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Review कैदी बैंड : कैदियों से कोई शिकायत नहीं है, शिकायत बैंड मास्टर से है...

फिल्म से आदर जैन और आन्या सिंह का डेब्यू हुआ है, जिन्होंने काफी अच्छा काम किया है

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Abhishek Srivastava Updated On: Aug 25, 2017 11:19 AM IST

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Review कैदी बैंड : कैदियों से कोई शिकायत नहीं है, शिकायत बैंड मास्टर से है...
निर्देशक: हबीब फैजल
कलाकार: आन्या सिंह, आदर जैन, सचिन

कैदी बैंड का जब पहली बार ट्रेलर देखने का मौका मिला था तो यही लगा था कि निर्देशक हबीब फैजल ने अपनी खोई धार वापस पा ली है. बिल्कुल ही नये कलाकारों की टीम के साथ. लेकिन सच्चाई इससे कोसों दूर मिलेगी आपको जब आप ये फिल्म देखेंगे. ये फिल्म एक सतही फिल्म नजर आती है जिसमें सबस्टेंस कम नजर आता है. जब भी किसी ऐसी फिल्म की बात होती है जिसमेंं जेल के जीवन का चित्रण होता है तो दिमाग में सबसे पहले ख्याल यही आता है कि फिल्म इंटेस होगी और देखने में मज़ा आयेगा.

जब कैदी बैंड की शुरुआत होती है तब माछंग लालंग के बारे में एक कामेंट्री के नज़रिये उनके बारे बताया जाता है जो गुवहाटी के केंद्रीय कारागार में 54 साल तक बंद थे और उन्हें जब रिहा किया गया था तब उनके ऊपर कोई भी चार्ज साबित नहीं हो पाया था. जब शुरु की कामेंट्री इतनी शानदार होगी तो आगे की फिल्म को लेकर उम्मीदें बंध जाती हैं. लेकिन इन उम्मीदों पर जल्द ही तुषारापात भी हो जाता है जब इंटेसिटी की मौत धीरे-धीरे होने लगती है और उसके ऊपर लाउड संगीत हावी हो जाता है.

कहानी कुछ अंडर ट्रायल्स के बारे में है जो एक जेल में कैद हैं. जब बात 15 अगस्त के दिन एक रंगारंग कार्यक्रम की होती है जब जेल के वॉर्डन जो फिल्म में सचिन बने हैं तय करते हैं कि पुरुष और महिला वॉर्ड में से जिन लोगों की संगीत के ऊपर पकड़ है उनमें से कुछ लोगों को चुना जायेगा और वो 15 अगस्त के दिन अपने संगीत का हुनर दिखाएंगे.

किस्मत की हेराफेरी की वजह से उनका गाना बेहद हिट हो जाता और वहां पर मौजूद नेता, वार्डन को यह आदेश देता है कि इनको रिहा करने के तरीकों पर फुल स्टॉप लगा दिया जाये ताकी वो उस बैंड का फायदा आने वाले चुनावों में उठा सके. लेकिन जब इन पांच अंडर ट्रायल्स को जेल से बाहर भेजा जाता है वाद्य यंत्र खरीदने के लिए तब ये वहां से फ़रार हो जाते हैं. ख़ासी मशक्कत के बाद पुलिस इनको पकड़ने में कामयाब रहती है लेकिन तब तक पासे पलट चुके होते हैं क्योंकि तब तक इनकी दास्तां आम जनता तक पहुंच चुकी होती है.

इस फिल्म से आदर जैन और अन्या सिंह ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की है और इनके बारे ये बात कही जा सकती है कि इनको कैमरे का डर नहीं है. आगे चलकर इनके अभिनय कौशल में और सुधार आयेगा. इन दोनों का काम न्यू कमर के हिसाब से अच्छा माना जायेगा. ये भी कहना सही होगी की सचिन को छोड़कर ये फिल्म नये लोगों से भरी पड़ी है.

लेकिन अभिनय से ज्यादा अगर यहां पर किसी के बारे में बात करनी पड़ेगी तो वो है फिल्म के निर्देशक हबीब फैजल जिन्होंने अपनी पहली निर्देशित फिल्म दो दूनी चार से सबका ध्यान अपनी ओर खींचा था. लेकिन जो जादू उनकी पहली फिल्म में था वो ना इश्कजादे में दिखाई पड़ा और ना दावते इश्क में. कैदी बैंड उसी कड़ी का एक हिस्सा है. जेल की पृष्ठभूमि होने के बावजूद ये फिल्म कही भी इंटेस नहीं बन पाती है. निर्देशक के लिये तो जेल का बैकड्राप एक पूरा प्लेग्राउंड बन सकता था इमोशन्स को बाहर निकालने के लिये.

हबीब से मुझे इस बात की शिकायत है कि फिल्म में जो भी किरदार बैंड का हिस्सा बने हुए हैं उनकी कहानी सुनाकर दर्शकों की सहानुभूति उनके लिये पहले ही बटोर ली है. अब अगर बात जेल की हो रही है तो मैं इस बात को कतई नहीं मानूंगा कि उनमें से कोई कसूरवार नहीं होगा. चीजों को हबीब ने एक रंग से ही पेंट करने की कोशिश की है. बहरहाल ये तो महज राय है, फिल्म में भी इनमेंट्स को ऐसे दिखाया गया है जैसे वो कोई परिवार हो जिसमें अच्छे किरदार भी हैं और बुरे भी.

जेल के क़ैदियों का चित्रण निकल कर सामने नहीं आया है. जब ये सभी फ़रार हो जाते हैं तब फिल्म बेहद कमजोर हो जाती है. सचिन का सभी बैंड मेंबर्स के घर जाकर पता करना की वो वहां पर आए थे या नहीं ये समय बर्बाद करने के ही बराबर है. ये भी पूरी तरह से हास्यास्पद लगता है जब वो भाग कर एक दूसरे बैंड के पास जाते हैं जिन्होंने उनको काम दिलाने में मदद करने का वादा किया था.

जेल से छूटने के तुरंत बाद?...आखिर क्यों? जेल का सेट भी जेल के टेरर के माहौल को बताने में नाकामयाब रहा है जो की मेरी समझ से बेहद जरूरी था. सच यही है कि 118 मिनट की ये फिल्म और भी पेसी बन सकती थी. अमित त्रिवेदी का संगीत रॉक की तर्ज पर है जो एक गाने को छोड़ कर असरदार साबित नहीं होता है. आईएम इंडिया गाने को सुनने में अच्छा इसलिए लगता है क्योंकि इसका फिल्मांकन अच्छा है.

हबीब की ये फिल्म सभी कैदियों को एक ही नजर से देखती है और इस वजह से सच्चाई से कोसों दूर नजर आती है. हबीब ये लेकर चलते हैं कि जेल में जो कैदी बंद होते हैं उनमें से कई के साथ न्याय नहीं होता. ये सच भी हो सकता है और मैं इससे इत्तेफ़ाक भी रखता हूं लेकिन ये भी सच है कि आप अपने फिल्म में इस तरीके से बायस्ड नहीं हो सकते है जहाँ पर आप सात अंडर ट्रायल्स की बात कर रहे हैं. कैदी बैंड की कहानी में दम नहीं है और फिल्म के अंत में मैसेज देने की कोशिश की गई है. फिल्म खत्म होते होते आप भी थक कर चूर हो जाते हैं. हबीब साहब हम एक मनोरंजन से भरपूर जेल की फिल्म देखने आए थे और आपने जो दिखाया वो डॉक्यू ड्रामा जैसा लगा.

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