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Review वीआईपी 2 : काजोल और धनुष की ये फिल्म जनता के साथ मजाक है

काजोल और धनुष जैसे स्टार्स के होने के बावजूद इस फिल्म से आपको दूर रहने की सलाह दी जाती है

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Abhishek Srivastava Updated On: Aug 18, 2017 02:02 AM IST

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Review वीआईपी 2 : काजोल और धनुष की ये फिल्म जनता के साथ मजाक है
निर्देशक: सौंदर्या रजनीकांत
कलाकार: काजोल, धनुष

आमतौर पर साउथ की फिल्मों में मसाले का तड़का बॉलीवुड के मुकाबले कुछ ज्यादा होता है. फर्क सिर्फ इतना ही होता है की कुछ मसालों को आप अच्छी तरह से पचा लेते हैं और कुछ को बिल्कुल भी नहीं. बदहजमी का शिकार होना पड़ता है. बदकिस्मती से इस हफ्ते रिलीज हुई वीआईपी 2 (ललकार) दूसरी श्रेणी में आती है. इस फिल्म को देखने के बाद माथा थोड़ा घूम जाता है और क्लाइमैक्स देखकर उसी माथे में सिरदर्द होने लगता है. वीआईपी 2 का उद्देश्य बिल्कुल साफ है - नाच, गाने, एक्शन और साउथ की फिल्मों में उनके सितारों के सिग्नेचर स्टाइल की बदौलत दर्शकों को सिनेमाहॉल तक खींच कर ले आना.

लेकिन फिल्म को देखने के बाद एक बात को पक्की है कि फिल्म की निर्देशिका सौंदर्या रजनीकांत जो सुपरस्टार रजनीकांत की बेटी हैं, को यह बात सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा कि आखिर मसाला फिल्में बनती कैसी हैं. जनता का प्यार उनको इस फिल्म से मिलेगा इस बात पर प्रश्नचिह्न चिन्ह लगा हुआ है.

इस फिल्म की कहानी काजोल यानी वसुंधरा और धनुष यानी रघुवरन के बारे में है. दोनों को अपने फ़ील्ड में महारत हासिल है. जहां धनुष पुरस्कार से नवाजे हुये इंजीनियर हैं तो वही दूसरी ओर काजोल एक आर्किटेक्ट कंपनी की मालकिन हैं. धनुष एक फर्म के लिये काम करते हैं और उस फर्म के मालिक को बेहद चाहते हैं क्योंकि उनके धनुष के ऊपर ढेर सारे एहसान हैं. इसी की वजह से जब धनुष, काजोल की फर्म में नौकरी के लिये मना कर देते हैं तो काजोल तिलमिला उठती हैं क्योंकि उनकी फर्म में काम करने के लिये लोग तरसते हैं.

इसके बाद काजोल धनुष से बदला लेने के लिये एक के बाद वार करती हैं जिसकी वजह से आगे चलकर धनुष को अपनी फर्म से इस्तीफा देना पड़ता है और उनकी खुद की छोटी कंपनी वीआईपी कंस्ट्रक्शन्स को वो टेकओवर कर लेती हैं. मामला और भी आगे बढ़ता है जब धनुष की कंपनी को एक थीम पार्क बनाने का ठेका मिलता है. लेकिन जब धनुष की टीम वहां की मिट्टी की जांच पड़ताल करती है तो उन्हे पता चलता है कि मिट्टी इस लायक नहीं है कि उसके ऊपर कंस्ट्रक्शन का काम हो सके. धनुष उस काम को जब छोड़ देते हैं और थीम पार्क बनाने का कांट्रैक्ट काजोल की कंपनी को मिल जाता है. इसके बाद धनुष कैसे काजोल को बताते हैं कि उस ज़मीन पर कुछ भी बनाना अवैध होगा और आगे चलकर दोनों में कैसे दोस्ती होती है यही फिल्म की कहानी है.

अभिनय की बात करें तो काजोल एक नो नॉनसेंस कार्पोरेट मैनेजिंग डायरेक्टर की भूमिका में काफी सटीक लगती हैं लेकिन ये भी सच है कि पूरी फिल्म में उनके चेहरे पर एक ही तरह का एक्सप्रेशन है - गुस्से का जो कुछ समय के बाद अपना असर दिखाना बंद कर देता. धनुष चाहे किसी भी तरह का अभिनय करे वो लुभाने वाला ही होता है क्योंकि अभिनय की बारिकियों से वो अच्छी तरह से परिचित हैं.

