तय होता है? सियासत इसके लिए बाबरी मस्जिद, तीन तलाक, AMU को माइनॉरिटी दर्जा, यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसे मुद्दों में सीमित कर देती है. ये हरगिज जरूरी नहीं कि तमाम मुसलमान इससे परेशान हों.

लेकिन कांग्रेस जैसी तथाकथित सेक्युलर पार्टी इस ‘असल मुसलमान’ की पहचान को अपने वोट बैंक के लिए इस्तेमाल करते रहे, बीजेपी इसे अपने हिंदुत्व वोट के ध्रुवीकरण के लिए ऐसे में जरूरत है कि मुसलमानों और दूसरे धर्म के बीच संवाद बढ़े लेकिन ये संवाद बिना किसी निगरानी के, बिना सियासत के, खुद बखुद लोगों के बीच होना चाहिए ताकि लोगों को समझ आए कि मुसलमान होने का मतलब सेवई और बिरयानी, हिजाब, जिहाद और तीन तलाक के अलावा भी है और मुसलमनों को समझ आए कि सारे हिंदू गौरक्षक नहीं, न ही मंदिर वहीं बनाएंगे का नारा लगाने वाले हैं. उन लोगों को सामने आने की जरूरत है जमीनी स्तर पर हिंदुत्व के एजेंडे के तहत चल रही भीड़तंत्र से लड़ें.

इसलिए अगर ट्विटर पर ट्रेंड कर रहे इस Hashtag का मकसद अगर अपने कानों में लगे इयरफोन को हटाकर, अपने मोबाइल फोन से नजर हटाकर एक दूसरे से संवाद को बढ़ावा देना है तो बहुत अच्छा है लेकिन अगर इससे सोशल मीडिया का अखाड़ा और ज्यादा सांप्रदायिक हो जाता है जैसा कि पिछले दिनों नजर आया तो फिर अफसोस इसका कोई फायदा नहीं.

मैं एक हिंदुस्तानी मुसलमान हूं और मेरा बचपन होली और दिवाली के रंगों और रौशनी से गुलजार रहा है, जहां हमारे हिंदू दोस्तों को हमसे बात करते हुए कोई बड़प्पन का एहसास नहीं हुआ, हमें कभी ये एहसास नहीं हुआ कि कोई हमसे बात कर रहा है तो शायद ये हम पर एहसान है और हमारा फर्ज है कि हम मुसलमानों के बारे में बनी गलत धारणाओं को खत्म करें. मेरे ख्याल से ऐसे ट्विटर ट्रेंड मुसलमानों को और ज्यादा हाशिए पर ले जाएंगे भले ही उनकी नीयत अच्छी हो. बात तभी बनेगी जब मुसलमान बाकी तमाम लोगों के साथ घुल मिलकर रहेंगे एक विलुप्त होती प्रजाति की तरह नहीं जिन्हें संरक्षण की जरूरत है.

किसी से भी बात करना न गुनाह है न कोई बड़ी बात, वो हिंदू हो या मुसलमान, बड़ी बात है धर्म के नाम पर भीड़ की हिंसा, लोगों की हत्या और नफरत को हाशिए से उठाकर मुख्यधारा में लाने की कोशिश.

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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