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पद्मालक्ष्मी और तनुश्री के बहाने: अब तक महिलाओं की तकलीफें सामने लाने वाली भाषा बनी ही नहीं थी

हम चुप रहते हैं क्योंकि ये मान लिया गया है कि समाज में हर बुराई, हर शोषण, हर बलात्कार और हर भेदभाव की वजह औरत और उसका शरीर है

Updated On: Sep 29, 2018 01:08 PM IST

Swati Arjun Swati Arjun
स्वतंत्र पत्रकार

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पद्मालक्ष्मी और तनुश्री के बहाने: अब तक महिलाओं की तकलीफें सामने लाने वाली भाषा बनी ही नहीं थी

जिस वक्त़ मैं भारत की राजधानी दिल्ली से सटे यूपी के एक शहर में बैठकर ये लेख लिख रही हूं, उस वक्त यहां से मीलों दूर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी और पुरानी डेमोक्रेसी अमेरिका की सीनेट ज्यूडिश्यरी कमिटी के सामने पिछले कई घंटों से एक खास केस की सुनवाई हो रही है. ये सुनवाई अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के जज के पद पर काबिज होने के लिए नामित प्रत्याशी ब्रेट कैवेनॉ के खिलाफ चल रही है, जिनपर एक साथ कई महिलाओं ने शारीरिक उत्पीड़न का आरोप लगाया है.

कैवेनॉ को इस प्रतिष्ठित पद के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नामित किया था. ये मामला इस वजह से सुर्खियों में है क्योंकि अगर कैवेनॉ इन आरोंपों से बरी हो जाते हैं तो वे आजीवन सुप्रीम कोर्ट के नौ सदस्यीय लॉ-पैनल के सदस्य बन जाएंगे. ये पैनल वे कानून बनाता है जो अमेरिकी लोगों के सामाजिक जीवन का आधार बनता है. इसके अलावा ये पैनल सरकार के द्वारा बनाए गए कानूनों का विरोध करने का भी काम करता है. इसलिए ब्रेट कैवेनॉ के खिलाफ़ चल रही ये सुनवाई काफी महत्वपूर्ण है.

कैवेनॉ के खिलाफ कई महिलाओं ने शारीरिक उत्पीड़न का आरोप लगाया है, लेकिन उनके खिलाफ कोर्ट के कठघरे में खड़े होकर जिस महिला ने बयान दिया उनका नाम डॉ क्रिस्टीन फोर्ड हैं. फोर्ड पेशे से एक रिसर्च साईकोलॉजिस्ट हैं और उन्होंने आरोप लगाया है कि करीब 36 साल पहले ब्रेट ने उनका यौन शोषण किया था और उस हादसे का उनके जीवन में लंबे वक्त तक काफी प्रतिकूल असर पड़ा था.

लेकिन, चूंकि कैवेनॉ राष्ट्रपति ट्रंप के नुमाइंदे हैं, तो जाहिर है उनके साथ काफी लोग खड़े हैं. फोर्ड के आरोप लगाने के तुरंत बाद, प्रेसीडेंट ट्रंप ने ट्वीट कर सवाल किया कि- वे यानी फोर्ड ने शिकायत करने में इतनी देरी क्यों की? उन्होंने जिस वक्त ये घटना घटी थी, उसी समय पुलिस में रिपोर्ट दर्ज क्यों नहीं कराई? जिसका जवाब पिछले कई घंटों से फोर्ड अमेरिकी सीनेट की एक जांच समिति के सामने अपनी बात रखने की कोशिश कर रहीं हैं.

