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मैं चाहूंगा कि जब डेविड धवन इस फिल्म को देखें तो उनकी आंखों से आंसू निकले-वरुण

अगर मेरा बस चले तो मैं एक वक्त में सिर्फ एक ही फिल्म पर काम करूं

Updated On: Apr 11, 2018 11:23 PM IST

Abhishek Srivastava

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मैं चाहूंगा कि जब डेविड धवन इस फिल्म को देखें तो उनकी आंखों से आंसू निकले-वरुण
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ऐसा नहीं है कि शूजित ने मुझे अचानक एक दिन फोन करके अपने दफ्तर बुलाया और ये फिल्म ऑफर कर दी. मेरी दसवीं फिल्म के बाद मुझे इस तरह का भाव मिला है.

वरुण धवन की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर आजकल सफलता की गारंटी बन गई हैं. अगर आम दर्शकों का वो बद्रीनाथ की दुल्हनिया और जुड़वां 2 जैसी फिल्मों से मनोरंजन करते हैं तो वहीं, दूसरी तरफ बदलापुर से खास वर्ग का भी ध्यान रखते है. उनकी आने वाले फिल्म है अक्टूबर जिसके बारे में उनका मानना है कि इससे उनकी जिंदगी में बदलाव हुआ है और इस फिल्म की उनकी जिंदगी मे खास अहमियत है. फर्स्टपोस्ट से एक खास मुलाकात में उन्होंने अक्टूबर के अलावा ढेरों मुद्दों पर बातें की.

आप फिल्म के प्रोमोशन में ज्यादा नजर नहीं आ रहे हैं. इसकी क्या वजह है?

हकीकत ये है कि शूजित दा हमलोगों को ज्यादा प्रमोशन का मौका नहीं दे रहे हैं. एक तरह से उन्होंने हमलोगों को रोक कर रखा है. मैंने इसके पहले शूजित दा से पूछा था कि उनको फिल्म के प्रोमोशन के लिए कितने दिन चाहिए. अमूमन हर फिल्म के लिए लगभग 15 से 25 दिन प्रमोशन के लिए निर्धारित होते हैं. लेकिन जब प्रोडक्शन ने मुझे ये बताया कि उनको सिर्फ मेरे 5 दिन की ही जरुरत है तो मैं एक तरह से चौंक गया था. बाद में शूजित दा ने मुझे बताया कि उन्हें इस बात का डर था कि अगर प्रमोशन के दौरान फिल्म के बारे में मैने कुछ ज्यादा बोल दिया तो वो फिल्म के लिए अच्छा नहीं होगा इसलिए उन्होंने यही कहा कि बेहतर है कि तुम दूर ही रहो.

कहने की जरुरत नहीं है की ये एक अलग फिल्म लग रही है. क्या कुछ नया किया आपने अक्टूबर के लिए?

देखिये सच बात ये है कि जब मैं फिल्म की शूटिंग के लिए सेट पर पहुंचा था तो मैं थोड़ा सा डरा हुआ था. अक्टूबर का टाइम लाइन ये था कि मैंने जुड़वां 2 की शूटिंग पूरी कर ली थी और उसके बाद फिल्म को लेकर शूजित दा के साथ एक-दो महीने चर्चा की और फिर सीधा मुझे इस फिल्म के सेट पर जाना था. सेट पर पहुंचकर पता चला कि शूजित दा को सब कुछ अलग चाहिए था और वो यही चाहते थे कि फिल्म में मैं अपना अभिनय नॉर्मल तरीके से करूं. अब परेशानी इसी बात की थी कि इसके पहले मैंने इस तरह की एक्टिंग कभी नहीं की थी. यही सोचने लगा कि अब मैं क्या करूं. उसके बाद दादा ने बड़े ही प्यार से मुझे अपने पास बिठाकर कहा कि मुझे इस फिल्म के लिए एक्टिंग बिलकुल भी नहीं करनी है. मुमकिन है कि इस फिल्म के बाद शायद लोग कहें कि वरुण ने क्या कमाल का काम फिल्म में किया है लेकिन हकीकत यही है कि मुझे इस बात का इल्म है कि मैंने इस फिल्म में एक्टिंग बिलकुल भी नहीं की है.

