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एक ऐसी शादी जिसमें पापा-मम्मी की शादी में बच्चे भी थे बाराती

रांची के जैप-1 ग्राउंड में जब 51 जोड़े सामूहिक विवाह कार्यक्रम के जरिए शादी के बंधन में बंध रहे थे, तो हर कोई अपने में एक कहानी समेटे हुए था

Updated On: Feb 25, 2018 05:22 PM IST

Brajesh Roy

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एक ऐसी शादी जिसमें पापा-मम्मी की शादी में बच्चे भी थे बाराती

सिर पर सेहरा था, आंखों में चमक, दुल्हन पूरी सज-धज के तैयार थी, गोद में बच्चे और हाथ हमेशा के लिए एक-दूसरे को थाम रहे थे. शादी से पहले बच्चे की बात सुन कोई अपनी आंख तरेर सकता है. लेकिन इस सोच से आगे एक नई सोच के साथ अनोखी शादी की गवाह बनी झारखंड की राजधानी रांची. सालों से लिव-इन रिलेशन में रह रहे एक दो नहीं पूरे 51 जोड़ों का सामूहिक विवाह हुआ, उनके रिश्ते को नया नाम मिला.

अनोखी शादी की कुछ झलक

रांची के जैप-1 ग्राउंड में जब 51 जोड़े सामूहिक विवाह कार्यक्रम के जरिए शादी के बंधन में बंध रहे थे, तो हर कोई अपने में एक कहानी समेटे हुए था. एक दुल्हे की उम्र 60 साल थी, तो किसी की 27 साल भी. किसी की गोद में 9 महीने का बच्चा भी था, किसी के बच्चे खुद शादी की उम्र के हो गए हैं. कोई अपने परिवार के साथ शादी करने पहुंचा, किसी परिवार के दो बेटे का ही एक मंडप में विवाह हुआ.

ऐसे नजारे इस अनोखी शादी में दिखते रहे. हालांकि सिर्फ शादी के पीछे की कहानी अनोखी थी, शादी का तरीका पूरी तरह से विधि-विधान से हुआ. नये जोड़ों को एक बक्सा दिये गया जिसमे घरेलू इस्तेमाल और दुल्हन के साज-सज्जा की 21 तरह की सामग्री सौंपी गई. साथ ही सरकार की ओर से 11 हज़ार रुपये की भेंट भी मिली.

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ठुकुआ और ढुकुआ के बीच आदिवासी समाज में लिव-इन परंपरा

आदिवासी समाज में शादी के बाद पूरे गांव को भोज-भात खिलाने की परंपरा है. इसे ठुकुआ कहते है. ऐसा नहीं होने पर शादी पूरी नहीं मानी जाती. और अगर इस ताम-झाम के साथ शादी हो गई तो उसके बाद जब नए जोड़े जब शादी के बाद घर में प्रवेश करते हैं तो उसे ढुकुआ बुलाते हैं. यानी नए जोड़े घर में ढुक गए.

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इन्हीं दो रीति-रिवाजों के बीच आदिवासी समुदाय के कई लोग फंस जाते हैं. खासकर जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती. यहीं से एक ऐसा बेनाम रिश्ता जन्म लेता है जिसे आज की दुनिया लिव-इन रिलेशन के नाम से जानती है. कुछ के लिए ये नया शौक है, लेकिन आदिवासियों के बीच मजबूरी में जन्मीं पुरानी बात है, जो दशकों से चली आ रही है. वो साथ है, पति-पत्नी की तरह जीवन बिता रहे है, बच्चे हैं, पारिवारिक ज़िम्मेदारी है, पर उनके रिश्ते का कोई नाम नहीं है.

शुद्ध झारखंडी विवाहका उदाहरण पेश

दुनिया ने लिव-इन रिलेशन को फिल्मों में देखा, बड़े शहरों ने उसे अपनी लाइफ-स्टाइल में उतारा. पर फिल्मों के इस शुद्ध देसी रोमांस वाली कहानी पर समाज हमेशा सवाल उठाता ही रहा. कुछ लोग सवालों के साथ ज़िंदगी से भागते-फिरते हैं, कुछ बीच में टूट जाते हैं. पर झारखंड के 51 आदिवासी जोड़ों के साथ ऐसा नहीं हो इसीलिए एक गैर-सरकारी संस्था झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी के साथ कई और संस्था ने इस सामूहिक विवाह का बीड़ा उठाया. शादी में आडंबर नहीं सिर्फ परंपराओं से साथ सात जन्मों का बंधन बांधा गया.

