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TRIBUTE : 1984 में श्रीदेवी ने दिया था बॉलीवुड को मार्केटिंग स्ट्रैटेजी 'तोहफा'

एक अलग मार्केटिंग के नजरिए ने श्रीदेवी को बनाया सुपरस्टार

Updated On: Feb 25, 2018 03:26 PM IST

Abhishek Srivastava

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TRIBUTE : 1984 में श्रीदेवी ने दिया था बॉलीवुड को मार्केटिंग स्ट्रैटेजी 'तोहफा'

सन् 1984 में जब श्रीदेवी की फिल्म तोहफा सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी तब किसी को इस बात का अंदेशा नहीं था कि ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचाने वाली है. श्रीदेवी की शुरुआत हिंदी फिल्मों में भले ही 1979 में फिल्म ‘सोलवां साल’ से हो गई थी लेकिन उन्हें 1983 तक स्टारडम के लिए रुकना पड़ा. अपनी पहली फिल्म न चल पाने की वजह से श्रीदेवी को वापस साउथ का रुख करना पड़ा था लेकिन जब ‘हिम्मतवाला’ से उनकी वापसी हुई तब वो एक तरह से आंधी थी जिनको रोकने वाला कोई दूसरा नहीं था.

सन 1983 में ही उन्होंने कुछ एक ऐसी फिल्में दे दी थीं जिसकी वजह से जब फिल्म ‘तोहफा’ रिलीज हुई तब उसके प्रमोशन में उनके चेहरे का इस्तेमाल फिल्म के निर्माता ने ज्यादा किया क्योंकि तब तक उनका नाम सफलता की गारंटी बन चुका था.

आजकल फिल्मों से ज्यादा उनकी मार्केटिंग स्ट्रैटेजी के बारे में ध्यान दिया जाता है और निर्माताओं की मानें तो फिल्म को हिट या फ्लॉप होने में उनका एक बड़ा हाथ होता है. लेकिन ये जानकर काफी लोगों को आश्चर्य होगा कि श्रीदेवी की फिल्म ‘तोहफा’ जब 1984 में बॉक्स आफिस पर रिलीज हुई थी तब उस फिल्म ने भी एक अनूठे मार्केटिंग स्ट्रैटेजी का सहारा लिया था महज श्रीदेवी के स्टारडम को भुनाने के लिए.

टेलीविजन की मौजूदगी उन दिनों में न के बराबर होने की वजह से फिल्मों को लोगों तक पहुंचने के लिए रेडियो या फिर अखबारों में विज्ञापन का ही सहारा लिया जाता था. महज श्रीदेवी के जबरदस्त स्टारडम की वजह से फिल्म के निर्माता डी रामानायडू ने एक नया तरीका इजाद किया. दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और चेन्नई के जितने भी व्यस्त ट्रैफिक चौराहे थे उनको ‘तोहफा’ के पोस्टरों से पाट दिया गया था.

‘तोहफा’ के पोस्टर इतने भारी तादाद में थे कि उस वक्त की बाकी सभी फिल्में इसकी चकाचौंध में धूमिल हो गई थीं. चाहे ट्रैफिक चौराहे हों या रोड के डिवाइडर - श्रीदेवी, जीतेन्द्र और जया प्रदा सभी पोस्टरों में अलग-अलग पोजेज में थे. बड़े बैनर की फिल्म होने की वजह से इस पूरे गतिविधि को बड़े ही चपलता से अंजाम दिया गया था.

लेकिन इसका सिलसिला महज पोस्टरों तक ही सीमित नहीं था. श्रीदेवी के स्टारडम को टेलीविजन पर भी भुनाने की जुगत निकाल ली गई थी. ‘तोहफा’ को एक जबरदस्त हिट बनाने में दूरदर्शन के चित्रहार कार्यक्रम का भी एक बहुत बड़ा हाथ था. चित्रहार उन दिनों आधे घंटे का कार्यक्रम हुआ करता था जिसमें पुरानी फिल्मों के गाने दिखाए जाते थे. आधे घंटे के इस सुरमयी प्रोग्राम के दीदार दर्शकों को बुधवार और शुक्रवार शाम को होता था. फिल्म ने एक डील के तहत अपने फिल्म के गाने चित्रहार में दिखाने शुरू कर दिए. ये एक बिलकुल ही नायाब और अनूठी स्ट्रैटेजी थी जिसने बॉलीवुड को एक अलग रास्ता दिखा दिया था. चाहे वो ‘एक आंख मारुं तो’ या फिर ‘अलबेला मौसम’ गाने हों - ये सभी लोग की जुबान पर चढ़ गए थे. रिलीज होने के बाद इसकी सफलता का प्रमाण श्रीदेवी की साड़ियों में था. साड़ी की दुकानों पर औरतें उन साड़ियों की डिमांड करने लगीं जो श्रीदेवी ने फिल्म ‘तोहफा’ में पहनी थीं.

इस अनूठी स्ट्रैटेजी को लेकर फिल्म के निर्माता डी रामानायडू ने बाद में इस बात का खुलासा किया था कि श्रीदेवी का स्टारडम सन 1984 में बॉलीवुड में एक अलग मुकाम पर पहुंच गया था और जितेंद्र के चाहने वाले पहले से ही साउथ और दिल्ली में भारी तादाद में थे. श्रीदेवी का स्टारडम उस वक्त तक बॉलीवुड में कितना बड़ा हो चुका था ये इसी बात से पता चल जाता है कि सन् 1984 में जो तीन सबसे बड़ी कामयाब बॉलीवुड की फिल्में थीं उनमें ‘तोहफा, मकसद और शराबी’ क्रमश: शामिल थीं. पहली दो फिल्मों में श्रीदेवी ही थीं.

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