इस फिल्म के किरदार के लिए क्या आप कहीं से प्रेरित हुए थे?

अभिलाष नाम का 19 साल का एक लड़का था जिससे मेरी मुलाकात दिल्ली मे हुई थी. जब मैं दिल्ली फिल्म के प्रेप वर्क के लिए गया था तब उससे मिलना हुआ था. वो होटल में ट्रेनी था. उसके जीवन की यही मंशा थी कि वो किसी होटल में हेड शेफ बने. मेरा उससे पहली बार जिम में मिलना हुआ था. जब उससे पहली बार मैंने बात की तो वो काफी भावुक होकर रोने लगा था. पूछने पर उसने बताया था कि उससे कोई उम्मीद नहीं रखता है चाहे उसके घर वाले हों या फिर होटल वाले. उसने यही बताया कि सब यही कहते हैं कि मैं जिंदगी में कुछ भी नहीं कर पाऊंगा. फिर अगले दिन वो मेरे लिए घर से खास बिरयानी बनाकर ले आया था. तीसरे दिन मैंने उसकी मुलाकात शूजित दा से करवाई और उनको उसका बॉडी लैंग्वेज काफी जंचा. ट्रेनी होने की वजह से उसकी ड्यूटी हर वक्त बदलती रहती थी इसलिए कभी उसके नजारे जिम में होते थे तो कभी टॉयलेट में तो कभी किसी और जगह पर लेकिन रसोई घर में कभी नहीं. होटल के स्टे के अपने आखिरी दिन मैंने मैनेजमेंट से गुजारिश की थी कि इसको किचन में कुछ दिन के लिए रखा जाए. तीन के बाद मुझे पता चला कि उसका तबादला किचन में हो गया था.

वरुण ये भी कहा जाता है कि शूजित सरकार की फिल्म में काम करने के बाद एक्टर्स की इमेज थोड़ी बदल जाती है. पीकू के बाद दीपिका और पिंक के बाद तापसी की इमेज में अच्छा खासा बदलाव आया था. क्या आप भी इस बात की उम्मीद करते हैं?

देखिये मुझे पता है कि मेरी इमेज एक रंग बिरंगी खुश मिजाज एक्टर वाली है जो कि देखा जाए तो कहीं से भी ये बुरी इमेज नहीं है. पहली बात ये है कि मुझे किसी भी तरह का कोई इमेज नहीं रखना है. एक एक्टर के तौर पर मेरी कोशिश यही रहती है कि जब भी मेरी फिल्म आए तो मैं दर्शकों को एक तरह का झटका देकर जाऊं.

आपकी लगभग हर फिल्म हिट रही है. आप इस बात को किस नज़र से देखते हैं?

मैं इसको अहंकार की नजर से बिलकुल भी नहीं देखता हूं. कभी-कभी एक सफल फिल्म भी असफल रहती है. अगर आप बिजनेस के बारे में बात करें तो पता चलता है कि कुछ फिल्में कभी महज मास सेंटर्स में अच्छा व्यापार करती है तो कभी सिर्फ मल्टीप्लेक्सेस में. ऐसा बहुत कम होता कि कुछ फिल्में आती हैं और पूरे देश में चलती हैं. बद्रीनाथ और जुड़वां 2 हर जगह चली थी तो वहीं, बदलापुर को सिर्फ मल्टीप्लेक्सेस में लोगों ने देखा था. ये एक तरह का सबक होता है कि आप अपनी अगली फिल्म के लिए मेहनत करें और उसे हर जगह पहुंचाए. मेरी सोच ये कभी नहीं रही है कि मेरी फिल्म को सिर्फ एक तबका देखे. उस तरह की सोच काफी इलीट सोच मानी जाएगी. अक्टूबर मिडिल क्लास इंडिया के बारे में है. आपको जानकर आश्चर्य होगा की ये मेरी पहली फिल्म है जिसमें मैंने सबसे कम अंग्रेजी बोली है. ये उस तरह की फिल्म है जो हर वर्ग को अपील करेगी.

