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जब सबरीमाला केस में भगवान की ओर से दलीलें पेश कर रहे इस वकील के आगे सब चुप हो गए

दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने वकील साई दीपक को दलील पेश करने के लिए 10 मिनट का वक्त दिया लेकिन उनकी दलीलों के चलते उन्हें दो घंटे तक सुना गया

Shishir Tripathi Updated On: Aug 02, 2018 01:33 PM IST

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जब सबरीमाला केस में भगवान की ओर से दलीलें पेश कर रहे इस वकील के आगे सब चुप हो गए

सुप्रीम कोर्ट ने केरल स्थित सबरीमाला मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश को लेकर हाल में फिर से सुनवाई शुरू की है. वरिष्ठ वकीलों की तरफ से अपनी बात रखे जाने के बाद मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने वकील साई दीपक को दलील पेश करने के लिए 10 मिनट का वक्त दिया. इसके तुरंत बाद लंच के लिए अदालत की कार्यवाही मुल्तवी होने वाली थी. दीपक इस पूरे मामले में अहम प्रतिवादी की भूमिका निभाने वाले संगठन 'पीपुल फॉर धर्म' के वकील हैं.

साई दीपक इस बात से भलीभांति वाकिफ थे कि इस मामले में बाकी वकील भी अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं. लिहाजा, उन्होंने अपनी दलीलों को पेश करने के लिए इतना ही वक्त मांगा था. दीपक 'पीपुल फॉर धर्म' के अलावा दो अन्य प्रतिवादियों के भी वकील हैं.

दलील के लिए मिला कुछ मिनटों का वक्त घंटों में तब्दील हो गया

अदालत के लंच के लिए उठने से महज कुछ मिनट पहले उन्होंने एक सामान्य बयान के साथ अपनी दलीलों को पेश करना शुरू कियाः 'मंदिर ने अपना अधिकार जताया है, महिलाओं ने अपना अधिकार जताया है, लेकिन किसी ने सबरीमाला के भीतर मौजूद भगवान के अधिकारों के बारे में नहीं बताया है. और 'भगवान का वकील' तमाम माध्यमों के जरिये अपने 'मुवक्किल' का अधिकार जताना चाहता है.'

अपनी बात शुरू करने के 5 मिनट के भीतर ही उन्होंने ऐसे दलीलें पेश कीं, जिससे सर्वोच्च अदालत की बेंच वकील साई दीपक को विस्तार से अपनी बात रखने के लिए लंच के बाद भी समय देने पर सहमत हो गईं. अतिरिक्त समय के साथ दीपक को सुप्रीम कोर्ट के जजों से इशारों में तारीफ भी मिली. जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन का कहना था कि वह इस वकील की दलीलों को शिक्षाप्रद पाते हैं, जबकि सूत्रों के मुताबिक मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि दीपक ने तर्क और वाक्पटुता दोनों लिहाज से बेहद शानदार तरीके से अपनी बात रखी है. जब लंच के बाद फिर से अदालत की कार्यवाही शुरू हुई, तो यह जाहिर तौर पर नजर आ रहा था कि बेंच दीपक साई से वाकई में प्रभावित है. दीपक ने लगातार दो घंटे तक अपनी बात रखी और इसके बाद अदालत की कार्यवाही उस दिन के लिए स्थगित कर दी गई.

'संविधान के तहत भगवान को भी मिल हुए हैं अधिकार'

एक कानूनी शख्स के तौर पर भगवान के अधिकारों के लिए दलील पेश करते हुए उन्होंने कहा कि सबरीमाला के भगवान अयप्पा को संविधान के अनुच्छेद 21, 25 और 26 के तहत अधिकार है और 'नैष्ठिक ब्रह्मचारी' बने रहने का उनका अधिकार अनुच्छेद 25 के तहत आता है. लिहाजा, मंदिर के भीतर महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी जारी रहनी चाहिए. दीपक ने कहा, 'हकीकत यह है कि किसी ने भी अदालत में भगवान के अधिकारों को पेश नहीं किया और न ही हाड़-मांस के किरदार के नजरिये से भगवान के अधिकार को मूर्त रूप दिया गया. यह अधिकार पहले से अस्तित्व में है और कानून के तहत मान्यता प्राप्त है. और शायद यही वजह है कि अदालत में इतने लोगों की मौजूदगी है.'

दीपक ने अदालत में 50 पेज की लिखित प्रस्तुति सौंपी, जिसमें इस संदर्भ में कई अदालती फैसलों का हवाला दिया गया है. इसमें कहा गया है, 'उपरोक्त फैसलों से जाहिर है कि भगवान अयप्पा का भी चरित्र भी हिंदू लॉ के तहत कानूनी शख्स की तरह है, जिसकी (हिंदू लॉ) मान्यता माननीय सर्वोच्च अदालत की तरफ से मिली हुई है.' इसमें आगे बताया गया है, 'नतीजतन, भगवान को एक शख्स की तरह संविधान के अनुच्छेद 25(1), 26 और 21 के तहत अधिकार हासिल है. भगवान 'अपने निवास स्थान के मालिक' के तौर पर अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार के भी हकदार हैं.' इसमें उनके कौमार्य स्वरूप के संरक्षण का अधिकार भी शामिल है... यानी उनके पास नैष्ठिक ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा के पालन का हक है.'

साई दीपक.

साई दीपक.

'परंपरा के जरिये भगवान की इच्छा का संरक्षण'

साई दीपक की तरफ से पेश लिखित दस्तावेज के मुताबिक: 'मंदिर की परंपरा के जरिये भगवान की इच्छा का संरक्षण किया जा रहा है, जो दरअसल संविधान के अनुच्छेद 26 का मामला है. कुल मिलाकर, भगवान को भी संविधान के अनुच्छेद 25(1) की तरह किसी अन्य शख्स की तरह अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है और राज्य का कर्तव्य बनता है कि उनकी आस्था का संरक्षण किया जाए. इन चीजों को ध्यान में रखा जाए तो जाहिर तौर पर संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत भगवान के अधिकार पर याचिकाकर्ता का अधिकार हावी नहीं हो सकता. दरअसल, उन्हें भगवान के अधिकारों के सामने निश्चित तौर पर गौण हो जाना चाहिए.'

सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानक बेंच इस मामले में इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन और अन्य की तरफ से दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है. इन याचिकाओं में सबरीमाला मंदिर के भीतर महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को चुनौती दी गई है. इस सिलसिले में महिलाओं के अभियान को उस वक्त बढ़ावा मिला, जब 18 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि केरल के इस मंदिर में सबको प्रवेश की इजाजत दी जानी चाहिए, क्योंकि प्राइवेट मंदिर का कोई कॉन्सेप्ट नहीं है और मंदिर के गर्भगृह के भीतर महिलाओं के प्रवेश को लेकर तीसरे पक्ष का नियंत्रण नहीं होगा.

क्या सबरीमाला के भीतर महिलाओं के प्रवेश का विरोध पुरातनपंथ और पिछड़ेपन का मामला है?

सबरीमाला केस ने अपनी तरफ काफी ध्यान आकर्षित किया है. अब यह सुनवाई के अपने अंतिम चरण में है. यह लंबे समय से बहस का विषय रहा है और मामले को अक्सर सीधे तौर पर दो भागों में विभाजित कर दिया जाता है यानी जो महिलाओं के पक्ष का समर्थन कर रहे हैं, उन्हें 'प्रगतिशील' और 'आधुनिक' के तौर पर देखा जाता है और जो लोग मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक की बात कर रहे हैं, उन्हें 'पुरातनपंथी' और 'रूढ़िवादी' करार दिया जा रहा है.

इस संदर्भ में सवाल यह उठता है कि क्या युवा वकील को इस बात की आशंका नहीं थी कि 'पुरातनपंथी' और 'गलत' पक्ष की तरफ होने या 'दक्षिणपंथी' होने के लिए उनकी आलोचना की जाएगी? दीपक ने कहा, 'अगर किसी वकील की किसी मामले के पक्ष में खड़ा होने और अपने प्रोफेशनल मूल्यों के हिसाब से वह सब करने के लिए आलोचना की जाती है, जो उसे करना चाहिए, तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी.' उनके मुताबिक, 'अगर सैकड़ों हत्या करने वाले एक आतंकवादी को निष्पक्ष ट्रायल और अलग-अलग चरणों में कई सजाओं के बाद मध्यरात्रि में सुनवाई का हक है, तो निश्चित तौर पर भगवान का भी प्रतिनिधित्व किया जा सकता है.'

इस वकील का कहना था, 'हमने अदालत में कहा कि हमने जो रुख अख्तियार किया है, वह कई मायनों में राजनीतिक दृष्टि से सही नहीं है. मैंने कहा कि अदालत संवैधानिक मामलों को इस नजरिये या भावनाओं के चश्मे से नहीं देख सकती. अगर पैमाना संवैधानिक नैतिकता है, तो संविधान के नजरिये से मुद्दे का विश्लेषण कर और संविधान के चार खंभों के भीतर न्याय दिया जाए. बात बस इतनी सी है. '

वकील ने खुद से अदालत को बताया कि वह 13 साल की उम्र में दर्शन के लिए सबरीमाला मंदिर आए थे. उनके मुताबिक, वह 41 दिनों के व्रत के बाद मंदिर पहुंचे थे. जाहिर तौर पर वह सबरीमाला के भक्त हैं. हालांकि, उन्होंने यह साफ कर दिया कि सबरीमाला को लेकर अपनी भक्ति के बावजूद वह इस मामले में निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ होते हुए अपने केस के पक्ष में कानूनी दलीलें पेश कर सकते हैं. उन्होंने बताया, 'कई लोग इस मामले को हिंदू धर्म पर हमले के तौर पर पेश करने और इसे अलग मोड़ देने लालायित हैं. एक क्षण के लिए हम मान लेते हैं कि अगर ऐसा भी है भी तो हमें इस परंपरा की कानूनी वैधता के बारे में अदालत को संतुष्ट करना होगा.'

सबूतों के आधार पर चलती है अदालत, लेकिन विरोधी पक्ष के पास बातों के अलावा कोई प्रमाण नहीं

दीपक का यह भी कहना था कि मंदिर के पक्ष का समर्थन कर रहे लोग मंदिर की परंपराओं, रिवाजों आदि के बारे में काफी लिखित सामग्री पेश कर रहे हैं, जबकि दूसरे पक्ष ने बिना किसी दस्तावेज के असरदार तरीके से अपनी बात रखने की कोशिश की है. उनका मानना है कि कानूनी बहस में इस तरह के तरीके का टिकाऊ आधार नहीं हो सकता.

इस मामले में जिस तरह से बहस आगे बढ़ी, उन्होंने इस बात को लेकर भी दुख है. दीपक ने कहा, 'इस केस में मीडिया ने बहस को बेहद खराब स्तर पर पहुंचा दिया है. जहां हमें इस मामले की सूक्ष्मताओं पर सोचने के बारे में विचार करना चाहिए, वहीं अधकचरे विश्लेषण के साथ इस मामले को अशिष्ट और सतही बना दिया गया. इससे न तो लैंगिक समानता और न ही न्याय के लिए गुंजाइश बनती है. यह दिखाता है कि आप संरक्षक की टोपी पहनकर इस संबंध में भीड़ जुटाने की उम्मीद कर सकते हैं, क्योंकि जिस मुद्दे को लेकर सतही आधार पर आप दलील पेश कर रहे हैं, उसमें राजनीतिक औचित्य होता है, जिसके कारण दूसरे पक्ष को रक्षात्मक रवैया अपनाना पड़ता है.'

उन्होंने आगे कहा, 'हालांकि, हमने रक्षात्मक नहीं होने का विकल्प चुना और परिस्थितियों से उपजी चुनौतियों का डटकर सामना करने का फैसला किया. पहले यह बताया जाए कि इसमें बुरा क्या है. मेरा पक्ष यह था कि एक ऐसा मुद्दा, जिसमें सबूतों के मामले में सटीक जानकारी और सघन पड़ताल (जैसा कि इस अदालत द्वारा कुछ फैसलों में जरूरी बताया गया) की जरूरत है, उसे दुर्भाग्य से मोटे हथौड़े से काम निपटाने वाले रवैये से निपटा जा रहा है. यहां लैंगिक समानता (जो कभी सर्जरी अंजाम देने वाल चाकू हुआ करता था) अब बड़ा और भोथरा हथौड़े की तरह बन चुका है. मुझे अब ऐसा लगता है कि जिन्होंने इस मामले की बारीकियां समझने से मना कर दिया, उन्होंने लैंगिक समानता के अहम विषय को काफी सतही बना दिया है.'

दीपक ने बताया कि इस तरह के मामलों में किस तरह से विस्तार से विश्लेषण करने की जरूरत है. उनका कहना था, 'जब मैंने जरूरी धार्मिक परंपरा (सबरीमाला मंदिर) का जिक्र किया, तो मुझे याद है कि अदालत ने कहा कि उससे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह धर्मशास्त्री के रोल में आ जाए, मैंने कहा कि अदालत काफी लंबे समय से इस रोल में है, कम से कम 1954 से... लिहाजा यहां मुद्दा यह है कि अगर आप धर्मशास्त्री की टोपी नहीं पहनना चाहते, तो इसके आधार को समझे बिना आप इस परंपरा पर किस तरह से टिप्पणी कर सकते हैं?'

