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सैराट के बहाने नाकाम प्यार के ‘जातिवादी’ किस्से

नागराज मंजुले की मराठी फिल्म सैराट की जबरदस्त सफलता का जश्न थमा नहीं है

Updated On: Nov 17, 2016 08:04 AM IST

Vivek Anand Vivek Anand
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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सैराट के बहाने नाकाम प्यार के ‘जातिवादी’ किस्से

 

नागराज मंजुले की मराठी फिल्म सैराट की जबरदस्त सफलता का जश्न थमा नहीं है. जाति पूर्वाग्रह के अंधेरे कोनों को दिखाती फिल्म की मीडिया में विशेष चर्चा हो रही है. फिल्म का अंत दिल को तोड़ देने वाला है. दर्शक भारी दिल लेकर सिनेमा हॉल से बाहर निकलते हैं.

ऐसी कोई दूसरी लोकप्रिय फिल्म याद नहीं पड़ती. जो ऐसे भारी अंत के बावजूद इतनी कामयाब रही हो. खासकर तब, जब कर्मशियल सिनेमा जिंदगी के राग-रंग में डूबा हो. बात सिर्फ इतनी भर नहीं है. दरअसल एक मुद्दे के तौर पर जातियों का विरोध लोकप्रिय सिनेमा के फोकस में कम ही रहा है.

हिंदी सिनेमा में ऐसे विषय पर बनी फ्रैंज ऑस्टिन की फिल्म अछूत कन्या (1936) की याद पड़ती है. इसके बाद बिमल रॉय की सुजाता (1960) और हाल की फिल्म खाप (2011) भी है. इन फिल्मों की पड़ताल से समझा जा सकता है, कि सबने एक ही थीम पर काम किया. वो थी- अंतर्जातीय विवाह करने वाले प्रेमी जोड़ों का परिवार और समाज की तरफ से विरोध.

ऐसे पूर्वाग्रह को दिखाती के बालाचंदर की फिल्म एकदूजे के लिए (1981) भी है. जो जाति के खांचों में बंटे उत्तर और दक्षिण भारत का संघर्ष दिखाती है. एक तरह से देखें तो फिल्मों में जातिवाद की बुराइयों को कम करके दिखाया गया है.खासकर पॉपुलर सिनेमा में. जाति दरअसल सत्ता की बुनियाद गढ़ने वाली ताकतों में से एक है. लेकिन इन सभी फिल्मों ने उसके तर्कहीन पूर्वाग्रहों वाली कमजोरियां ही सामने रखीं. इस कमी को कुछ कला फिल्मों ने पूरा किया.

मशहूर फिल्मकार श्याम बेनेगल की फिल्म अंकुर (1973) या सत्यजीत रे की सद्गति (1981) की कहानी ही देख लीजिए. इनमें कहानी का फोकस एक शक्तिशाली जाति का दूसरे कमजोर जाति के दमन पर रहा. अब सवाल ये उठता है. कि अगर लोकप्रिय सिनेमा जाति के मुद्दे को ताकत और रसूख से जुड़ा एक राजनीतिक मसला न मानते हुए, प्यार और रोमांस से जुड़े पूर्वाग्रहों को प्रदर्शित करने वाला मुद्दा मानता है. तो उनके नजरिए का वास्तविकता से लेना-देना है भी या नहीं ?

वास्तविकता के करीब रहकर भी उबाऊ नहीं

सैराट कई मायनों में एक अलग किस्म की लोकप्रिय फिल्म है. इसकी हिरोइन के ‘देविका रानी’ और ‘नूतन’ की तरह ग्लैमरस न होने का भी अपना आकर्षण है. देविका रानी, नूतन से लेकर अंकुर और सद्गति की हिरोइनें शबाना आजमी और स्मिता पाटिल तक दलित महिला की भूमिका में अपने ग्लैमर की वजह से व्यावहारिक नहीं दिखतीं.

