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Review Shab : डायरेक्टर ऑनिर की अब तक की सबसे घटिया फिल्म है 'शब'

ऑनिर की शब आपको भ्रम में डालेगी, रिश्तों की परतों खोलने में आपको खासा परेशानी होगी

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Abhishek Srivastava Updated On: Jul 14, 2017 11:09 AM IST

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Review Shab : डायरेक्टर ऑनिर की अब तक की सबसे घटिया फिल्म है 'शब'

निर्देशक ऑनिर की शब आपको कंफ्यूजन के ऐसे चक्रव्यूह में डालेगी जहां से आपका बच कर निकलना बेहद ही जटिल और मुश्किल काम होगा. रिश्तों की उलझन को सुलझाने की कोशिश में ऑनिर ने दर्शकों को पूरी तरह से उलझा दिया है.

माई ब्रदर निखिल और बस एक पल जैसी सुलझी हुई फिल्में बनाने वाले ऑनिर के लिये उनकी ताज़ा फिल्म शब उनके फिल्मी करियर की सबसे कमजोर फिल्म मैं मानूंगा.

हर डिपार्टमेंट में फेल

फिल्म को देखकर यही लगता है कि ऑनिर इतनी सतही फिल्म कैसे बना सकते हैं. इसके प्रोडक्शन वेल्यू कमजोर है, अभिनेताओं का अभिनय कमजोर है और सबसे बड़ी बात इसका संगीत भी कमजोर है. फिल्म का नाम शब क्यूं है इसको भी समझने में आपको खासा मशक्कत करनी पड़ेगी.

कमजोर कहानी, घटिया अभिनय

कहानी उत्तराखंड के एक छोटे से इलाके धनौल्टी के मोहन यानि की आशीष बिष्ट की है जिसके सपने बड़े हैं. मोहन माडलिंग करने की चाह रखता है लिहाजा अपने सपनों को संजोने के लिये दिल्ली का रुख करता है. एक कांपटिशन में शिरकत करने का मौका तो उसे मिलता है लेकिन कई चीजों की जानकारी ना होने की वजह से वो विजेता बनने से चूक जाता है. वहीं पर उसकी मुलाकात होती है सोनल मोदी यानि की रवीना टंडन से जो की एक बड़े उद्योगपति की बीवी है.

उद्योगपति की भूमिका में है संजय सूरी जिनका फिल्म में बेहद ही छोटा सा रोल है. बाद में सोनल, मोहन को अपना पर्सनल ट्रेनर बना लेती है और साथ ही साथ शारीरिक संबंध भी. मोहन की यही कोशिश है कि रवीना की मदद से वो डिज़ाइन की दुनिया की बड़े नामों तक पहुंच जाये जिस वजह से उसको माडलिंग का मौका मिले.

समानांतर स्टोरी का कन्फ्यूजन

लेकिन बदले में मोहन को कुछ मिलता है तो वो है मायूसी. इस बीच एक समानांतर कहानी भी चलती है अर्पिता चटर्जी यानि की रैना अपनी बहन के साथ रहती है और अपने समलैंगिक दोस्त के रेस्त्रां में काम करती है. एक और भी कहानी है एक फ़्रेंच भाषा पढ़ाने वाले विदेशी की जो कुछ कारण वश हिंदुस्तान आ बसा है. फिल्म के आखिर में सारी कहानियां ओवर लैप करती है.

एक्टर आशीष बिष्ट ने खोया मौका

अभिनय की बात करे तो रवीना टंडन और अर्पिता बनर्जी सभी ने सधा काम किया है. अगर किसी ने अभिनय नहीं किया है तो वो है फिल्म के मुख्य अभिनेता आशीष बिष्ट ने उनको एक सधा हुआ बेहद ही पावरफुल मौका मिला था अपने अभिनय के प्रदर्शन का लेकिन उन्होंने वो मौका पूरी तरह से गंवा दिया है.

ऑनिर ने किया कबाड़ा

लेकिन सबसे बड़ा मुज़रिम फिल्म का कोई है तो वो निश्चित रुप से ऑनिर ही हैं. ऑनिर की फिल्मों की ख़ासियत रहती है कि वो रिश्तों की संजीदगी को अपनी फिल्मों में बखूबी दिखाते हैं लेकिन इस बार शब देखकर लगता है कि वो फार्मूला अब वो भूल चुके हैं.

