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Veere Di Wedding Review: इसे औरतों के बीच की केमिस्ट्री के लिए देखिए, बाकी भूल जाइए

कुल मिलाकर इस फिल्म को एक बार तो आप आजमा ही सकते हैं

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Updated On: Jun 01, 2018 06:29 PM IST

Abhishek Srivastava

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Veere Di Wedding Review: इसे औरतों के बीच की केमिस्ट्री के लिए देखिए, बाकी भूल जाइए
निर्देशक: शशांक घोष
कलाकार: करीना कपूर, सोनम कपूर, स्वरा भास्कर, शिखा तलसानिया

 

चार दोस्तों की कहानी जो जिंदगी, प्यार और शादी की उलझनों से जूझ रहे हैं कुछ नया नहीं है. अगर कुछ नया है तो वो ये है कि इस बार पुरुषों के बदले कहानी औरतों की है. निर्देशक शशांक घोष की फिल्म ‘वीरे दी वेडिंग’ अपनी कमियों के बावजूद आपका ध्यान खींचने में सफल रहती है और इसके लिए श्रेय जाना चाहिए फिल्म की चार औरतों को जिनके इर्द-गिर्द ये पूरी फिल्म घूमती है. इस फिल्म को देखना एक अलग अनुभव इसलिए भी है क्योंकि ये औरतें जिंदगी अपनी शर्तों पर जीती हैं, जो बातें इनके दिल में है वही इनकी जुबान पर भी है. जिंदगी की कोई भी चीज इनको रोक नहीं सकती है और ये रूढ़ियों से परे है. शादी के पहले का सेक्स, शादी के बाद का सेक्सलेस जीवन या फिर सेक्स टॉयज की बातें - इनके लिए कोई भी बंधन नहीं है. गालियां देने में इन्हें कोई परहेज नहीं है. गलतियां करती हैं लेकिन उसे भूलकर आगे भी निकल जाती हैं. लेकिन अगर ये सारी प्रोग्रेसिव चीजें फिल्म में हैं तो ऐसा नहीं कि इस फिल्म या इनके किरदार की लिखावट में कमियां नहीं है. कई बार फिल्म को देखकर ये भी लगता है कि कुछ चीजों को बड़े ही सतही अंदाज मे दिखाया गया है. ‘वीरे दी वेडिंग’ की अपनी कमियां हैं लेकिन इन औरतों के जीने का अंदाज कितना निराला है और कितना अलग है इसके लिए आप फिल्म देख सकते हैं.

फिल्म की कहानी कालिंदी की शादी के समय घटती है

फिल्म की कहानी बचपन की दोस्त-कालिंदी (करीना कपूर), अवनी (सोनम कपूर), साक्षी (स्वरा भास्कर) और मीरा (शिखा तलसानिया) के बारे में है. कालिंदी का पालन-पोषण एक ऐसे परिवार में हुआ है जो कई मायनों में बिखरा हुआ है. कालिंदी, ऋषभ (सुमीत व्यास) से प्यार करती है लेकिन शादी करने से कतराती है. अवनी एक वकील है जो तलाक के केसेज हैंडल करती है और उसे भी अपने प्यार की तलाश है. साक्षी की शादी लगभग टूट चुकी है और जिंदगी में उसका अगला पड़ाव अपने पति से तलाक लेना है. मीरा की जिंदगी में सेक्स की कमी है और उसकी जिंदगी अपने बच्चे को बड़ा करने में गुजर रही है और अपने सिख परिवार की मर्जी के खिलाफ अपने गोरे पति के साथ रह रही है. इन सभी की मुलाकात कालिंदी की शादी के दौरान होती है और उसके बाद कई चीजें पर्दे के बाहर निकल कर आती है जो किसी भूचाल से कम नहीं है.