तनुश्री दत्ता के मामले पर बंट गई है फिल्म इंडस्ट्री

ठीक... इसी समय भारत में भी एक सालों पुराना शारीरिक शोषण का मामला तूल पकड़ रहा है. ये मामला साल 2008 का है, जब पूर्व मिस इंडिया यूनिवर्स और फिल्म अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने भारतीय फिल्मों के मशहूर अभिनेता और समाज सेवी नाना पाटेकर पर उनके साथ अभद्र व्यवहार (सेक्सुअल मिसकंडक्ट) का आरोप लगाया था. उस समय तनुश्री के विरोध और नाना के समर्थन में फिल्म के कोरियोग्राफर गणेश आचार्या, प्रोड्यूसर और डायरेक्टर के अलावा एक दक्षिणपंथी स्वयंसेवक राजनैतिक दल के लोग खड़े हो गए थे. तनुश्री ने तब नाना के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराया था, जो बाद में उन्हें और उनके परिवार को परेशानी में डालता चला गया. उस हादसे के बाद तनुश्री इतनी परेशान हुईं कि वो डिप्रेशन में चलीं गईं, इतना कि कुछ समय बाद उन्होंने अध्यात्म की दुनिया का रुख कर लिया था. उनका फिल्मी करियर भी असामायिक तरीके से खत्म हो गया. लगभग 10 साल के संघर्ष और बोलने की हिम्मत इकट्ठा कर तनुश्री बीते दिनों भारत लौटीं और उन्होंने फिर से उस घटना को जीवित करने की कोशिश की.

ऐसा करने के साथ ही जो पहली प्रतिक्रिया ‘पिंक’ जैसी फ़िल्म को सिर आंखों पर बिठाने वाली फिल्म इंडस्ट्री ने किया वो था- इग्नोर करना. लेकिन, जब मीडिया में तनुश्री द्वारा कही गई बातें जगह बनाने लगीं तो- दूसरा सवाल दागा गया कि वे तब चुप क्यों थीं? तीसरी प्रतिक्रिया जो अमिताभ बच्चन और सलमान खान सरीखे सुपरस्टार्स की तरफ से आया वो ये था कि- ‘न हम तनुश्री हैं, न नाना पाटेकर’ या फिर ये कि ‘हम यहां किसी और काम के लिए आए हैं.’

हालांकि, तनुश्री के मामले में ऐसे सबूत मौजूद हैं, जो ये बताता है कि 10 साल पहले भी उन्होंने इस मुद्दे पर अपना विरोध जताया था लेकिन तब उन्हें और उनके परिवार को डरा-धमका कर चुप करा दिया गया था. लेकिन सबसे अच्छी बात ये रही कि गुजरे जमाने के स्टार्स ने चाहे जो स्टैंड लिया हो, आज के सितारों फ़रहान अख़्तर, सोनम, प्रियंका चोपड़ा और स्वरा भास्कर ने उनका साथ दिया है.

क्यों सालों तक चुप रहती हैं महिलाएं?

सेक्सुअल मिसकंडक्ट न जगह देखता है, न इंडस्ट्री, न ओहदा और न ही समाज. इसी बात की तस्दीक केरल के चर्च में एक नन के साथ 13 से ज्यादा बार हुई रेप की घटना करती है. पीड़ित नन ने जब चर्च के बिशप फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ पुलिस में केस दर्ज कराया तो केरल के विधायक पीसी जॉर्ज, बिशप के समर्थन में उतर गए. उन्होंने सर्वाइवर नन को न सिर्फ वेश्या कहा, बल्कि ये भी कहा कि उसने 12 बार हुए रेप को इंजॉय किया, लेकिन 13वीं बार में विरोध.. ऐसा क्यों?

वापिस, डॉ क्रिस्टीन फोर्ड की तरफ चलते हैं, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फोर्ड के आरोपों के बाद उनसे ही सवाल किया कि उन्होंने अपने साथ हुए इस यौन उत्पीड़न की शिकायत 36 साल पहले क्यों नहीं किया था....तब फोर्ड के समर्थन में मशहूर सुपर मॉडल, लेखिका और शेफ़ पद्मालक्ष्मी सामने आईं. फोर्ड की झिझक, उनकी तकलीफों, उनकी दुविधा, उनकी अक्षमता के साथ खड़े होने की सफल कोशिश करते हुए, पद्मालक्ष्मी ने बताया कि उनके साथ भी 16 साल की उम्र में रेप और 7 साल की उम्र शारीरिक उत्पीड़न किया गया था. 23 की उम्र में उन्हें फिर से शारीरिक आक्रामकता का शिकार होना पड़ा था. एक बेहद ही सफल और हाईप्रोफाइल जीवन जीने वालीं पद्मालक्ष्मी के मुताबिक, उन्हें भी सालों लग गए अपने साथ हुए इन हादसों को अपने पति, पार्टनर्स या थेरेपिस्ट के साथ बांटने में.

