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नोबेल पुरस्कारों पर पड़ा #MeToo कैंपेन का साया, नहीं दिया जाएगा इस बार किसी को अवॉर्ड

सन् 1786 में किंग गुस्ताव थर्ड के जरिए गठित की गई स्वीडिश एकेडमी इस पुरस्कार के लिए दुनिया के प्रतिष्ठित साहित्यकार का चयन करती है

Updated On: Sep 30, 2018 03:50 PM IST

Arbind Verma

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नोबेल पुरस्कारों पर पड़ा #MeToo कैंपेन का साया, नहीं दिया जाएगा इस बार किसी को अवॉर्ड

काफी समय से दुनिया भर में यौन शौषण के खिलाफ एक मुहिम छिड़ी हुई है. #MeToo कैंपेन ती छाया इस बार स्वीडिश एकेडमी पर भी पड़ गया है. स्वीडिश एकेडमी ने इस साल साहित्य का नोबेल पुरस्कार किसी को भी नहीं दिया है. स्वीडिश एकेडमी के इस कदम को सोच में बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है.

 इस साल नहीं मिला नोबेल पुरस्कार

साल 2016 में अमेरिकी रॉक स्टार बॉब डिलन को नोबेल पुरस्कार के लिए चुने जाने का कड़ा विरोध किया गया था. इस फैसले में सिर्फ लोकप्रियता को देखकर फैसला लेने का आरोप लगा था. डिलन को सम्मानित करने से उपजे विवाद को थोड़ा शांत करने के लिए साल 2017 में नोबेल पुरस्कार के लिए जापानी मूल के ब्रिटिश लेखक काजुओ शीगुरो का चयन किया गया. लोगों की सहमति तो इस पर बनी लेकिन इसके तीन हफ्ते बाद ही एकेडमी फिर से विवादों में फंस गई. मामला ‘मीटू’ अभियान से जुड़ा हुआ था. इस मामले में फ्रांसीसी लेखक जीन क्लाउड अर्नाल्ट ने एक एकेडमी सदस्य से ही शादी कर ली. ये महिला तो स्टॉकहोम के प्रभावशाली सांस्कृतिक क्लब से जुड़ी हुई हैं लेकिन अर्नाल्ट यौन शोषण के आरोपों स घिरे हुए हैं. इस वाकिये के बाद एकेडमी दो हिस्सों में बंट गई. जिसके बाद ऐसा कहा जा रहा है कि इसी विवाद के चलते साल 2018 के साहित्य नोबेल पुरस्कार के लिए किसी हस्ती का नाम तय नहीं किया जा सका.

1901 से चली आ रही है परंपरा

सन् 1786 में किंग गुस्ताव थर्ड के जरिए गठित की गई स्वीडिश एकेडमी इस पुरस्कार के लिए दुनिया के प्रतिष्ठित साहित्यकार का चयन करती है. ये परंपरा साल 1901 से चली आ रही है.

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