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Exclusive Interview : रणबीर कपूर ने खोला राज "मैं पापा से नजरें नहीं मिलाता"

मैंने आजतक पापा के आंखों का कलर नहीं देखा है, मैं नीचे देखकर उनसे बात करता हूं

Abhishek Srivastava Updated On: Jun 21, 2018 07:33 PM IST

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Exclusive Interview : रणबीर कपूर ने खोला राज

आप जिस किरदार को संजू मे निभा रहे है बायोपिक के दौर में शायद ये एक बेहद ही अहम शख्सियत हैं. ये आपके लिए कितना चुनौती भरा रोल था क्योंकि संजय दत्त आज भी प्रासंगिक है?

बहुत ही चुनौती भरा रोल था ये मेरे लिए. जब राजू सर ने मुझे पहली बार बताया था की संजय सर के उपर वो एक बायोपिक बना रहे हैं तो मेरी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि ये नहीं हो सकता है. उनके ऊपर एक बायोपिक कैसे बन सकती है? आज भी वो इतने चहेते सुपरस्टार हैं. लोग उनको इतना प्यार करते हैं और आज भी इतना काम कर रहे हैं, मैं कैसे कर पाउंगा. 20 साल से लेकर 60 साल तक मैं उनके जैसा कैसे दिख पाउंगा. ये सारे सवाल मेरे भी दिमाग में घूम रहे थे लेकिन जब मैंने कहानी पढ़ी तो उसको पढ़ने के बाद काफी आत्मविश्वास मेरे अंदर आया. कहानी बेहद ही शानदार थी और मेरे लिए जीवन में एक बार मौका मिलने वाली बात थी एक अभिनेता के तौर पर. लेकिन उसके बाद हमने काफी मेहनत की. सिर्फ सही लुक लाने के लिए हमने उसके ऊपर आठ महीने दिए. जिस तरीके से प्रोस्थेटिक्स, हेयर स्टाइल या फिर जो कपड़ों के लुक थे या फिर उनकी जैसी बॉडी  - इन सभी चीजों पर हमने बहुत मेहनत की. जब मैंने फिल्म शुरू की थी तब मैं 70 किलो का था और तब मैंने जग्गा जासूस की शूटिंग खत्म की थी उसके बाद मुझे अपना वजन बढ़ा कर उसे 88 किलो तक ले जाना पड़ा. मुझे 18 किलो वजन अपना और बढ़ाना पडा था और इसीलिए हमने पूरी फिल्म रिवर्स तरीके में शूट की.

फिल्म में कोई ऐसा सीन है जिसे आपने एक टेक में किया? संजय दत्त ने वास्तव का क्लाइमेक्स सीन महज एक टेक में किया था क्योंकि उनका मानना था कि अगर वो रीटेक लेंगे तो उस सीन की तीव्रता खत्म हो जाएगी.

देखिए मैं शुरू से ही ऐसा अभिनेता रहा हूं कि अगर डायरेक्टर को एक टेक लेना है या 40 टेक लेना है तो मैं उसे जरुर करुंगा. अगर डायरेक्टर खुश है तो मैं भी खुश हूं. कई सारे सीन्स थे फिल्म में जो एक टेक में हो गए थे. इस फिल्म में एक एक्टर के तौर पर मुझे इतने सारे सीन्स मिले हैं, चाहे वो डायनामिक्स या इमोशंस की बात हो, पहले कभी वो मौके मुझ मिले नहीं थे. राजकुमार हिरानी इस फिल्म के डायरेक्टर हैं और खराब काम तो उनसे होता है नहीं. उनका भी मेरे उपर एक ट्रस्ट लेवल था.

संजय दत्त की जिंदगी खुद में काफी इमोशनल है. क्या कोई ऐसा मौका था जब कोई सीन करते वक़्त आपकी आंखों में वाकई में आंसू आ गए थे.

सीन्स तो वैसे कई थे लेकिन अगर मुझे पिक करना पड़ा तो मैं दो सीन्स चुनूंगा. जब रॉकी का प्रीमियर चल रहा था और उनकी मां नरगिस दत्त जी दो दिन पहले गुजर गई थी तब ये वो दौर था जब वो ड्रग्स में बहुत घुस गए थे. जब फिल्म का प्रीमियर चल रहा था तब वो अपने पिता के साथ सीढ़ी पर बैठकर बात कर रहे थे और अपने दिल की बात बता रहे थे. वो सीन मेरे लिए बेहद इमोशनल था. और दूसरा मौका तब था जब सुनील दत्त जी की मृत्यु हुई थी तब संजय दत्त पर क्या गुजर रही थी. जब वो अर्थी को लेकर जा रहे थे तब उनके दिमाग में क्या चल रहा था. एक बहुत ही प्यारा सीन राजू सर और अभिजात सर ने लिखा है कि एक काल्पनिक मोमेंट में वो अपने पिता को शुक्रिया बोल रहे हैं लेकिन उनके पिता मर चुके हैं.

आप लाइफ के अपने बुरे फेज को कैसे देखते हैं?

