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Review: गनीमत है कि Accidental Prime Minister में सच के ऊपर झूठ की लीपापोती नहीं की गई है

अगर कांग्रेस के लोग इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं तो इसके बारे में यही कहा जा सकता है कि सच कड़वा होता है

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Updated On: Jan 11, 2019 11:14 AM IST

Abhishek Srivastava

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Review: गनीमत है कि Accidental Prime Minister में सच के ऊपर झूठ की लीपापोती नहीं की गई है
निर्देशक: विजय रत्नाकर गुट्टे
कलाकार: अनुपम खेर, अक्षय खन्ना, सुजान बर्नर्ट

द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ पर आधारित है और कहना पड़ेगा कि किताब के साथ फिल्म के निर्देशक ने न्याय किया है. जाहिर सी बात है किताब के सभी कंटेंट फिल्म में समाहित नहीं हो सकते हैं लेकिन जो कुछ भी फिल्म में दिखाया गया है उसके ऊपर किसी भी तरह की लीपापोती नहीं की गई है और इसके पीछे की वजह ये है कि इस किताब को मैंने पढ़ा है. फिल्म मनमोहन सिंह के दो कार्यकाल के बारे में है जब वो देश के प्रधानमंत्री थे. पूरी फिल्म उनके मीडिया सलाहकार संजय बारू की नजरों से चलती है जिसमें अगर यूपीए सरकार की उपलब्धियों की बात की गई है तो इस बात को भी सामने लाने की कोशिश की गई है कि देश के प्रधानमंत्री भले ही मनमोहन सिंह थे लेकिन सरकार की चाबी सोनिया गांधी के हाथों में ही थी. और इन सभी के बीच में मनमोहन सिंह ने अपने खुद की एक इमेज बनाने की कोशिश की.

फिल्म की कहानी मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री कार्यकाल के बारे में है जब उनको 10 जनपथ से दखलअंदाजी झेलनी पड़ी थी 

‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ की कहानी शुरू होती है 2004 से जब यूपीए की सरकार बनी थी. जब विपक्ष सोनिया गांधी के देश में रहने के 16 साल के बाद भारतीय नागरिकता लेने की बात कर रहा था तब सोनिया गांधी के सामने एक बड़ी समस्या ये आन पड़ी थी की आखिर किसे प्रधानमंत्री बनाया जाए. आखिर में ये जिम्मेदारी मनमोहन सिंह (अनुपम खेर) के कंधों पर पड़ी. असल कहानी तब शुरू होती है जब मनमोहन सिंह फाइनेंशियल एक्सप्रेस के एडिटर संजय बारू को अपना मीडिया सलाहकार नियुक्त करते हैं जिनकी रिपोर्टिंग सीधे देश के प्रधानमंत्री को होती है. संजय बारू पीएमओ के ऊपर 10 जनपथ की हर निगाह और चाल को अच्छी तरह से भांप लेते हैं और ये भी समझ जाते हैं कि मनमोहन सिंह के काम करने के तरीके में 10 जनपथ की जबरदस्त दखलंदाजी होगी. आगे चलकर वही होता भी है लेकिन संजय बारू अपने कूटनीतिक चालों से हर बार मनमोहन सिंह को बचा लेते हैं और इस पूरे प्रकरण में मनमोहन सिंह के शिथिल अंदाज को एक ठोस अंदाज में बदल देते हैं. फिल्म मे ये भी दिखाया गया है कि सोनिया गांधी के करीबी अहमद पटेल की हर चाल को बारू ने किस तरीके से मात दी. फिल्म के ही बीच मे ये भी उभरकर सामने आता है कि सोनिया गांधी आने वाले समय के लिए राहुल गांधी को तैयार कर रही थीं और मनमोहन सिंह सिर्फ उस समय की खानापूर्ति कर रहे थे.