फिल्म में यही दोनों मूल किरदार हैं. फिल्म में वहां की जानी मानी अभिनेत्री अमला पॉल भी है जो फिल्म में धनुष की पत्नी के रोल में हैं लेकिन उनका रोल भरपाई ही है जिसमें कोई दम नहीं है. इसके अलावा बाकी किरदारों का अभिनय साधारण है. इस फिल्म को देखकर साफ जाहिर होता है कि सौंदर्य रजनीकांत ने इसे अपने ही परिवार के धनुष के स्टारडम के कैश करने की कोशिश की है जिसमें वो पूरी तरह से विफल रही हैं.

कुछ यही हाल फिल्म की कहानी का भी है जिसे धनुष ने खुद लिखा है. इस फिल्म को मैंने हिंदी डब्ड वर्सन में देखा और मुमकिन है कि तमिल से हिंदी तर्जुमे के वक्त कई चीजों का मतलब गायब हो जाता है. मुझे तमिल नहीं आती इसलिये इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है लेकिन जो कॉमेडी के सींस के इस फिल्म में मुझे दीदार हुये मसलन कि जब धनुष अपने घर शराब पीकर आते हैं और हंगामा करते हैं या फिर जब वो अपने फर्म के सीनियर को मोपेड पर उनके घर नशे की अवस्था में छोड़ने जाते हैं तब उस वक्त के डायलॉग्स को सुनकर यही मुंह से आवाज़ निकलती है कि है हे भगवान आखिर हो क्या रहा है.

देखकर यही लगता है कि ये डायलॉग्स किसी ने शर्तिया तौर पर नशे की हालत में लिखे होंगे. बेहद ही बचकाना और इन पर हंसने की बजाय रोना आता है. फिल्म में गाने ठूंसे हुए हैं. जब चश्मे और फॉर्मल शर्ट टाई के दायरे से बाहर निकल कर धनुष अचानक काला चश्मा और जैकेट पहन लेते हैं तो पता चल जाता है कि ये एक फॉर्मूला फिल्म है. अगर आज के टेस्ला कार के जमाने में आप हीरो की मोपेड से हंसी निकलवाना चाहते है तो ये बड़ी भूल है. फिल्म का साउंड ट्रैक भी इतना लाउड है कि कान को कभी कभी बंद करने का मन करता है.

जनता के सब्र की परीक्षा तब ली जाती है जब काजोल और धनुष बारिश में फंस जाते हैं और उन दोनों को रात काजोल के ऑफिस में गुजारनी पड़ती है. ये सब कुछ क्लाइमैक्स के कुछ समय पहले होता है. दोनों साथ में बातें करते हैं, नोंकझोंक होती है, वाइन भी पीते हैं और खाना भी खाते हैं और जब सुबह होती है तो सालों की दुश्मनी दोस्ती में तब्दील हो जाती है.

काजोल की मर्सीडीज गाड़ी धुंआधार बारिश की वजह से खराब हो जाती है और तब धनुष अपने मोपेड पर बिठाकर उनको अपने घर ले आते हैं जहां पर उनकी पत्नी उनको डोसा खिलाती है. जी हां...इसके बाद फिल्म खत्म हो जाती है और तब दर्शक यही सोचता है कि काश ये धुंआधार बारिश फिल्म के शुरु में ही हो जाती तो वो इस टार्चर से वो बच जाते.

इस फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके लिये आप अपने दो घंटे बर्बाद करें. फार्मूला फिल्म भी बनाने का एक तरीका होता है और सौंदर्या को इस गुर को सीखने के लिये अभी कुछ समय और लगेगा. हालिया समय में साउथ की कई मसाला फिल्में हिंदी में बनी थीं जिसे दर्शकों ने बेहद सराहा था लेकिन ऐसा कुछ भी कहना वीआईपी 2 के लिए गलत होगा. कॉमेडी देखकर हंसी नहीं आती और एक्शन का मतलब सुपर स्लो मोशन नहीं होता है, ये बात फिल्म बनाने वालों के लिये जानना बेहद जरूरी है. मुझे इस फिल्म में ढेरों उम्मीदें थीं लेकिन एक भी उम्मीद मेरी पूरी ना हो सकी. ये फिल्म समय की बर्बादी है और बेहतर है आप इससे दूर रहें.

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