वरुण अगर देखा जाए तो आपकी जो इमेज है वो सलमान खान की भलाई करने वाली, संवेदनशील इमेज के काफी करीब आती है. क्या सलमान खान से आपकी तुलना सही होगी?

नहीं नहीं बिलकुल नहीं. जिस तरह का उनका बड़ा दिल है और जिस तरह से बिना सोचे समझे लोगों की मदद के लिए अपने पैसे देते हैं वो कमाल की बात है और काबिले तारीफ है. मैं उनके घर गया था जब वो जोधपुर से आए थे और मिलते ही मैंने उनको बिना कुछ कहे सिर्फ गले लगाया. मेरा सलमान खान से रिश्ता पर्सनल है क्योंकि मैं उनको बचपन से जानता हूं. उनको लेकर जो भी मेरी राय होगी वो हमेशा पर्सनल पॉइंट ऑफ व्यू से ही रहेगी.

बहुत दिनों के बाद अक्टूबर से एक अलग तरह की प्रेम कहानी के दीदार होने वाले है. आपकी इस बारे में क्या राय है?

जी हां आपने सही कहा और यही वजह थी कि मैंने इस फिल्म के लिए अपनी हामी भरी. आजकल जो सोशल मीडिया और टेक्नोलॉजी का दौर चल रहा है उसकी वजह से प्यार में भी बदलाव आ गया है. अब कहीं न कहीं प्यार वो नहीं रहा जो पहले हुआ करता था. मैं अपने आपको खुशकिस्मत मानता हूं कि ये फिल्म मुझे मिली वरना मेरे लिए भी प्यार का मतलब थोड़ा धूमिल हो गया था. आजकल सब कुछ बड़ी ही तेजी के साथ हो रहा है. रिश्तों के अहमियत को आजकल हम लोग हल्के में लेने लगे हैं. मैं अपने बारे में खुद कहूंगा कि शूटिंग की वजह से एक जगह पर मेरा रहना नहीं हो पाता है तो उस दौरान मैं खुद इस बात को भूल जाता हूं कि एक इंसान की उसकी जिंदगी में क्या प्राथमिकताएं होनी चाहिए. महज पैसे कमाना जिंदगी का उद्देश्य नहीं हो सकता है क्योंकि आप मरने के बाद पैसे ऊपर लेकर नहीं जा पाएंगे. अंत में यही मायने रखता है कि क्या आपको अपने चाहने वालों से प्यार मिला या नहीं या फिर आपने अपने चाहने वालों को प्यार किया कि नहीं. अक्टूबर शूजित दा के कुछ अनुभव पर आधारित है इसलिए मेरे लिए ये बेहद जरूरी था कि मैं उनकी हर बात को समझूं.

फिल्म का नाम अक्टूबर क्यों हैं?

 उसकी यही वजह है कि फिल्म में अक्टूबर के महीने में एक हादसा होता है. लेकिन सिर्फ यही वजह नहीं है फिल्म में अक्टूबर के महीने में कुछ और चीजें भी होती हैं जो फिल्म में दिखाई गई है जिसके बारे में मैं फिलहाल कोई खुलासा नहीं कर सकता हूं. लेकिन ये भी इत्तेफाक की बात है कि मैंने फिल्म अक्टूबर के महीने में ही साइन की थी और इस फिल्म का एक बड़ा हिस्सा अक्टूबर के महीने में शूट हुआ था. अपने इस फिल्म के पोस्टर में अक्टूबर के लोगो में एक फूल देखा होगा. वह नाईट जैसमिन का फूल है जो अक्टूबर के महीने में ही नजर आता है.

क्या ये कहना ठीक होगा कि बद्रीनाथ और जुड़वां 2 के साथ-साथ आप बदलापुर और अक्टूबर जैसी फिल्म करके किसी तरह का बैलेंस बनाने की कोशिश कर रहे हैं अपने करियर में?

