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2019 नजदीक है… अब दलितों को ‘पुचकारने’ का वक्त आ गया है

कई उपचुनावों में हार के बाद अब केंद्र की सत्ताधारी पार्टी की तरफ से जो आवाज आ रही है वो 2019 के नजदीक होने की तस्दीक कर रही है

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Jun 27, 2018 08:36 AM IST

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2019 नजदीक है… अब दलितों को ‘पुचकारने’ का वक्त आ गया है

आपातकाल कांग्रेस राज का सबसे बड़ा दाग है. कांग्रेस को जब भी आईना दिखाने की जरूरत महसूस होती है आपातकाल को याद किया जाता है. अब ये जरूरत फिर से महसूस हुई है. प्रधानमंत्री मोदी ने आपातकाल के 43 साल बाद कांग्रेस के वो दाग दुनिया के सामने फिर से उघाड़ दिए हैं. आपातकाल के लिए कांग्रेस को न जाने कितनी बार कोसा गया होगा. इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए. लेकिन एक सवाल जरूर उठ सकता है. इस मौके पर आपातकाल को इतनी शिद्दत से याद कर कांग्रेस को घेरने की ऐसी कौन सी जरूरत आ पड़ी थी?

पीएम मोदी ने अपने भाषण में कहा, ‘कांग्रेस जब भी सत्ता से बाहर होती है, वो जानबूझकर भय का माहौल पैदा करती है. उन्होंने कहा कि पहले कहा जाता था कि ये जनसंघ और आरएसएस वाले मुसलमानों को काट देंगे और अब कह रहे हैं कि दलित संकट में है. देश में इस तरह का भय फैलाया जा रहा है कि अगर दो दोस्तों के बीच में भी लड़ाई हो जाती है तो गाना-बजाना शुरू कर देते हैं.’

उन्होंने कहा कि ‘जब-जब कांग्रेस पार्टी को और खासकर एक परिवार को अपनी कुर्सी जाने का संकट महसूस हुआ है तो उन्होंने चिल्लाना शुरू किया है कि देश संकट से गुजर रहा है, देश में भय का माहौल है और देश तबाह हो जाने वाला है और इसे सिर्फ हम ही बचा सकते हैं.’

बीजेपी को मुसलमानों के नाम पर घेरा जाता रहा है. हालांकि वो इसकी परवाह भी नहीं करती. लेकिन अब दलितों के नाम पर निशाने पर लिया जा रहा है. संकट यहीं पर बड़ा हो जाता है. प्रधानमंत्री मोदी की बातों से इसी चिंता की झलक दिखती है. हाल के दिनों में विपक्ष ने मुसलमानों से ज्यादा दलितों और पिछड़ों के नाम पर बीजेपी को घेरना शुरू कर दिया है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

बीजेपी के लिए यहीं से मुश्किल खड़ी हो गई है. वो मुसलमानों के नाम पर बदनामी लेने को तैयार हैं. क्योंकि आखिरकार उन्हें इसी बदनामी के बूते ध्रुवीकरण का फायदा मिलता है. लेकिन बीजेपी दलितों और पिछड़ों के नाम पर एक दाग भी स्वीकार करने को तैयार नहीं है. इसलिए सफाई की हर मुमकिन गुंजाइश के साथ ये संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि मोदी सरकार की जो दलित और पिछड़ा विरोधी छवि गढ़ी जा रही है वो हकीकत नहीं है.

ज्यादातर मुसलमान बीजेपी को वोट नहीं करते. बीजेपी इस हकीकत को जानते हुए लापरवाह बनी रह सकती है. लेकिन मुसलमानों के साथ दलित और पिछड़ों के मन भी ये भावना आ जाए कि बीजेपी उनकी हमदर्द पार्टी नहीं है, ऐसा होना पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं देता. बीजेपी के लिए किसी भी तरह से ऐसी धारणा को पनपने से रोकना जरूरी हो गया है. इसलिए दलित मुस्लिम एकता और इसमें पिछड़ों के किसी भी तबके के शामिल होने की संभावना से रोकने की कोशिश करना जरूरी हो गया है. इसके लिए साम दाम दंड भेद, हर तरह के उपाय किए जा रहे हैं.

इसी कड़ी में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने 24 जून को कन्नौज के एक कार्यक्रम में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में दलितों को आरक्षण दिए जाने का मसला उठाया था. योगी आदित्यनाथ ने यूपी में दलित मुस्लिम एकजुटता को भांपते हुए एक नई तरह की बहस छेड़ दी.

उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि अगर वो दलितों के इतने ही हमदर्द हैं तो एएमयू और जामिया मिल्लिया इस्लामिया जैसे संस्थानों में दलितों को आरक्षण क्यों नहीं देते? योगी आदित्यनाथ ने कहा, ‘एक प्रश्न ये भी पूछा जाना चाहिए, जो कह रहे हैं कि दलित का अपमान हो रहा है....कि आखिर दलित भाइयों को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी में भी आरक्षण देने का लाभ मिलना चाहिए, इस बात को उठाने का कार्य कब करेंगे?’

योगी आदित्यनाथ ने कहा कि जब बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी दलितों को आरक्षण दे सकती है तो माइनॉरिटी इंस्टीट्यूशन का तमगा हासिल किए अलीगढ़ यूनिवर्सिटी दलितों को कोटा क्यों नहीं दे सकती?