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सामूहिक विवाह में जिन जोड़ों की शादी हुई उनमें से 13 ईसाई धर्म को मानने वाले थे, और 38 सरना धर्म के. इसीलिए इनकी शादी भी उन्हीं धर्म के रीति-रिवाजों के साथ हुई. खूंटी के पादरी ने 13 जोड़ों का विवाह कराया जबकि 6 पाहन बाकी जोड़ों का विवाह संपन्न कराया.

रूढ़िवादी सोच को सलाम-नमस्ते

इस अनोखी शादी में 51 जोड़ों के अलावा बड़ी संख्या में उनके जानने वाले बाराती बनकर आए थे. आम लोग भी बड़ी उत्सुकता के साथ इसके गवाह बन रहे थे. पर इन नव-दंपतियों को अपना आशीर्वाद देने खुद राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास भी पहुंचे. दास ने इस शादी के बहाने लोगों से अपील भी कि की अब वक्त आ गया था जब हम रूढ़िवादी सोच को सलाम-नमस्ते कह दे. समाज की बुराइयों की वजह से ही कुछ रिश्तों को उनका नाम नहीं मिल पाता है.

आदिवासी समाज में इसे ठुकुआ बोलते हैं, जिसमें शादी को सामाजिक मान्यता तब ही मिलती है जब पूरे गांव को भोज-भात खिलाया जाए. ऐसा नहीं होने पर शादी नहीं मानी जाती है. इसीलिए गरीब तबके के लोग जो ऐसा आयोजन करने में सक्षम नहीं हैं, उन्हे वगैर शादी के रहना पड़ता था. पर सरकार अब ऐसी प्रथा पर रोक लगाने की वकालत कर रही है. मुख्यमंत्री के मुताबिक जन-आंदोलन के जरिये इसे जड़ से उखाड़ा जा सकता है. साथ ही सरकार इस मामले में नीतिगत निर्णय लेने का भरोसा भी दे रही है.

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गृहस्थी के लिए सरकार रोजगार देगी

सालों से लिव-इन रिलेशन में रहने वाले लोग अब पूरे अधिकार के साथ, बिना किसी शर्म या सवाल के एक छत के नीचे अपनी नयी सामाजिक जिंदगी की शुरुआत करेंगे. इनमे से कुछ लोग मजदूरी का काम करते हैं तो कुछ बेरोजगार हैं. अब इन तमाम जोड़ों को समाज ने एक पहचान दी है, तब सरकार उनकी खातिर कुछ और कदम बढ़ाना चाहती है. नए दूल्हे-दुल्हन की आगे की ज़िंदगी में बाधाएं कम से कम हो, इसके लिए सरकार इन्हें मुख्य-धारा से जोड़ना चाहती है.

मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के तहत आर्थिक मदद के अलावा सरकार ने आश्वासन दिया है कि इन लोगों को रोजगार से भी जोड़ा जाएगा ताकि इनकी आजीविका चलती रहे. साथ ही आदिवासी समाज में विकास कि लौ जलाने की कोशिश होगी ताकी विकास बुराइयों का अंत कर दे.

इस प्रयास की चौतरफा सराहना हो रही है

गैर-सरकारी संस्था झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी के इस प्रयास और दूसरे संगठन के साथ मिलकर इस पहल की हर कोई सराहना कर रहा है. किसी ने शादी का बीड़ा उठाया, किसी ने खान-पान की व्यवस्था की, किसी ने आर्थिक मदद दी. शायद ये हाथ सामने नहीं आते तो इन जोड़ों को ताउम्र बिन शादी के साथ रहना पड़ता.

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खास बात है की न इस संस्था ने सिर्फ आगे बढ़कर अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी निभाई बल्कि 51 जोड़ों के साथ उनके बच्चों के भविष्य को भी कुछ हद तक सुरक्षित करने का प्रयास किया. अब इनके बच्चे मुख्यधारा के साथ पल-बढ़ सकेंगे.

पर ये भी अंत नहीं है. क्योंकि सिर्फ झारखंड में ही ऐसे और कई जोड़े हैं जो सामाजिक वजहों से साथ होकर भी साथ नहीं है. ये प्रयास ऐसे जोड़ों को न सिर्फ सामने लाने में मददगार होगी, बल्कि उनके रिश्तों को भी सामाजिक पहचान दिलाएगी.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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