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In Depth : आखिर डकैती पर बनी फिल्मों का फॉर्मूला बॉलीवुड आजतक क्यों नहीं ढूंढ पाया है?

बड़ा सवाल ये भी है कि क्या बॉलीवुड कभी इस फॉर्मूला को आने वाले वर्षों में क्रैक कर भी पाएगा या फिर अभी और इंतजार करना पड़ेगा

Abhishek Srivastava Updated On: Sep 03, 2017 12:27 AM IST

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In Depth : आखिर डकैती पर बनी फिल्मों का फॉर्मूला बॉलीवुड आजतक क्यों नहीं ढूंढ पाया है?

बॉलीवुड फिल्मों का शौक रखने वाले वर्ग से अगर ये पूछा जाए कि हाईस्ट फिल्मों में क्या वो दिलचस्पी रखते हैं तो इस बात में कोई शक नहीं है कि आधे से अधिक सबसे पहले आपसे यही पूछेंगे कि बॉलीवुड की हाईस्ट फिल्में कौन सी है. इसमें गलती उनकी नहीं है गलती फिल्म जगत की है जिन्होंने इस तरह की फिल्मों को कम बनाया और एक तरह से इस जॉनर को लेकर सौतेला व्यवहांर कर रखा है.

अगर बिल्कुल सीधे सादे शब्दों में हाईस्ट का मतलब बयां किया जाए तो ये अपराध की पृष्ठभूमि पर बनने वाली वो फिल्में हैं जिसमें अपराध को एक बड़े ही सुनियोजित ढंग से अंजाम दिया जाता है. इसमें खास बात ये होती है कि अपराध, जो कि ज्यादातर केसेस में पैसे चुराने से जुड़े होते हैं, उसकी प्लानिंग और फिर उसको कैसे अंजाम देना है, ये हाईस्ट फिल्मों का बड़ा हिस्सा होता है. जाहिर सी बात है कि हॉलीवुड फिल्मों का पसंदीदा जॉनर हाईस्ट पर बॉलीवुड अभी तक फतह नहीं कर पाया है.

70 से पहले के दशक की बात तो भूल ही जाइये जब हाईस्ट फिल्मों का अस्तित्व ना के बराबर होता था. निर्माता निर्देशक इस तरह की फिल्मों से गुरेज नहीं रखते थे और इस तरह की फिल्मों से एक हाथ की दूरी बना कर रखते थे. लेकिन उसी दौरान विजय आनंद की फिल्म ज्वेल थीफ आई थी जिसने सभी को चौंका दिया. लोग ये सोचने पर मजबूर हो गए कि ये फिल्म थी या कुछ और थी. चोरी की कहानी को इस शानदार ढंग के बयां किया गया था कि लोगों ने दांतों तले उंगली दबा ली. शायद आज के जमाने में ये फिल्म आती तो लोग फिल्म के किरदार अशोक कुमार, देव आनंद और वैजंतीमाला पर सट्टा लगाते कि आखिर चोर है कौन? ज्वेल थीफ के निर्देशक विजय आनंद ने लोगों को बताया और एक तरह से रास्ता दिखाया कि इस तरह की फिल्में भी हिंदी फिल्म जगत आजमा सकता है.

उनके दिखाये रास्ते पर कम ही लोग चले. अगर आंकड़ों की बात करेंं तो एक साल में इस तरह की एक कोई फिल्म सिनेमाघरों में आ गई तो समझ लीजिए कि बॉलीवुड की हाईस्ट फिल्मों का कोटा इस साल के लिए पूरा हो गया है. लेकिन इस सदी में इसको लेकर चेतना जागृत हुई जिसके लिए धन्यवाद करना पड़ेगा हॉलीवुड का. लोगों को इस बात का इल्म हुआ की ये बेहद ही मजेदार जॉनर है जिसे अगर ठीक तरह से हैंडल किया जाए तो बॉक्स ऑफिस पर सफलता दूर नहीं दिखाई देगी.

