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REVIEW : "वीरे की वेडिंग' का न्योता अगर आपको नहीं मिला है तो खैर मनाइए

करीना और सोनम की फिल्म को टक्कर देने की जल्दबाजी में बनी इस फिल्म का मेकर्स ने कचरा कर दिया

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Abhishek Srivastava Updated On: Mar 03, 2018 09:32 PM IST

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REVIEW :
निर्देशक: आशु त्रिखा
कलाकार: पुलकित सम्राट, कृति खरबंदा, जिमी शेरगिल

जून के महीने में करीना कपूर की फिल्म वीरे दी वेडिंग रिलीज़ होने वाली है. जब वीरे की वेडिंग बनाने वालों की इस फिल्म के बारे में इल्म हुआ तब उनकी कोशिश यही थी कि फिल्म को जल्दी से बना कर रिलीज़ कर दी जाए ताकी कुछ फायदा हो जाए. वीरे की वेडिंग पहले रिलीज तो हो गई लेकिन हड़बड़ी ने फिल्म के मेकर्स का गणित पूरी तरह से चौपट कर दिया है. एक कॉमेडी के नाम पर वीरे की वेडिंग भद्दा मजाक है. इससे दूरी बनाए रखने में ही भलाई है.

फिल्म की कहानी में दम नहीं है 

वीरे की वेडिंग की कहानी वीर (पुलकित सम्राट) की है जो बेहद झगड़ालू किस्म का इंसान है और राह चलते लड़कियों को छेड़ने वालों को पीटना उसका काम है. इसी के साथ-साथ वो डकैती की घटनाओं को भी रोकता है और जब कोई परेशानी में होता है तब उसकी मदद के लिए भी आगे आता है. वीर के पिता का कपड़ों का व्यापार है और वो अपने बेटे की हरकतों से परेशान हैं और उसकी शादी करना चाहते है. वीर गीत (कृति खरबंदा) से प्यार करता है लेकिन कुछ कारणवश अपने घर वालों से इस बात को नहीं बता पाया है.

गीत को यही लगता है की उसके घर वाले वीर से उसकी शादी के लिए अपनी रजामंदी नहीं देंगे. लेकिन जब दोनों परिवार एक दूसरे से मिलते हैं, तब उसी वक्त जब वीर कुछ गुंडों की धुनाई कर देता है एक लड़की को छेड़ने के लिए तब चीजें बदल जाती हैं.

गीत के पिता को यही लगता है कि उनकी बेटी एक ऐसे लड़के के साथ कैसे रह पाएगी जो बात-बात पर मारधाड़ पर उतर आता है. दोनों परिवार के बीच एक तरह की खाई बन जाती है. उसके बाद फिल्म में कई घटनाक्रम बनते हैं शादी के चलते और इन सबके बीच में है वीर का चचेरा भाई बल्ली (जिमी शेरगिल) जिसको यही लगता है की उसकी शादी के ऊपर किसी ग्रहदशा का प्रकोप है.

जल्दबाजी ने किया ‘कचरा’

अगर फिल्म के कलाकारों के अभिनय की बात की जाए तो पुलकित सम्राट वीर के रोल में जान फूंकने में कामयाब नहीं हो पाए हैं. फिल्म के नाम में ही वीर का नाम शामिल है लिहाजा उनके किरदार पर और मेहनत की जानी चाहिए थी लेकिन फिल्म में ऐसा कुछ भी नजर नहीं आता है. फिल्म की कहानी से वो थोड़ा अलग थलग दिखाई देते हैं.

महज मारधाड़ और गाना गाने के लिए ही हैं वो फिल्म में. उनके चेहरे पर कोई भाव भंगिमाये नहीं हैं. गीत के रोल में है कृति खरबंदा -  अलबत्ता वो पुलकित के मुकाबले कई गुना बेहतर इस फिल्म में दिखाई देती हैं. जिमी शेरगिल बल्ली के किरदार में जान डालने में सक्षम रहे हैं. बल्कि जिमी शेरगिल फिल्म में अकेले ऐसे कलाकार हैं जिनकी वजह से फिल्म देखने में कुछ मजा आता है.

फिल्म के पहले हाफ में आप स्क्रीनप्ले ढूंढ़ते रह जाएंगे. कॉमेडी इस तरह की जिसको देखकर आपको या तो रोना आएगा या फिर आप अपने बाल नोंचने पर विवश हो जाएंगे. अगर आपको लगता है कि "ना दही ना भल्ले, बल्ले बल्ले" जैसे डायलाग से आपको हंसी आएगी तो आप इस फिल्म को एक कॉमेडी की श्रेणी में जरूर रख सकते हैं. डायलॉग या तो इस फिल्म के सेट पर लिखे गए थे या फिर शूटिंग के एक दिन पहले. मेहनत हर ओर से नदारद है. अब वक्त आ गया है कि पुलकित सम्राट को सलमान खान हैंगओवर से निकलना पड़ेगा.

चाहे वो कितनी भी मेहनत कर लें अगर उनका स्वैग उनके किरदार मे दिखा तो लोगों को सलमान खान की ही याद आएगी. फिल्म को आगे बढ़ने के लिए फिल्म के मेकर्स ने कुछ और चीजें भी डाली दी हैं फिल्म की कहानी में ताकि वो आगे बढ़े लेकिन उनका यह तरीका भी कारगर साबित नहीं होता है.

बेहद कमजोर निर्देशन 

वीर की टोली में जो लोग नजर आते हैं उनको देख कर गुस्सा ही आता है. जब भी वो स्क्रीन पर आते हैं चिढ़ चिड़ेपन की अनुभूति होती है. फिल्म की शुरुआत विजय राज की कमेंट्री से होती है जो बीच-बीच में आती रहती है लेकिन एक पल के बाद सूत्रधार से कहानी सुनाने की कवायद को निर्देशक ने पूरी तरह से अचानक खत्म कर दिया है जो अटपटा लगता है.

आशु त्रिखा का निर्देशन बेहद कमजोर है और कहीं से भी इस कमजोर फिल्म में कोई ऐसा पल ढूंढने से भी नहीं मिलता है जिसके लिए उनकी तारीफ की जाए. गानों के बारे में कुछ भी लिखना समय और स्पेस की ही बर्बादी होगी. बेहतर है कि आप अपने पैसे को किसी और तरीके के मनोरंजन में लगाएं. यह सिनेमा हाल जाने से ज्यादा बेहतर होगा.

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