फिल्म की जान करीना, सोनम, शिखा और स्वरा की केमिस्ट्री में है

‘वीरे दी वेडिंग’ की सबसे बड़ी खूबी है कि इन चारों दोस्तों के आपस की बातचीत और इनके बीच की बॉन्डिंग. इन सभी के बीच की केमिस्ट्री बेहद शानदार है और सहज अभिनय खुद-ब-खुद निकलकर स्क्रीन पर आता है. ये औरतें आज की युग की हैं और आज के जमाने को परिभाषित करती हैं. लेकिन अगर मेहुल और विधि की कहानी हर किरदार की जिंदगी के अंदर थोड़ा और जाती तो मजा बढ़ सकता था. इस बात पर निर्देशक शशांक घोष मात खा गए हैं. आप उनकी उलझने समझ सकते हैं लेकिन पूरी तरह से उनकी परेशानियों के साथ आपकी इमोशनल बॉन्डिंग नहीं हो पाती है. इस फिल्म के औसत स्क्रीनप्ले को कई मायनों में इसके अच्छे डायलॉग ने छुपा लिया है. आसान शब्दों में कहें तो ये फिल्म सही मायने में ‘दिल चाहता है’ या ‘जिन्दगी न मिलेगी दोबारा’ है जो औरतों के दृष्टिकोण से कही गई है. इस फिल्म की सबसे बड़ी अपील मेट्रो शहरों में ही होगी. छोटे शहरों में लोग इस फिल्म को स्वीकार करेंगे इस बात को लेकर संदेह है.

अभिनय के मामले मे शिखा और स्वरा ने बाजी मारी

अभिनय की बात करें तो फिल्म की कहानी कालिंदी के इर्द-गिर्द ही घूमती है और उसके आस-पास बाकी सभी किरदारों की कहानी चलती रहती है. कालिंदी के रूप में करीना का काम बेहतरीन है जो खुद से अपनी परेशानियों को हल करने की कोशिश में लगी रहती है. सोनम कपूर के अभिनय में भी अब धार दिखने लगी है नीरजा, रांझना जैसी फिल्मों को करने के बाद उनके अभिनय में परिपक्वता नजर आने लगी है. स्वरा भास्कर को भी अपने किरदार के अंदर उतरने में ज्यादा समय नहीं लगा है इस फिल्म में. लेकिन अगर किसी का काम फिल्म में वाकई कमाल का है तो वो निश्चित रूप से शिखा तलसानिया है. जाहिर सी बात है इस फिल्म की स्टार पावर करीना कपूर से ही है लिहाजा उनका ही स्क्रीन टाइम फिल्म में सबसे ज्यादा है लेकिन शिखा और स्वरा ने ध्यान खींचने के मामले में करीना और सोनम से बाजी मार ली है. सबसे ज्यादा हंसी भी इन दोनों की ओर से ही आती है. शिखा तलसानिया और स्वरा भास्कर फिल्म में बेहद सहज ढंग से नजर आए हैं. ऋषभ के रोल में सुमीत व्यास का काम भी काफी शानदार है.

कई जगहों पर ये फिल्म आपको सच्चाई से दूर ले जाएगी

इस फिल्म में कुछ चीजें ठूसी भी गई हैं. थाईलैंड का पूरा सीक्वेंस बचकाना लगता है और यही समझ में आता है कि आजकल की लड़कियां लड़कों जैसी हो सकती हैं. इस बात को दिखाने के लिए थाईलैंड का सीक्वेंस जबरन डाला गया है जहां पर ये सभी स्ट्रीप क्लब की सैर करती हैं और स्विमिंग कॉस्ट्यूम में घूमती हैं. इसके बिना भी ये बात कही जा सकती है थी कि आज की औरत किसी से कम नहीं है. ये सब कुछ सतही नजर आता है. फिल्म की औरतों के बीच की केमिस्ट्री बेहद ही शानदार है लेकिन उनके पीछे का जो परिप्रेक्ष्य है वो कहीं से भी यकीन दिलाने वाला नहीं लगता है. जिस तरह के शानदार कपड़े और दौलत की नुमाइश इस फिल्म में की गई है उसके बैकड्रॉप में परंपरा जैसी चीजों के बारे में बात करना थोड़ा अटपटा लगता है. फिल्म में कालिंदी के समलैंगिक चाचा का जो ट्रैक है वो ज्यादा अपील करता है. मौज मस्ती और शिखा तलसानिया और स्वरा भास्कर के बेबाक अंदाज के लिए आप इस फिल्म को आजमा सकते हैं.

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