Sairat

इस मायने में सैराट पॉपुलर सिनेमा के खांचे में फिट न बैठते हुए भी हकीकत के करीब है. अगर आपने फिल्म देखी है, तो फिल्म की कहानी में वही सब है- एक ऊंची जाति के संपन्न-राजनीतिक परिवार की लड़की का गरीब मछुआरे लड़के से प्यार, उनका घर से भागना और उसके बाद का संघर्ष, इसी बीच उन दोनों के बच्चे का जन्म और अंत में जब लड़की अपने मां-बाप से टूटे रिश्ते को फिर से जोड़ना चाहती है, तो दोनों की भयावह ऑनर किलिंग.

सैराट वास्तविकता के करीब रहकर भी उबाऊ नहीं होती. और यही इसका सबसे मजबूत पक्ष है. लेकिन इसके बावजूद शुरुआत में फिल्म लोकप्रिय सिनेमा के मसालेदार मोड से बाहर नहीं निकल पाती. करीब सभी पॉपुलर फिल्में घटनाओं को दर्शाने में हकीकत से कट जाती हैं. इन फिल्मों में कहानी कहने का तरीका उपन्यास जैसा नहीं बल्कि पौराणिक महाकाव्यों की तरह का होता है. वास्तविकता के करीब रहकर कहानी कहने का जोखिम कला फिल्मों में ही दिखाई देती है.

कला फिल्में उपन्यासों की तरह सीधे-सच्चे लोगों को हूबहू पर्दे पर उतार देती है. वहीं पॉपुलर सिनेमा में गरीब की कहानी भी दिखानी हो, तो नायकों के तामझाम को जबरन भरा जाता है. हीरो के विराट व्यक्तित्व को रचने के दौरान इंसानी काबिलियत की कसौटी पर ऐसी फिल्में कई जगहों पर लड़खड़ा जाती हैं. आखिर अर्जुन जैसे वीर पुरुष भी युद्धभूमि की हकीकत देखकर एकबारगी दुविधा में पड़ गए थे. नायकों के ऐसे काल्पनिक चरित्र सलमान खान की ब्लॉकबस्टर फिल्मों में आसानी से दिख जाते हैं. सैराट जैसी ग्लैमरविहीन फिल्म पॉपुलर सिनेमा की इस तय परंपरा को तोड़ती दिखती है.

हालांकि फिल्म के शुरुआत में हीरो पर्श्या (आकाश तोसर) की छवि आम पॉपुलर सिनेमा के नायकों वाली ही दिखती है. क्रिकेट टीम का कप्तान पर्श्या विरोधी टीम की बॉलिंग को ऐसे धराशायी करता है, मानों वही उसका एकमात्र लक्ष्य होने वाला हो. ऐसा लगता है जैसे महाभारत के युद्ध में अर्जुन कौरवों की फौज पर ताबड़तोड़ हमले जड़ रहे हों.

पर्श्या और आर्ची (रिंकु राजगुरू) क्लासमेट हैं. जाहिर है, पर्श्या अपने क्लास का टॉप स्टूडेंट ही होगा. इस जोड़ी का प्यार उपन्यास की कहानियों की तरह नहीं पनपता. बल्कि मसाला फिल्मों की तरह पहले तकरार होती है, फिर वो एकदूसरे को परखते हैं, फिर दोनों की प्रेम कहानी का एक कॉमन प्लेटफॉर्म बनता है.

दोनों के प्यार को परिवार का समर्थन नहीं मिलता. लेकिन इससे उनके प्यार में कमी नहीं आती. घर से भागने के बाद आर्ची अपने परिवार से संपर्क स्थापित करती है. लेकिन इसके पीछे पर्श्या के लिए उसके प्यार में कमी नहीं बल्कि गरीबी के संघर्षों की उलझनें होती हैं.

