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संसदीय जांच समिति ने 4 साल पहले कहा था- 2G घोटाला हुआ ही नहीं

2014 के लोकसभा चुनाव की राजनीतिक तैयारियां शवाब पर थीं. इन सबके बीच अगर किसी चीज की सबसे अधिक चर्चा थी तो वह था- 2जी घोटाला

Updated On: Dec 21, 2017 12:41 PM IST

FP Staff

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संसदीय जांच समिति ने 4 साल पहले कहा था- 2G घोटाला हुआ ही नहीं

2014 के लोकसभा चुनाव की राजनीतिक तैयारियां शवाब पर थीं. इन सबके बीच अगर किसी चीज की सबसे अधिक चर्चा थी तो वह था- 2जी घोटाला. सीएजी की रिपोर्ट के बाद इस मामले में आ चुकी थी 2जी घोटाले की जांच करने वाली ज्‍वाइंट पार्लियामेंट्री कमिटी की रिपोर्ट भी. इस कमिटी के प्रमुख और केरल से कांग्रेस सांसद पीसी चाको ने 500 पन्‍नों की अपनी रिपोर्ट संसद में पेश कर दी थी. इस रिपोर्ट में समिति ने 2जी स्‍कैम को स्‍कैम ही नहीं माना गया था. आपको बता दें कि पार्लियामेंट्री कमिटी की रिपोर्ट उतनी ही अहम मानी जाती है, जितनी संसदीय रिपोर्ट.

चाको ने संसद के पटल पर रिपोर्ट सौंपने के बाद तत्‍कालीन मुख्‍य विपक्षी दल भाजपा समेत सभी दलों से इस पर चर्चा करने के लिए कहा था, लेकिन चाको का दावा था कि विपक्ष इस रिपोर्ट पर चर्चा के लिए तैयार ही नहीं हुआ, क्‍योंकि रिपोर्ट में घोटाले जैसा कोई मामला बन ही नहीं रहा था और अगर रिपोर्ट पर चर्चा होती तो संभव था कि मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ विपक्ष के चुनाव अभियान का जो आधार था, यानी 2जी स्‍कैम, उसकी कलई खुल जाती.

हालांकि टेलीकॉम मंत्री ए राजा के जेल जाने के सवाल पर कांग्रेस ने उस समय भी स्‍वीकारा था कि स्‍पेक्‍ट्रम आवंटन के लिए आवेदनों की प्राथमिकता को नजरअंदाज करते हुए फर्स्‍ट कम फर्स्‍ट सर्व बेसिस पर अनियमितताएं ही मनमोहन सरकार के लिए जानलेवा साबित हुईं. गौरतलब है कि कैग की रिपोर्ट से ही यह मामला लाइमलाइट में आया और फिर राजनीतिक मुद्दा बन गया. कैग की रिपोर्ट में 2जी स्‍पेक्‍ट्रम को कम कीमत पर और ऑक्‍शन के आधार पर नहीं बेचने का आरोप लगाया गया था. तत्‍कालीन कांग्रेस सरकार ने भी माना था कि राजा द्वारा अपनाई गई फर्स्‍ट कम फर्स्‍ट सर्व पॉलिसी त्रुटिपूर्ण थी.

चाको ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि देशभर में 2जी लाइसेंस के लिए सरकार द्वारा 1650 करोड़ रुपए की प्राइस तय की गई थी. वास्‍तव में यह ट्राई द्वारा अनुशंसित फीस थी. अब सवाल उठता है कि क्‍या ऑक्‍शन के लिए यही प्राइस होनी चाहिए थी. राजा की दलील थी कि टेलीकॉम रेगुलेटर ट्राई ने जिस तय प्राइस की अनुशंसा की है, उस प्राइस पर स्‍पेक्‍ट्रम आवंटन से टेली-डेंसिटी यानी मोबाइल इंटरनेट की पहुंच अधिक लोगों तक पहुंचेगी, क्‍योंकि इससे टेलीफोन का चार्ज कम हो जाएगा.

ज्‍वाइंट पार्लियामेंट्री कमिटी का यह भी कहना था कि भारत में अगर टेली-डेंसिटी इतनी तेजी से बढ़ी है तो उसकी सबसे बड़ी वजह कम कीमत पर स्‍पेक्‍ट्रम की बिक्री ही है. इसीलिए संसदीय समिति ने इस पूरे मामले को घोटाला नहीं, बल्कि अनियमितता कहा था.

(साभार न्यूज 18)

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