संगीत भी पड़ा वीक

अगर आप बात दो समलैंगिक प्रेमियों की कर रहे हैं तो उनके रिश्तों की गहराई को दिखाना बेहद ही ज़रुरी है क्योंकि आपकी फिल्म की कद्र करने वालों में बुद्धीजीवी वर्ग का एक बड़ा तबका रहता है. मिथुन और ऑनिर का कांबिनेशन इसके पहले कई फिल्मों में कारगर साबित हो चुका है लेकिन संगीत के मामले में यहां पर चूक हो गई है.

सिनेमैटोग्राफी है उन्नीस

कोई भी ऐसा गाना फिल्म में नहीं है जो आपके दिल में उतरता है या फिर सिनेमाहॉल से निकल कर आप उसे गुनगुनाते हैं. सिनेमोटोग्राफी के मामले में फिल्म बाकी डिपार्टमेंट से उन्नीस है. दिल्ली के हौज़ खास इलाके के रेस्त्राओं को बड़े ही रंगीन तरीके से दिखाया गया है.

डायलॉग्स ने किया निराश

डायलॉग्स इस फिल्म के बेहद कमजोर है. फिल्म में एक इंटेस सीन है जब रैना और मोहन एक रेस्त्रां में अकेले बैठे हैं और बिजली गुल हो जाती है. रोशनी के लिये जब रैना मोमबत्ती लेकर आती है तो मोहन उसके बेहद करीब आ जाता है और उसके बाद जो डायलॉग रैना की ओर से निकलता है तब माहौल कॉमेंडी सा हो जाता है.

ऑनिर ने की गलतियां

फिल्म कभी कभी एबरप्ट भी नजर आती है. इसका शानदार नमूना आपको फिल्म के शुरु में ही मिलेगा जब मोहन का किरदार होटल के लाबी में रवीना से मेलजोल बढ़ाने की कोशिश करता है लेकिन रवीना उसे पूरी तरह से इग्नोर कर देती है, इन दोनों का जो अगला सीन है उसमें ये दोनों एक साथ कार में सफर करते नजर आते हैं.

देखकर आश्चर्य होता है कि ऑनिर जैसा सुलझा निर्देशक इसमें ग़लती कैसे कर सकता है. फिल्म में जो समलैंगिक डिज़ाइनर बने हैं उनको फिल्म में कुछ ऐसा ही दिखाया गया है कि युवकों का शिकार करना उनका शौक है.

आशीष ने किया निराश

एक छोटे से पहाड़ी शहर का लड़का जब शहर आता है कुछ सपने संजोकर तो उसके हाव भाव में एक डर रहता है और कांफीडेंस दबा-दबा रहता है. ये एक बेहद ही शानदार मौका था आशीष के लिये जहां पर वो अभिनय की छटा बिखेर सकते थे लेकिन अफसोस ऐसा कुछ भी नहीं है फिल्म में.

साफ देखकर लगता है ऑनिर का सिनेमा यूरोप के सिनेमा से प्रेरित है, लेकिन उनको साथ साथ इस बात को भी समझना चाहिये की अगर आपकी फिल्म कमर्शियल फिल्मों के दायरे में आती है तो ऐसे चीजों से दूर रहना बेहतर होता है.

समलैंगिक संबधों पर हिंदुस्तान में जो भी फिल्में बनी हैं उनका स्तर बाहर की विदेशी फिल्मो के मुकाबले काफी नीचे है जो कुछ भी अच्छा हमने इसके पहले हिंदुस्तान में देखा है वो ऑनिर के निर्देशन में ही हमने देखा है लेकिन इस बार वो धार गायब नजर आती है.

इस फिल्म को पूरी तरह से समलैंगिक रिश्तों पर आधारित कहना भी गलत होगा क्योंकि ये सिर्फ फिल्म की कई कड़ियों में से एक कड़ी है लेकिन जिस हिसाब से इसके उपर फिल्म में समय दिया गया है उसके देखकर यही लगता है.

ये फिल्म मानवीय रिश्तों के बारे में है लेकिन सतही ट्रीटमेंट होने के कारण ये अंदर की भावनाओं के तार को झनझनाने में कामयाब नहीं हो पाती है. फिल्म एक हद के बाद बोझिल हो जाती है. यहां पर मैं धन्यवाद दूंगा पत्रकार बिरादरी के उन तीन सदस्यों को जो बिल्कुल मेरी पीछे की सीट पर फिल्म की प्रेस स्क्रीनिंग के दौरान बैठे थे. उनके रेगुलर कमेंट्स की वजह से ही मैं इस 104 मिनट की फिल्म को झेल पाया.

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