विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

Review Bank Chor : थोड़ा हंसाती है लेकिन ज्यादा 'बोर' करती है बैंक चोर

यशराज फिल्म्स से ऐसी फिल्मों की उम्मीद नहीं की जा सकती

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Abhishek Srivastava Updated On: Jun 16, 2017 02:53 PM IST

0
Review Bank Chor : थोड़ा हंसाती है लेकिन ज्यादा 'बोर' करती है बैंक चोर
निर्देशक: बंपी
कलाकार: रितेश देशमुख, विवेक  ओबेराय, रिया  चक्रवर्ती

ये देखकर बेहद आश्चर्य होता है कि हिंदी फिल्मों में परंपरा का चेहरा माने जाने वाले यशराज फिल्म्स ने फिल्म बैंक चोर से एक जबरदस्त यू-टर्न लिया है.

इस हफ्ते की रिलीज वाई- फिल्म्स की बैंक चोर, यशराज के व्याकरण में कही भी फिट नहीं बैठती. सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ये फिल्म काम करती है? इसका उत्तर यही है कि कुछ जगहों पर ये काम करती है और कुछ जगहों पर बिल्कुल भी नहीं यानि कुल मिलाकर फिल्म देखने के बाद आपका अनुभव खट्टा मीठा रहेगा.

यंगिस्तान के लिए है फिल्म

इस फिल्म को बनाने वाले  वाई-फिल्म्स की  निगाहें हमेशा से युवाओं पर रही हैं और हर कदम पर अपने कांटेंट का ताना बाना उनके इर्द गिर्द ही बुना है.

बैंक चोर कई अपवाद नहीं है. पारिवारिक परिवेश की फिल्में बनाने के लिये  मशहूर  यशराज फिल्म्स के तौर तरीकों से वाई-फिल्मस कोसों दूर है. प्रमोशन के अपने अनूठे तरीकों की वजह से ये फिल्म पहले ही सुर्खियों मे आ गई थी.

अनूठे मार्केटिंग कैंपन के जरिये फिल्म ने अपना खुद का ही मजाक बना लिया था. दूसरे शब्दों में कहें तो ये फिल्म क्या कहना चाहती थी ये बिल्कुल साफ था - दो घंटे के लिये आप सिनेमाघर मे बैठिए, अपना दिमाग घर पर  छोड़कर आइये और हमारी बेवकूफियों का लुत्फ़ उठाइये.

हमने ये सब कुछ किया लेकिन फिल्म देखने के बाद फिर भी मस्ती में थोड़ी कमी रह गयी.

तीन मसखरों की कहानी

रितेश देशमुख, विवेक ओबेराय और रिया चक्रवर्ती अभिनीत इस फिल्म की कहानी तीन बेवकूफों के बारे में है जो बैंक लूटने की योजना बनाते हैं लेकिन अपने इस काम को अंजाम देने के चक्कर उनका पाला सीबीआई के कड़क अफसर  अमजद खान यानि विवेक ओबेराय से पड़ जाता है.

जिस दिन ये बैंक डकैती को अंजाम देने वाले होते हैं उसी दिन अपनी बेवकूफी के चलते ये तीनों कुछ शक्तिशाली लोगों और एक संजीदा जुर्म के बीच मे फंस जाते हैं.

रीतेश देशमुख ने हंसाया है

फिल्म में  चंपक चिपलुणकर यानि रितेश के सहयोगी चोर के रोल में है भुवन अरोड़ा और विक्रम थापा. रिया एक तेज तर्रार टीवी रिपोर्टर के रोल में हैं और फिल्म में साहिल वैद का भी सधा हुआ अभिनय है जिनके रोल के बारे में मैं कम लिखना पसंद करूंगा और मस्ती को किरकिरा नहीं करूंगा.

तो आइये सबसे पहले बात कर लेते है उन चीजों की जो फिल्म में आपको लुभाती हैं. फिल्म के निर्देशक बंपी हैं जो इसके पहले एमटीवी के मशहूर शो बकरा से जुड़े थे. फिल्म मे उन्होंने वही फील देने की कोशिश की है जिसकी वजह से संजीदा सीन्स में भी आपको हंसी आती रहती है और मेरी समझ से ये इस तरह की फिल्म के लिये ये एक बडी कामयाबी है.

रितेश ने एक बार फिर से जता दिया है कि फिल्म जगत फिलहाल कोई सबसे अंडर युटीलाईज्ड अभिनेता हैं तो वो रितेश ही हैं.  रितेश पूरी फिल्म को बांध कर आगे लेकर चलते हैं.