अनुपम खेर और अक्षय खन्ना का शानदार अभिनय

कहने की जरुरत नहीं है कि ये फिल्म पूरी तरह से अनुपम खेर और अक्षय खन्ना के कंधों पर टिकी हुई है. जिस तरह से अनुपम खेर ने मनमोहन सिंह के मैनेरिज्म को अपने अभिनय में ढाला है वो वाकई में काबिल-ए-तारीफ है. चाहे वो उनके बोल चाल का तरीका हो या फिर चलने का ढंग या फिर माथे पर परेशानी की शिकन - इन सभी चीजों को अनुपम खेर बखूबी पर्दे पर लाने में कामयाब रहे हैं. लेकिन फिल्म में जान तभी आती है जब अक्षय खन्ना पर्दे पर आते हैं. फिल्म में कई जगहों पर वो सूत्रधार की भूमिका में नजर आते हैं जिसकी वजह से फिल्म का नैरेशन काफी अलग और रोचक हो जाता है. अक्षय खन्ना, संजय बारू के किरदार में पूरी तरह से रचे बसे नजर आते हैं. टेंशन भरे सीन्स में भी अक्षय की वजह से एक हल्का-फुल्का ताजगी का अहसास आपको मिलेगा. इसके अलावा सोनिया गांधी के रोल में जर्मन अभिनेत्री सुजान बर्नर्ट और अहमद पटेल की भूमिका में विपिन शर्मा पूरी तरह से जचे हैं. अगर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के किरदार को भी फिल्म में थोड़ा और स्क्रीन स्पेस दिया जाता तो मजा कुछ और रहता.

सच्चाई के ऊपर झूठ का कूचा इस फिल्म में नहीं मारा गया है 

इस फिल्म की सबसे खास बात यही है कि सत्य के ऊपर झूठ का कूचा नहीं मारा गया है और फिल्म में सभी किरदारों के नाम वही हैं जिनके नाम हम अक्सर अखबारों में पढ़ते रहते हैं. लेकिन फिल्म में कुछ खामियां भी हैं. फिल्म की एडिटिंग उतनी क्रिस्प नहीं है जितनी होनी चाहिए. कई बार इस बात का अहसास होता है कि दो सीन्स के बीच कुछ छूट गया है. स्क्रीनप्ले में और पैनापन लाया जा सकता था. विजय रत्नाकर गुट्टे की ये पहली फिल्म है और इसके चलते इनको माफ किया जा सकता है. लेकिन इसके अलावा निर्देशक के चीजों को कहने का तरीका बेबाक है. फिल्म की कास्टिंग पर भी उनकी मेहनत साफ झलकती है क्योंकि फिल्म से जुड़े अभिनेताओं के चेहरे फिल्म के किरदारों से काफी मेल खाते हैं.

द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर एक ब्रेव फिल्म है

द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर को हम एक ब्रेव फिल्म कह सकते हैं क्योंकि एक राजनीतिक परिवेश की फिल्म होने के बावजूद विजय रत्नाकर गुट्टे ने कहीं भी समझौता नहीं किया है. चीजों को वैसे ही बताने की कोशिश की है जैसा कि उन घटनाओं का विवरण किताब में है. इस देश में राजनीतिक परिप्रेक्ष्य पर कम फिल्में ही बनती हैं और उनमें से ज्यादातर फिल्मों में समझौता काफी हद तक नजर आता है. इस फिल्म में ये कमी आपको नजर नहीं आएगी. अगर कांग्रेस के लोग इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं तो इसके बारे में यही कहा जा सकता है कि सच कड़वा होता है. ये फिल्म एक परफेक्ट फिल्म नहीं है अपनी खामियों की वजह से लेकिन अनुपम खेर और अक्षय खन्ना इस कमी को काफी हद तक अपने अभिनय से दूर कर देंगे. इस हफ्ते आप देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री के कार्यकाल के समय जो चालें राजनीतिक बिसात पर चलनी पड़ी थी उनके न चाहने के बावजूद, उसके दर्शन आपको इस फिल्म में हो जाएंगे और जी हां ये मजेदार भी है.

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