पद्मालक्ष्मी ने लिखा है कि- 'जब किसी लड़की या महिला के साथ ऐसी कोई घटना घटती है तो उसे प्रोसेस करने में काफी लंबा वक्त लगता है. क्योंकि हम जिस समाज में रह रहे हैं, वहां अक्सर पीड़ित को ही दोषी मान लिया जाता है और पीड़ित ही गुनहगार भी हो जाता है. ऐसे में आवाज उठाने की हिम्मत काफी देर से आती है.' वो आगे कहती हैं, ‘मेरे साथ पहली बार सात साल की उम्र में, जब मेरी मां के दूसरे पति के एक रिश्तेदार ने गलत हरकत की और मैंने अपनी मां से कहा, तो जवाब में मुझे भारत अपनी नानी के घर भेज दिया गया था, जिसका साफ मतलब था कि अगर तुम बोलोगी तो तुम्हें घर से दूर कर दिया जाएगा.’

दूसरी घटना तब हुई जब वे अपने ब्वॉयफ्रेंड के साथ डेट पर गईं थीं और वहां उसने उनके साथ बलात्कार तब किया गया जब वे सोई थीं. वो एक ‘डेट-रेप’ था, जिसके बारे में बात करना तब चलन में नहीं था. चूंकि, वे उस लड़के को डेट कर रहीं थीं, इसलिए उन्हें समझ में ही नहीं आया कि वो रेप था. उसके अलावा वे बहुत शर्मिंदा और डरी हुईं थी. बाद के दिनों में जो हादसे हुए, उनमें भी चुप इसलिए रहीं क्योंकि उनके सामने अनिता हिल जैसे मामले थे जहां मुंह खोलने पर उनके साथ किया गया घटिया व्यवहार एक डरावना उदाहरण था.

हर महिला अपने जीवन में इस संघर्ष से गुजरती हो, चाहे वो प्रियंका चोपड़ा हों या कोई कस्बाई लड़की

मैं यानी इन पंक्तियों को लिखने वाली महिला जब ये लेख लिख रहीं हूं तो मेरे सामने ऐसी दर्जनों लड़कियों, बच्चियों, बचपन की सहेलियों, साथ काम करने वाली महिलाओं के चेहरे घूम रहे हैं जिनके अनकहे तकलीफ, गुस्सा, बेचारगी और शर्मिंदगी की गवाह, मैं खुद अपने अब तक के जीवन में रही हूं. दुनिया बहुत बड़ी है, लेकिन जो ग्लोबल है वही लोकल भी, इस लिहाज़ से कि महिलाओं की दुनिया एक है, मुझे लगता है कि हमारे संघर्ष भी एक हैं. छोटी-बड़ी-मामूली और हो सकता है काफी गंभीर हादसे हम सभी के जीवन के इस संघर्ष का हिस्सा रहे हैं.

पद्मालक्ष्मी हों या राधिका आप्टे, या फिर प्रियंका चोपड़ा या कोई और, सच ये है कि हमें शुरू से चुप रहना सिखाया गया है. क्योंकि ये मान लिया गया है कि समाज में हर बुराई, हर शोषण, हर बलात्कार और हर भेदभाव की वजह औरत और उसका शरीर है. ये मान लिया गया है कि औरतें उकसाती हैं, फिर चाहे वो 80 साल की हों या आठ महीने की.