योगी आदित्यनाथ इस मुद्दे के बहाने दलित-मुस्लिम एकता की हवा निकालने की कोशिश में हैं. इस मुद्दे को आगे भी बड़े पैमाने पर उठाने की तैयारी चल रही है. यूपी में पिछले दिनों चार सीटों पर हुए उपचुनावों में बीजेपी को शिकस्त मिल चुकी है. गोरखपुर और फूलपुर सीट समाजवादी पार्टी ने झटक ली. उसके बाद कैराना और नूरपुर के उपचुनाव में गठबंधन के हाथों बीजेपी को पराजय मिली.

Yogi Adityanath at meeting

योगी आदित्यनाथ

अगर बीएसपी के खुले तौर पर विपक्ष के साथ न आने के बावजूद नतीजे बीजेपी के खिलाफ जा सकते हैं तो अगर 2019 में बीएसपी विपक्ष के साथ आ गई तो दलित-मुस्लिम का समीकरण बीजेपी का खेल खराब कर सकता है. योगी आदित्यनाथ के मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दलित आरक्षण की मांग के मुद्दे को उठाना ऐसी किसी समीकरण को बनने से पहले रोकने की कोशिश भर है.

कैराना उपचुनाव में जाट-मुस्लिम एकता तो नहीं बन पाई लेकिन दलितों और मुसलमानों की एकजुटता ने नतीजे को विपक्षी गठबंधन की तरफ जरूर मोड़ दिया. विपक्ष जिस तरह की एकजुटता के दावे कर रहा था उसके हिसाब से गठबंधन उम्मीदवार तबस्सुम हसन को डेढ़ लाख वोटों से जीत हासिल करनी थी. हालांकि इतने बड़े अंतर से जीत तो नहीं हुई लेकिन 44 हजार वोटों की जीत के पीछे दलित मुस्लिम फैक्टर सबसे बड़ा रहा. बीजेपी के लिए ये जरूरी हो गया है कि वो इस फैक्टर का कोई तोड़ निकाले. 2019 के पहले इस फैक्टर की काट निकाल लेना नामुमकिन भी नहीं है.

यूपी में इस फैक्टर की सिलसिलेवार कहानी दिखती है. देशभर में दलित उत्पीड़न की घटनाओं को लेकर दलितों में नाराजगी बढ़ी तो उनके विरोध की आवाज को बुलंद करने मुसलमान भी साथ आ गए. गौ हत्या की घटनाओं में मुसलमानों के साथ दलित भी शिकार बने. इससे भी उनमें एकदूसरे के लिए हमदर्दी का भाव जगा है. जो माहौल बना है, उसमें दोनों समुदाय करीब आए हैं.

2 अप्रैल को एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों में सुप्रीम कोर्ट के फेरबदल को लेकर दलितों ने भारत बंद बुलाया. इस बंद में हरियाणा और उत्तर प्रदेश में हिंसा की सबसे ज्यादा घटनाएं हुईं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में दलितों का सबसे ज्यादा आक्रोश देखने को मिला. शहर के नई मंडी थाने को आग के हवाले कर दिया गया. पुलिस और दंगाइयों के बीच आमने-सामने की गोलीबारी हुई.

कुछ स्थानीय नागरिक बताते हैं कि दलितों के बंद को मुसलमानों का भी समर्थन था. लोगों ने कहा कि विरोध प्रदर्शन के दौरान दलित-मुस्लिम भाई-भाई के नारे भी लगे थे. इसलिए दलित-मुस्लिम गठजोड़ की बातों से इनकार नहीं किया जा सकता. सहारनपुर में दलित हिंसा के बाद पूरे पश्चिमी यूपी में सरकार को लेकर नाराजगी है. मोदी सरकार ने दलितों की नाराजगी दूर करने के लिए दलितों के घर खाना खाने और रात्रि प्रवास के कार्यक्रम रखे. लेकिन उसका बहुत ज्यादा असर देखने को नहीं मिला है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दलित बहुल इलाकों में सरकार के खिलाफ एक गोलबंदी दिखती है.

हालांकि दलित-मुस्लिम एकता पर अभी पुख्ता तौर पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी. उपचुनावों में इसका असर तो दिख गया. लेकिन 2019 में भी इसका असर दिखेगा इसमें संदेह होता है. वर्तमान परिस्थिति ने दलित मुसलमान को एकसाथ ला जरूर दिया है. लेकिन सवाल ये है कि क्या दोनों समुदाय एकदूसरे पर इतना भरोसा कर पा रहे हैं कि उनका गठजोड़ लंबे वक्त तक चल जाए?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के दलित बहुल गांव अकबरगढ़ के दलित डॉ. गुलबीर ने लंबे वक्त से इलाके की दलित राजनीति में हाथ आजमाया है. वो कहते हैं कि दलितों को सबने अपने लिए इस्तेमाल किया है. पिछड़ों ने भी धोखेबाजी की है और भरोसेमंद मुसलमान भी नहीं हैं. वो अपने अनुभव के आधार पर बताते हैं, ‘दरअसल मुसलमान एक दलित को अपना लीडर नहीं मानता. या ये मान लीजिए कि मुसलमान चलती गाड़ी में चढ़ना चाहता है.’

आज स्थितियां दोनों समुदायों के लिए एकजैसी हैं, इसलिए दोनों एक ही गाड़ी में सवार हैं. लेकिन कल को हालात बदल भी सकते हैं. कैराना, नूरपुर उपचुनावों में जिन्ना का मुद्दा नहीं चला लेकिन एएमयू और जामिया मिल्लिया में दलित आरक्षण का मसला और इसी कड़ी में आगे उठने वाले मुद्दे दोनों समुदायों के भरोसे की दीवार कायम रख पाएंगे, इसमें संदेह तो होता ही है.

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