 सच्चाई यही है कि इसमें कोई स्ट्रैटेजी छुपी नहीं है. मैं एक फिल्म के लिए अपनी हामी तभी देता हूं जब स्क्रिप्ट मुझे बेइंतेहा उत्तेजित करती है. मेरे लिए एबीसीडी बहुत ही एक्साईटिंग था क्योंकि फिल्म में मुझे प्रभु देवा के साथ काम करने का मौका मिल रहा था. अब इसके आगे मुझे कटरीना कैफ के साथ काम करने का मौका मिल रहा है. अक्टूबर की बात करूं तो ये शूजित सरकार की फिल्म है जिसकी कहानी जूही चतुर्वेदी ने लिखी है. इसके सिनेमाटोग्राफर अविक दा हैं जो इसके पहले तीन नेशनल अवार्ड हासिल कर चुके हैं. इसका लुक काफी अलग है. अब जब इतने बड़े नाम किसी फिल्म से जुड़े होते हैं तो उसके लिए हामी देनी ही पड़ेगी. लेकिन सबसे बड़ी वजह यही है कि जब शूजित दा ने मुझे कहानी सुनाई और इसका अभिप्राय बताया तो मैं दंग रह गया था.

आने वाले समय में आप कुछ एक काफी अलग फिल्मों में नज़र आने वाले हैं. आप उनका चुनाव कैसे करते हैं?

 देखिए अगर मेरा बस चले तो मैं एक वक्त में सिर्फ एक ही फिल्म पर काम करूं. फिल्म को खत्म करूं, उसका प्रोमोशन करूं, और उसके रिलीज के बाद दूसरी फिल्म पर जम्प कर जाऊं लेकिन उस लेवल पर पहुंचने के लिए मुझे थोड़ा वक्त और लगेगा. जब मुझे अक्टूबर और सुई धागा ऑफर की गई थी तो मुझे बेहद खुशी हुई थी और मैं इस बात को कहूंगा कि इस लेवल तक भी पहुंचने के लिए मुझे थोड़ा वक्त लगा है. ऐसा नहीं है कि शूजित ने मुझे अचानक एक दिन फोन करके अपने दफ्तर बुलाया और ये फिल्म ऑफर कर दी. मेरी दसवीं फिल्म के बाद मुझे इस तरह का भाव मिला है.

आपको लगता है कि फिल्म जगत में पक्षपात होता है?

देखिये ये सच है की जो इंडस्ट्री के लोग हैं उनको काम आसानी से मिल जाता है लेकिन ये भी सच है कि आगे चलकर उनको अपनी योग्यता का प्रमाण देना पड़ता है. मुझे सच में पता नहीं है कि इंडस्ट्री का फोकस किस तरफ है लेकिन उसमें बदलाव आना चाहिए. मौजूदा दौर में ऐसे कई अभिनेता हैं जो बदलाव ला रहे हैं. राजकुमार राव कमाल के अभिनेता हैं तो वही, दूसरी तरफ आयुष्मान मुझे बेहद पसंद हैं. इस तरह के लोगों की वजह से चीजों में बदलाव आ रहा है. अक्टूबर की हीरोइन बनिता संधू को अगर शूजित दा ने लॉन्च किया है तो ये बड़ी बात है. कहीं न कहीं चीजें बदल रही है और मजा तब आएगा जब एक्टर्स के अलावा बाहर के निर्देशक, लेखक और निर्माता भी भारी मात्रा में फिल्म जगत में आएं. मैं ज्यादा कुछ कमेंट इस विषय पर नहीं करना चाहूंगा क्योंकि मेरे अंदर अभी वो शक्ति नहीं है कि मैं बदलाव ला सकूं लेकिन आगे चलकर मौका मिला तो कोशिश जरूर करूंगा.

चलिए आखिर में बताइए कि डेविड धवन को आप ये फिल्म कब दिखाने वाले हैं?

जब तक ये फिल्म रिलीज नहीं होगी मैं उनको अक्टूबर देखने नहीं दूंगा. मुझे किसी भी तरह का कोई प्रेशर उनकी तरफ से नहीं चाहिए. मैं चाहूंगा कि जब वो इस फिल्म को देखें तो उनकी आंखों से आंसू निकले.

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