विवेक ओबरॉय तो छा गए हैं

सीबीआई अफसर अमजद खान के रोल मे विवेक जंचे हैं और मूछों को ऐंठने का उनका अंदाज निराला है. भुवन और विक्रम का काम था मसखरी करना और इसको उन्होंने ईमानदारी से किया है.रिया को अभिनय की  बारीकियां नहीं आती हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है.

पहले से दूसरा हाफ ज्यादा अच्छा है

फिल्म का पहला हाफ आपको बेचैन करेगा इसके लिये आपको तैयार रहना पड़ेगा. मसखरे बैंक चोर और उनकी बेवकूफियां, एक असफल चोरी और अमजद खान के डराने का अंदाज यही सब कुछ आपको पहले हाफ में नजर आयेगा.

बैंक के अंदर कुछ बंधक भी हैं और उनमें से एक है बाबा सहगल जो किसी भी वक्त रैप गाने के लिये तैयार रहते हैं लेकिन हकीकत ये है कि फिल्म में एक बहुत बड़ा कामिक रिलीफ है.

बीच-बीच में आएंगे मजेदार ट्विस्ट्स

उसके बाद फिल्म में विवेक ओबेराय एक घोषणा करके फिल्म में एक जबरदस्त ट्वीस्ट देते है. बैंक के बाहर जो मीडिया का सर्कस दिखाया गया है उसका फिल्म के प्लाट से कुछ लेना देना  नहीं है और ये सब कुछ बेतुका लगता है.

जब आपको यही लगता है कि आप अपना समय बर्बाद कर रहे हैं तब फिल्म में एक जबरदस्त ट्विस्ट आता है. मजेदार बात ये है कि एक लंबे अरसे के बाद मुझे एक ऐसी फिल्म देखने को मिली जिसका दूसरा हाफ पहले के मुकाबले कोसों बेहतर है.

दूसरे हाफ की जो हरकतें हैं उसकी वजह से आप अपने सीट से बंधे रहते हैं क्योंकि हर वक्त कुछ ना कुछ होता ही रहता है. चीजें इतनी मात्रा में होती हैं कि  टेंशन तोड़ने के लिये निर्देशक को बीच बीच में तीन चोरों का सहारा लेना पड़ता है.

इन्हीं जोक्स की एक कड़ी है दिल्ली बनाम मुंबई. दो चोर अपने बेतुके दलीलों से हंसाने में कामयाब रहते हैं. लेकिन मात्रा ज्यादा होने की वजह से ये कहीं कहीं बोर भी करते हैं.

कन्फ्यूजिंग है क्लाइमैक्स

लास्ट में फिल्म के कई पहलू एक साथ इकट्ठा होते हैं जिसमें शामिल हैं एक जटिल क्लाईमेक्स, कुछ नेतागण, शक्तिशाली व्यवसायी और एक डरावना विलेन.

फिल्म में एक मरे हुये पत्रकार की भी बात की गई है जो चीजों को सच के काफी करीब ले आता है. फिल्म के दूसरे हाफ में कुछ अप्रत्याशित घटनायें भी होती हैं जिसकी वजह से आप फिल्म में बने रहते हैं.

कम शब्दों मे कहें तो फिल्म के दूसरे हाफ की लिखावट सटीक है. जब फिल्म पूरी हो जाती है तब पहले हाफ का हैंगओवर नहीं रहता और फिल्म बेतुकी नहीं लगती है. लेकिन ये बात भी सच है की फिल्म में प्लस के मुकाबले माईनस  प्वाइंटस ज्यादा हैं.

पुराने स्टाइल की लगती है फिल्म

युवाओं के लिये एक फिल्म जिसकी भाषा अतरंगी है तभी काम करती है जब इसका इसका विजुअल  ट्रीटमेंट आज के जमाने के साथ मेल खाता हो.

जमाना इतना आगे निकल चला है कि आजकल की वेब सीरीजेज की तकनीकी बारीकियां फिल्मों के बराबर हो गई हैं. इस परिप्रेक्ष्य में बैक चोर किसी और सदी की फिल्म लगती है.

फिल्म के प्रॉप्स प्लास्टिक सरीखे लगते हैं, सेट बेजान लगता है और फिल्म के  बैकग्राउंड स्कोर और इसकी एडिटिंग को देखकर लगता है कि जल्दबाजी में काम किया गया है. फिल्म के दूसरे हाफ को देखकर यही लगता है कि काश फिल्म के लेखकों ने पहले हाफ पर भी उतनी ही मेहनत की होती.

इस फिल्म का पटाक्षेप होता है  तीनों बैंक चोरों के बीच एक बेहद ही मजेदार बातचीत पर और इसी बातचीत में फिल्म का पूरा सार निकलकर बाहर आता है. बैंक चोर में क्षमताएं अपार हैं लेकिन सागर के अंदर जाकर मोती लाने का साहस कम लोगों ने किया है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi