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केदारनाथ त्रासदी के पांच साल: धीरे-धीरे ही सही भरने लगे हैं जख्म

इस गहरे जख्म पर समय अपना मरहम लगा रहा है. धीरे-धीरे ही सही अब यहां जिंदगी पटरी पर लौटने लगी है

Mayuri Patel Updated On: Jun 16, 2018 01:06 PM IST

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केदारनाथ त्रासदी के पांच साल: धीरे-धीरे ही सही भरने लगे हैं जख्म

पांच साल पहले वह जून का ही महीना था, जब केदारनाथ में प्रकृति के रौद्र रूप को देखकर भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया दहल उठी थी. 16 और 17 जून की रात को 12 ज्योर्तिलिंगों में से भगवान शिव के दर्शन करने आए तीर्थयात्रियों पर मानो कहर ही टूट पड़ा हो. देखते ही देखते 5 हजार से ज्यादा जानें चली गईं. हजारों बेघर हो गए. पांच साल बाद भी इस त्रासदी के बारे में सोचकर यहां के लोगों की रूह तक कांप जाती है, लेकिन इस गहरे जख्म पर समय अपना मरहम लगा रहा है. धीरे-धीरे ही सही अब यहां जिंदगी पटरी पर लौटने लगी है.

मंदाकिनी नदी के किनारे स्थित आठवीं सदी के इस मंदिर तक पहुंचने के सारे रास्ते त्रासदी ने बर्बाद कर दिए थे. पटरी पर लौटने की कोशिश में राहत कार्य और पुनर्निर्माण अभी भी यहां जारी है. मंदिर के साथ दीवारें भी बना दी गई हैं. त्रासदी के वक्त अपनी दहाड़ से डराने वाली मंदाकिनी नदी आज शांत गति से बहती दिख रही है. नदी के किनारे नहाने के लिए घाट बना दिए गए हैं. नदी पर एक छोटा सा पुल बना दिया गया है, जिसे पार करते ही आप मंदिर परिसर में आ जाते हैं. यहां पुनर्निमाण के काम के बावजूद त्रासदी के निशान आसानी से दिख जाते हैं.

लौट रही है पुरानी रंगत

अब केदारनाथ में बहुत सारे नियम बना दिए गए हैं और पहले की तुलना में यह ज्यादा साफ भी दिख रहा है. इस शहर में इसकी पुरानी रंगत लौटने लगी है. बाढ़ में ढह गए होटल, लॉज अब फिर से खड़े होने लगे हैं और खाने के बहुत सारे स्टॉल्स भी आपको मिल जाएंगे.

सभी यात्रियों का पंजीकरण जरूरी

सोनप्रयाग से केदारनाथ तक के रूट पर प्रशासन की कड़ी निगरानी है. यहां आने वाले प्रत्येक यात्री को अपना पंजीकरण कराना जरूरी है. हरिद्वार से सोनप्रयाग तक जगह-जगह पर कई केंद्र बनाए गए हैं ताकि यात्रा के लिए आने वाले सभी श्रद्धालुओं का रिकॉर्ड रखा जा सके. अगर कोई चाहे तो आॅनलाइन पंजीकरण भी करा सकता.

'कोई सरकार जिंदगी का मुआवजा नहीं दे सकती'

इसी बाढ़ में तबाह हुई लॉज के मालिक ने फिर से इसे खड़ा तो कर दिया है, लेकिन वह आज भी उस भयावह दिन को याद नहीं करना चाहते. वह कहते हैं, 'मैं उस दिन को याद नहीं करना चाहता. कितने लोग मारे गए, कितने लापता हो गए, अभी तक सही अंदाजा नहीं है. मेरी लॉज की उपरी मंजिल त्रासदी में बह गई थी. अब मैंने इसे दोबारा बना लिया है. जिंदगी को फिर से पटरी पर लौटाने के लिए सरकार ने मदद जरूर की है, लेकिन कोई भी सरकार हमारी जिंदगी में हुए नुकसान की भरपाई नहीं कर सकती.'