साल 2000 के बाद की बात करें तो अब तक लगभग 10 ऐसी फिल्में आ चुकी हैं जिनकी विषयवस्तु कुछ ऐसी ही थी. लेकिन सबसे बड़ी बात ही है कि कुछ फिल्मों को छोड़ दें तो इनमें से किसी ने अपना परचम नहीं लहराया. 2002 में विपुल शाह की आंखें रिलीज हुई थी जिसमें अमिताभ बच्चन के निगेटिव किरदार ने सभी को चौंका दिया था. पूरी फिल्म में अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, परेश रावल और अर्जुन रामपाल के साथ मिलकर अपने ही बैंक को लूटने की योजना बनाते है. ये एक तरह से शुरुआत थी नये सदी में हाईस्ट के प्रेम को लेकर. फिल्म ने पैसे तो बनाये लेकिन उतना प्यार नहीं मिला जो इससे अपेक्षित था. एक गुजराती नाटक के ऊपर आधारित इस फिल्म को एक हिट का दर्जा नहीं मिला.

संजय गुप्ता ने कांटे से एक और कोशिश की. यहां भी बात सुनियोजित चोरी की थी लेकिन कुछ अलग तरीके से. लांस एजेल्स में लूट की प्लानिंग को लेकर इस बार अमिताभ बच्च्न, सुनील शेट्टी, कुमार गौरव, संजय दत्त समेत कुल 6 एक्टर्स थे. मशहूर निर्देशक क्वेनटिन टारंटिनो की फिल्म रेजरवायर डॉग्स पर आधारित ये फिल्म अपने स्टाइल और एक्शन को लेकर अखबारों की सुर्खिया बटोरने में ज्यादा कामयाब रही न कि अपनी कहानी और लेखन को लेकर. सिलसिला आजतक चल रहा है और इस दरमियान धूम, बंटी और बबली, स्पेशल 26 जैसी फिल्मों को देखने का मौका भी मिला. लेकिन अगर ये फिल्में बॉक्स ऑफिस पर कुछ पैसे बनाने में कामयाब रहीं तो कैश, द प्लेयर्स और हैप्पी न्यू इयर, तीस मार खान जैसी फिल्मों ने ये भी सिखाया कि अभी भी इस तरह की फिल्मों पर बॉलीवुड का दिमाग काम नहीं करता है और प्यार मोहब्बत और गीत संगीत से थोड़ा समय निकाल कर इसके ऊपर काम करना पड़ेगा.

तो आखिर क्या वजह है कि लाख कोशिश करने के बावजूद भी बॉलीवुड के मेकर्स के लिए ये अभी भी चक्रव्यूह बना हुआ है. घुस तो जाते हैं लेकिन निकलने की जुगत लगाने की कोई भी तरकीब काम नहीं आती है. इसी हफ्ते रिलीज होने वाली फिल्म बादशाहो भी इसी जॉनर का हिस्सा है. बादशाहो की कहानी 1975 में लगे आपातकाल के दौरान एक सच्ची घटना पर आधारित है. महारानी गायत्री देवी की इंदिरा गांधी से ज्यादा नहीं पटती थी और जब उन्होंने आपातकाल का विरोध किया तो इंदिरा गांधी ने छापा मारने में देरी नहीं की उनके किले पर. उनको इस बात का यकीन था कि मुगल अफगानिस्तान से जो सोना चुराकर लाए थे उसको उनके किले में ही गाड़ा था. सेना और पुलिस ने रेड तो मारी लेकिन वहां पर किसी को कुछ मिला कि नहीं इसका बात का पता आजतक किसी को चल नहीं पाया है.