फिल्मों के संदेश यूनिवर्सल होते हैं

उनदोनों का प्यार और उस प्यार का विरोध फिल्म के केंद्र में है. उनके प्यार पर खतरा लगातार बना रहता है. ऐसे लोगों से भी जो उनसे परिचित तक नहीं हैं. बिना किसी पूर्वाग्रह के सच्चे प्यार के अस्तित्व का होना ही फिल्म का संदेश है. जिसमें संयोग से जाति का संघर्ष आ जाता है.

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प्रेम जोड़ों के परिवार सामाजिक बराबरी वाले नहीं हैं. लेकिन दोनों परिवारों के मतभेद को फिल्म में ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई है. दो प्यार करने वाले जज्बातों की ऐसी वीरान जमीन पर खड़े होते हैं. जहां अहसासों के नाम पर युद्ध से हालात हैं.

भारत का लोकप्रिय सिनेमा किसी तरह की प्रासंगिक सच्चाई की मिसाल पेश नहीं करता. फिल्मों के संदेश यूनिवर्सल होते हैं. मसलन अपने राष्ट्र, समाज या परिवार के लिए वफादार रहें ( मंदर इंडिया, लगान, हम आपके हैं कौन ). नए मिलेनियम में अपनी अंतरात्मा की आवाज के प्रति वफादारी दिखाने में तेजी आई है (बंटी और बबली, थ्री इडियट्स). कहने का मतलब ये है कि प्रासंगिक सच्चाई भी एतिहासिक विकास की कसौटी पर तय होती है.

मसलन, ‘युद्ध बुराई है’ प्रथम विश्वयुद्ध पर बनी एक अमेरिकन फिल्म का संदेश हो सकता है. जबकि नाजियों की दुष्टता और उसके कथित विरोध वाली दूसरे विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म, ऐसे संदेश को अनुचित बना देगी. ठीक इसी तरह से वित्तीय गड़बड़ी पर बनी हॉलीवुड की फिल्म ( आर्बिट्राज, 2012) का संदेश प्रासंगिक है.

हिंदुस्तान के औपनिवेशक दौर को पर्दे पर उतारने वाली बॉलीवुड की फिल्म (1942 ए लव स्टोरी) अपवाद स्वरूप है. इसे न एतिहासिक कहा जा सकता है, न देशभक्ति वाली फिल्म. भावना के तौर पर देशभक्ति प्रासंगिक नहीं है. जबकि राजनीति हमेशा प्रासंगिक होती है. लेकिन जब बॉलीवुड में समानांतर राजनीति (राजनीति, 2010) पर फिल्म बनती है. तो फिल्म को यूनिवर्सल संदेश देने वाला बनाने के लिए महाभारत की घटनाओं से प्रेरणा ली जाती है.

राजनीतिक होने पर जाति का मुद्दा प्रासंगिक हो जाता है. वहीं जाति के पूर्वाग्रह का मसला अपने प्रभाव में टाइमलेस है. अगर हम याद करें तो महाभारत में कर्ण और एकलव्य दोनों ऐसे पूर्वाग्रहों से पीड़ित रहे. हालांकि महाभारत में इनके साथ हुए भेदभाव को धार्मिक परंपरा का नजरिया दिया गया न कि पूर्वाग्रह का. जबकि आज हम इसकी विस्तार से व्य़ाख्या कर सकते हैं, कि इन दोनों नायकों को पूर्वाग्रहों की कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी.

जाति उस वक्त से एक अत्यधिक राजनीतिक मुद्दा है, जबसे सामाजिक प्रभुत्व को बनाए और आगे बचाए रखने की कोशिशें शुरु हुईं. अपने असर में ये प्रासंगिक हो जाता है. मसलन, बदलते परिदृश्य में अगर आज बी आर अंबेडकर होते तो शायद दलितों का उत्थान अपने जीवनकाल की तुलना में ज्यादा कर पाते.