आज वो चट्टान ही बनी भगवान

बाढ़ में इमारतें, दुकानें सब बह गई थीं, लेकिन बड़े से पत्थर ने केदारनाथ मंदिर को बहने से बचा लिया था. आज श्रद्धालुओं के लिए वही पत्थर भी भगवान बन चुका है. यहां आने वाले लोग मंदिर में दर्शन से पहले यहां सिंदूर, प्रसाद चढ़ाते दिख जाएंगे. यह भी एक इत्तेफाक ही है, यह पत्थर मंदिर के पीछे आकर रुक गया, लेकिन अगर यह नहीं होता तो शायद आज केदारनाथ मंदिर भी नहीं होता. स्थानीय लोगों ने अब प्रकृति के उस रौद्र रूप को स्वीकार करते हुए तब मिले जख्मों के साथ जीना सीख लिया है. पहले गौरीकुंड से केदारनाथ तक सैकड़ों खच्चर, पालकीवाले श्रद्धालुओं को ले जाते दिख जाते थे. मगर 2015 के बाद 21 किलोमीटर का पूरा नया रूट तैयार कर दिया गया है. अब इस पूरे रूट को बदल दिया गया है, जो पहले की तुलना में थोड़ा लंबा है.

खौफनाक कहानियों से मन सिहर रहा था

इस तीर्थ स्थल पर दर्शन करने की इच्छा लंबे समय से थी, लेकिन बाकी लोगों की तरह मेरा मन भी त्रासदी की खौफनाक कहानियां से सिहर उठता था. फिर भी मैं वहां जाना चाहती थी और हिमालय की शांति को महसूस करना चाहती थी. केदार वैली पहुंचकर प्रकृति की खूबसूरत तस्वीर के बीच में रुक-रुककर उसका खौफनाक चेहरा भी याद आ रहा था. स्थानीय लोगों के लिए यहां का जीवन कतई आसान नहीं है. उनके लिए आजीविका का एकमात्र साधन केदारनाथ के दर्शन करने आए श्रद्धालु ही हैं.

हेलीकॉप्टर से दर्शन करने वालों की संख्या बढ़ी

त्रासदी के बाद यहां हेलीकॉप्टर से दर्शन करने वालों की संख्या में जरूर बढ़ोतरी हो गई है. लोग यहां ज्यादा समय तक रुकना नहीं चाहते, ऐसे में गुप्तकाशी से केदारनाथ की यात्रा महज दस मिनट में पूरी हो जाती है, जिससे उन्हें मंदिर घूमने के लिए 2 से 3 घंटे आसानी से मिल जाते हैं. हालांकि अभी भी बहुत से यात्री पैदल या खच्चर पर ही यात्रा कर रहे हैं.

जिस लॉज में मैं ठहरी थी, उन्होंने बताया कि स्थानीय लोगों को मुआवजा तो मिला है, लेकिन उन्हें फिर से निर्माण की अनुमति नहीं दी गई है. बीते कुछ साल में यहां काफी कुछ बदल गया है. जीएमवीएन ने कॉटेज का निर्माण कर दिया है और सरकार ने श्रद्धालुओं की मदद के लिए छोटा सा कैंप भी बना दिया है, जहां वे रात में रुकने के लिए स्लीपिंग बैग मुहैया कराते हैं.

कुछ मीडियाकर्मियों से बात हुई तो उन्होंने बताया कि केदारनाथ मंदिर से हर रोज सीधा प्रसारण किया जाता है. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री खुद यहां के पुनर्निर्माण कार्यों की निगरानी कर रहे हैं. उन्होंने यह भी बताया कि मंदिर के आसपास बनी दुकानों को हटाया जाएगा और दर्शन के लिए विशेष इंतजाम किए जाएंगे. प्रशासन मंदिर के परिसर का भी विस्तार करने की तैयारी में है.

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