हमारी कंडीशनिंग किस तरह से होती है- उसे मैं अपने अनुभव से यहां रखना चाहती हूं. 12-13 की उम्र में जब सभी हमउम्र लड़कियों की तरह मुझमें भी हार्मोनल बदल शुरू हुए और स्कूल में साथी लड़कों के साथ दोस्ती थोड़ी गहरी होनी शुरू हुई तो मन में कई तरह के द्वंद चला करते थे. कभी किसी ने कुछ कह दिया...कभी किसी ने मन के तार छू दिए. मैं उन्हें साइंटिफिक तरीके से समझना चाहती थी. मां के साथ बहुत अच्छे संबंध होने के बावजूद मैंने इतनी सावधानी बरती कि वो सारे सवाल, अपनी किसी फीमेल दोस्त के मन में उठे सवालों, उसकी परेशानियों, उसके साथ हुई घटनाओं के रूप में ढालकर अपनी मां से शेयर करती रही. मां भी कभी ये नहीं समझ पाईं कि जो बातें मैं उनसे कह रही हूं, उससे मेरी कोई दोस्त नहीं, बल्कि मैं खुद जूझ रही हूं. क्योंकि मुझे डर था कि अगर मां को पता चलता है कि वो सब कुछ उनकी बेटी के साथ हो रहा है तो शायद मेरी आजाद जिंदगी में कोई कॉमा या फुल-स्टॉप लग सकता है.

ये सब कुछ तब हुआ जब मैं कमोबेश एक प्रोग्रेसिव परिवार में पल-बढ़ रही थी, लेकिन उसके बावजूद मुझे इस बात का अंदाजा था कि मेरा परिवार बस कहां तक मेरा साथ दे सकता है. मुझे आगे बढ़ना था, पढ़ाई करने के लिए दूसरे शहर जाना था, अपने मेल फ्रेंड्स के साथ दोस्ती बरकरार रखनी थी, तमाम मुश्किलों के बावजूद आज़ाद ज़िंदगी जीनी थी, इसलिए मैंने ये सेफ रास्ता अख़्तियार किया. मैंने अपने साथ होने वाले कई अप्रिय और कई दुविधाग्रस्त घटनाओं का जिक्र कभी अपने पेरेंट्स से नहीं किया.

इज्जत बचाने के नाम पर लुटाई जाती है

दूसरी घटना, मेरी एक दोस्त की है- जिसके साथ उसके ही सगे चचेरे बड़े भाई ने कई दफा रेप किया था, जब हुआ तब वो 11-12 साल की थी, बड़ा पैसे वाला बिजनेस परिवार था, बात खुली, परिवार में हंगामा हुआ लेकिन, फिर बड़ों ने हाथ-पैर जोड़कर, परिवार की इज्जत का वास्ता देकर मामला रफा-दफा कर दिया. सालों बाद वही भाई जब अपनी ही मासूम बेटी के साथ वही सब करता हुआ पाया गया तब जाकर उसकी पत्नी ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई. परिवार की झूठी शान को बनाए रखने के लिए एक घर के भीतर एक पुरूष अपनी बहन, बेटी और पत्नी के साथ सालों रेप करता है लेकिन उन्हें आवाज उठाने की आज़ादी नहीं दी जाती है.

ये दोनों दो आखिरी दूरतम वाले हादसे हैं, जो मैंने आज यहां शेयर करने की कोशिश की है, दोनों ही मेरे जीवन में घटने वाली घटनाएं हैं, जिन्हें मैंने और मेरे साथ कई अन्य महिलाओं ने जिया है. ये बात आज कहनी इसलिए जरूरी हुई ताकि हम दुनिया और दुनिया में नियम कायदे बनाने वालों और फैसला सुनाने वालों के उस वर्ग को ये बता सकें कि अगर लड़कियों के लिए बोल पाना इतना ही आसान होता तो, ‘बोल के लब आज़ाद हैं तेरे’ जैसे आह्वानों की जरूरत पड़ती ही नहीं.

और हां.. पद्मालक्ष्मी ने ये भी लिखा है कि उन घटनाओं को दोबारा याद करने के बाद वे पिछले 4-5 दिनों से बीमार महसूस कर रहीं हैं, उन्हें लगातार उल्टियां हो रहीं और वे निस्तेज सी अकेली बिस्तर पर पड़ी हैं.

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