दलित दशकों के अपने संघर्ष और उससे उपजी ताकत के बूते जानवरों के शव हटाने से मना कर देते हैं. लेकिन इसके बावजूद हम उन्हें पीड़ित के तौर पर देखना ही पसंद करते हैं. चैतन्य तम्हाने की कोर्ट (2015), जो दलितों के मुद्दों की पड़ताल कर रही है, एक निर्वाचन क्षेत्र के दलित एक्टविस्ट को राज्य के खिलाफ असहाय पाती है. अरसे तक मुद्दे को सुलझा नहीं पाती. स्पष्टवादी दलितों को उनकी स्थिति के आधार पर राजनीतिक तौर पर लुभाया जाता है. ताकि उनका गुट जागरुक मतदाताओं का समूह न बन जाए.

प्यार और पूर्वाग्रह को लेकर व्यावहारिक

जाति समूहों में अगर मजबूती आने लगे तो उनके भीतर गड़बड़ी की संभावना भी बन जाती है. क्योंकि राज्यों की कार्रवाई से फायदा उठाने की होड़ शुरू हो जाती है. बहस का मुद्दा ये है कि जाति प्रासंगिक/ राजनीतिक मुद्दा है, क्योंकि इसी आधार पर उनके हालात चित्रित होते हैं. इसे टाइमलेस/ भावनात्मक मुद्दे के तौर पर लेना वंचितों को और कमजोर करने जैसा होगा.

sairat हाल के वर्षों में ऑनर किलिंग जातियों के खांचे में बंटे समाज की क्रूर अभिव्यक्ति बन गई है. जाहिर तौर पर एक पिता का अपनी ही संतान की हत्या करना पूर्वाग्रह से ज्यादा चिंता का विषय है. कोई नहीं कह सकता कि ऐसी हत्याओं के फैसले किस आधार पर लिए जाते हैं. मालूम पड़ता है कि इसकी वजह अपनी झूठी शान से समझौता न करना हो या पारिवारिक दायरे में मर्दवादी मानसिकता को चुनौती देना.

ऑनर किलिंग को अपने संतान के प्रति लगाव की कमी से जोड़कर देखना सबसे आसान है. शायद ऐसे लोग अपने अधिकार को चुनौती देने को व्यक्तिगत भावनाओं पर तरजीह देते हों. इस लिहाज से अधिकार को चुनौती देने का भय जितना बड़ा होगा, सम्मान के लिए हत्या को वाजिब ठहराने का झूठा तर्क भी बड़ा होगा.

लेकिन इन सब अटकलों को दूर रखते हुए. हम मान सकते हैं कि ऐसे क्रूर फैसलों को किसी न किसी तरह से राजनीतिक ताकत प्रभावित करती है. ऑनर किलिंग अपने करीबियों, आश्रितों और दुश्मनों के लिए क्रूरता का भीषण प्रदर्शन हो सकता है. क्योंकि ये सबसे करीब लोगों के खिलाफ होता है.

ये स्पष्ट है कि सैराट ऐसे मामलों में राजनीतिक समझ पैदा होने की हर संभावना को किनारे करने वाला है. परिवार का आर्ची के प्रति कम लगाव दिखाकर कहीं न कहीं इस बात की पुष्टि की गई है. कि ऐसे मामले वहीं होते हैं, जहां संतानों से लगाव कम होता है.

इस नजरिए से देखें तो फिल्म प्यार और पूर्वाग्रह को लेकर व्यावहारिक लेकिन गैर प्रासंगिक सच को बतलाता है. क्योंकि पॉपुलर सिनेमा का प्रांसगिक/ राजनीतिक सच से कोई वास्ता नहीं होता. ये पॉपुलर सिनेमा का स्वभाव बन गया है. इस संदर्भ में सैराट का अंत चौंकाने वाला है. लीक से हटकर जा रही फिल्म का अंत कुछ और ही निकलता है. जाति से जुड़े झूठे सम्मान को चुनौती देने वाली कहानी आखिर में जाकर एक नाकाम प्यार की दंतहीन कथा में बदलकर रह जाती है.

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