इस वकील ने दावा किया कि इस मामले में पूरी बहस को लैंगिक न्याय के विषय के तौर पेश किया. उनका मानना है कि इसकी बजाय संबंधित पक्षों को यह समझने की कोशिश करनी चाहिए थी कि दूसरा पक्ष कहां से आ रहा है और उसके बाद यह सवाल उठता है कि क्या यह मामला भेदभावपूर्ण है या इसकी स्थिति पूरी तरह से अलग है.

दीपक के मुताबिक, 'मैं इस मामले के आध्यात्मिक रहस्यों में और आगे जा सकता था, लेकिन इससे मैं संवैधानिक नजरिये से सवालों के जवाब नहीं दे पाता.' उन्होंने कहा, 'इसका दिलचस्प पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में कहा गया है कि जब आप इस तरह के रिवाजों को देखते हैं, तो उसकी बुनियाद, आधार और उत्पत्ति को समझने की कोशिश करें. लिहाजा, अगर मैं इस रिवाज के आध्यात्मिक रहस्यों (सबरीमाला से मंदिरों को बाहर रखने का मामला) में भी जाता, तो मैं तब भी संविधान और उसके विश्लेषण के दायरे में बात कर रहा होता.'

इस मसले पर बातचीत के दौरान दीपक ने इस तथ्य के खिलाफ लड़ने की जरूरत पर बल दिया कि सबरीमाला के भीतर महिलाओं के प्रवेश को लैंगिक समानता का मामला माना जाता है. उन्होंने दावा किया कि अगर यह केस 100 साल पहले या 50 साल पहले भी लड़ा जाता, तो यह बात मानने की कुछ वजह हो सकती थी कि महिलाओं को मदद और दासता या अधीनता से मुक्ति की जरूरत है.

दीपक कहते हैं, 'हालांकि, 2018 में किसी के लिए यहां तक कि याचिकाकर्ताओं का यह मानना कि वे महिलाओं के रक्षक के तौर पर काम करते हैं, मेरी राय में पित्तृसत्तात्मक, दूसरों को नीचा दिखाने वाला और अपमानजनक है, खास तौर पर किसी स्वतंत्र महिला को लेकर, जो कहती है कि उसे सबरीमाला के रिवाज के बारे में पता है और उसे इस बारे में गुमराह नहीं किया गया.'

दीपक ने 2009 में इंजीनियरिंग कोर्स को खत्म करने के बाद वकील बनने का फैसला किया. उनके मुताबिक, उन्होंने अपने करियर में इसलिए बदलाव किया, क्योंकि वह अपने आयु वर्ग के कुछ अन्य लड़कों की तरह 'उस राजनीति विमर्श से गंभीर रूप से प्रभावित हुए, जिसमें अचानक से तेज बदलाव हुआ और धीरे-धीरे यह सिलसिलेवार ढंग से आत्म-घृणा में परिवर्तित हो गया.' वह कहते हैं, 'मैंने महसूस किया है कि विचाराधारा और सिद्धांत के नाम पर लोगों के दिमाग में कई नकारात्मक चीजें डाली जा रही हैं. मुझे लगा कि मैं विचारधारा के नाम पर थोपी गई इन चीजों के बारे में असरदार ढंग से अपनी बात पहुंचाने में समक्ष हो सकता हूं.'

उन्होंने बताया, 'मेरे इस केस को लड़ने की एक प्रमुख वजह यह थी कि इसके जरिये इस तरह की छवि बनाई जा रही है कि यह मंदिर और महिलाओं के बीच लड़ाई है और मंदिर पुरुषों के दबदबे वाला ठिकाना है. मैं इस तर्क को पूरी तरह से खारिज करना चाहता था. '

दीपक के मुताबिक, 'मजेदार बात यह है कि जो लोग सबरीमाला में प्रवेश के अधिकार की मांग को लेकर अदालत पहुंचे, उन्होंने मंदिर के रिवाज के तहत अंधविश्वास के मामले को कम कर दिया. ऐसे में हमारी तरफ से यह पूछा जा सकता है कि क्या वे उस भगवान में विश्वास करते हैं, जिनकी पूजा करने का अधिकार वे हासिल करना चाहते हैं?'

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