कुछ लोग ये भी कहते है कि बख्तरबंद गाड़ियों में सोने को जयपुर से दिल्ली पहुंचाया गया था. इतिहास में तो यही बताया गया है कि आजतक किसी को उस सोने के बारे में पता नहीं चल पाया लेकिन निर्देशक मिलन लूथरिया ने अपनी आने वाली फिल्म बादशाहो में इसी कहानी को 6 लोगों की मदद से बयां किया है और सोने की उस चोरी को एक अंजाम तक पहुंचाया है. कहानी में वो यही कह रहे हैं कि मुमकिन है कि उस वक्त ऐसा हुआ होगा. उनको हिसाब से हाईस्ट फिल्मों का चलन इस देश में इसलिए नहीं है क्योंकि ऐसी फिल्मों के लिए लेखन एक अलग लेवल का होता है जिसे बॉलीवुड आजतक क्रैक नहीं कर पाया है. बादशाहो से ही जुड़े हैं इमरान हाशमी जो हिंदी फिल्में कम और अंग्रेजी फिल्में देखना ज्यादा पसंद करते हैं एक खास बातचीत में उन्होंने इस बात को स्वीकारा कि इसके पहले भी इस तरह की कई फिल्में उनको ऑफर की जा चुकी हैं लेकिन हर बार उन्होंने मना कर दिया था. उनका मानना है कि बॉलीवुड जब ऐसी फिल्में बनाता है तब उसमें सबस्टेंस कम और स्टाइल ज्यादा होता है.

हॉलीवुड का इतिहास इस जॉनर में शानदार फिल्मों से भरा पड़ा है. अगर लोग रेजरवायर डॉग्स की बात करते हैं तो ओशन इलेवन सीरिज भी उसी श्रेणी में अपनी जगह बनाती है. द इटालियन जॉब, द युसुअल सस्पेक्ट, द किलिंग वहां की कुछ ऐसी फिल्में हैं जिसमें अभिनय और लेखन का शानदार सामंजस्य देखने को मिला. हद तब पार हो गई जब फिल्म द स्टिंग ने 1974 के ऑस्कर समारोह में सात ट्रॉफी पर कब्जा जमाया. अपने बॉलीवुड में अगर इक्का दुक्का फिल्मों को निकाल दें तो इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इस तरह के लेखन के फार्मूले को बनाने में अभी और समय लगेगा. फिल्म स्पेशल 26 एक सच्ची घटना पर आधारित थी लेकिन इसकी पटकथा इतनी सटीक थी कि पूरे फिल्म के दौरान दर्शकों को किसी भी तरह की राहत नहीं मिली. आंखें अगर एक गुजराती कहानी पर आधारित थी तो वही दूसरी तरफ कांटे, तीस मार खान, द प्लेयर्स, ब्लफमास्टर ये सभी किसी विदेशी फिल्मों की नकल थी. जाहिर सी बात है अक्ल लगाने का मौका किसी को नहीं मिला या फिर किसी ने दिल से कोशिश नहीं की.

बेहतर तो यही होगा कि हिंदी फिल्मों को बनाने वाले इस तरह की कहानी चुनने के लिए हॉलीवुड का रुख ना करें. अपने ही गिरेबान में झाँक कर देखें तो हजारों कहानियां देखने को मिलेंगी. इसका एक शानदार नमूना हमने स्पेशल 26 में देख लिया था जब निर्देशक नीरज पांडे ने 83 में मुंबई में एक सोने की दुकान की सुनियोजित चोरी को अपनी फिल्म की कहानी बताई. मिलन लूथरिया ने भी कुछ ऐसा ही किया है अपनी आने वाली फिल्म बादशाहो में. इस बार भी कहानी पूरी तरह से खालिस देसी है.

इसका सबके बड़ा फायदा ये होता है कि जनता को बैकग्राउंड समझाने में ज्यादा वक्त नहीं लगता है और फिल्म की कहानी सरपट पटरी पर दौड़ने लगती है. फिल्म मेकर्स को ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि हाईस्ट फिल्में क्राइम फिल्मों का ही एक हिस्सा होती है और क्राइम फिल्में बॉलीवुड का पसंदीदा विषय है. अगर थोड़ी बहुत इस पर मेहनत की जाए तो ये एक ऐसा जॉनर होगा जिसको सफलता मिलने में देरी नहीं लगेगी. और हां कहानी को ढूंढने के लिए आपको ज्यादा माथा पच्ची नहीं करनी पड़ेगी. आपको रद्दी की दुकान पर मनोहर कहानियां और सत्य कथा की पुराने इश्यूज आपको हर महीने मिल जाएंगे अगर वहां तक जाने में परेशानी है तो रोज के अखबार ही घोल कर पी जाइए.

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