बुरा फेज मेरी लाइफ का बहुत ही इम्पोर्टेन्ट फेज है. जब आपकी फिल्में चलती नहीं है और आपको सफलता नहीं मिलती है तो बुरा लगता है. जब आप अपना करियर शुरू करते हैं तो इन सभी का उतना एहसास नहीं होता है क्योंकि आप जवान होते हैं और उस वक्त आपको मौके मिल रहे होते हैं. अभी मुझे दस साल हो गए हैं इस इंडस्ट्री में तो अब जब आपकी फिल्में नहीं चलती हैं तो बुरा लगता है लेकिन हर बार आपको इससे कुछ सीखने का मौका मिलता है. आपको हमेशा सफलता की चाहत होती है और आप ये सोचते हैं कि सफलता ने मुझे बदला नहीं है तो अब असफलता मेरा क्या कर लेगी भला. असफलता बहुत ही मुश्किल प्रतिद्वन्द्वी होता है. वो आकर आपको ऐसा मारता है कि आपको पता भी नहीं चलता है और इस बात का पता आपको तुरंत नहीं चल पाता है. आपको इस बात का एहसास एक या दो साल के बाद होता है. अब क्या करें ये प्रोफेशन ही ऐसा है. शुक्र इस बात का है कि मैं एक फिल्मी परिवार में पला बढ़ा हूं तो बचपन से इन चीजों को देखते आया हूं. मैं सफलता और असफलता को इतना सीरियसली नहीं लेता हूं और साथ ही साथ अपने आपको भी मैं इतना सीरियसली नहीं लेता हूं. मैं खुद को एक बिलो एवरेज या औसत से कम इंसान समझता हूं साथ ही साथ मैं एक बिलो एवरेज एक्टर भी हूं. मुझे अच्छे मौके मिले हैं और मुझे पता हैं कि मेरे अंदर आत्मविश्वास भी जो की एक एक्टर के लिए बहुत जरूरी होता हैं. मैं इसी तरीके से खुद को देखता हूं.

हर एक्टर का एक फॉर्मूला होता है. कोई फॉर्मूला आपका है जब आप अपनी फिल्में करते हैं तो?

फार्मूला तो बिलकुल नहीं हैं. मुझे मौके जरुर मिले हैं कभी दस आते हैं तो कभी बीस आते हैं और उनमें से आपको एक या दो को चुनना पड़ता है. लेकिन जो भी फिल्में मैंने चुनी हैं चाहे वो बॉम्बे वेलवेट हो या फिर जग्गा जासूस या फिर तमाशा - ये सभी फिल्में मैंने इसलिए चुनी थीं क्योंकि ये सभी मुझे पसंद आई थीं. अगर ये फिल्में नहीं चली हैं तो इसका भी श्रेय मुझे ही जाता है क्योंकि ये सारी फिल्में मैंने ही चुनी थीं. ऐसा नहीं हैं कि मैं डायरेक्टर को बोलूं कि आपने अच्छी फिल्म नहीं बनाई. मुझे पता था कि ये क्या फिल्म बन रही है. मैं एक्सपेरिमेंटल नहीं हूं. बहुत लोगों को ये लगता है कि मैं एक्सपेरिमेंटल एक्टर हूं और आर्ट फिल्में करना चाहता हूं. मुझे ये लगा था कि जग्गा जासूस की स्क्रिप्ट एक ऐसी स्क्रिप्ट थी कि जिसकी कहानी बहुत लोगों को पसंद आएगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

जब आज के दौर के एक्टर मसलन विक्की कौशल या वरुण धवन कहते हैं कि आप इस दौर के सबसे टैलेंटेड एक्टर हैं तो आपको कैसा लगता है?

बहुत अच्छा लगता है क्योंकि जब मैं वरुण या विक्की को देखता हूं या फिर रणवीर या आलिया या कार्तिक या दीपिका जो भी आज के दौर में काम कर रहे हैं, वो बहुत ही अच्छा काम कर रहे हैं. वो जमाना बदल गया है और अब ऑडियंस आपको माफ नहीं करती है. कॉम्पटीशन बहुत ज्यादा है चॉइस भी है. अगर आपकी फिल्म अच्छी है तो आपको प्यार मिलेगा अगर नहीं हैं तो आपको जनता का प्यार नहीं मिलेगा. जब लोग मेरे बारे में ऐसा कहते हैं तो थोड़ा अविश्वसनीय भी होता है कि ये थोड़ा ज्यादा बोल रहे हैं. लेकिन मुझे सिर्फ टैलेंटेड ही नहीं बनना है मुझे सफल फिल्मों का भी हिस्सा बनना है. अगर आप अपना टैलेंट सही फिल्मों के चुनाव में इस्तेमाल नहीं करते हैं तो ये टैलेंट की बर्बादी ही मानी जाएगी.

 क्या आप आर के फिल्मस को शुरू करने वाले हैं?

नहीं मेरी ऐसी कोई चाहत नहीं है. अगर आप आर के फिल्मस की बात करते हैं तो आर के फिल्मस आर के फिल्मस रहा है राज कपूर की वजह से. राज कपूर वापस पैदा नहीं हो सकते हैं और अगर मैं फिल्में बनाना चाहता हूं तो मेरे तरीके से फिल्में बनेंगी. इसलिए जिस फिल्म को मैंने प्रोड्यूस की थी उसे मैंने और अनुराग बसु ने पार्टनरशिप में की थी और उसे आर के फिल्मस के बैनर के तहत नहीं किया था. मेरा यही मानना है कि आर के फिल्मस की प्रतिष्ठा को मैं खराब नहीं करना चाहता हूं. जो नाम राज कपूर बना कर गए है उसे मैं छूना नहीं चाहता हूं क्योंकि वो मेरे लिए एक बहुत बड़ा रिस्क है. मेरे पास वो टैलेंट या जानकारी नहीं है जो राज कपूर के पास थी.

सलमान खान ने बोला था कि 40 साल के बाद किरदार खुद संजय दत्त फिल्म में निभा सकते थे. इस पर आपकी क्या टिपण्णी है?

मेरी समझ से ऐसा कभी हुआ नहीं है. ऐसा कभी भी किसी फिल्म में नहीं हुआ है कि अगर किसी के ऊपर कोई फिल्म बन रही है तो वो खुद आकर ही उसमें रोल निभाए. उस रोल की विश्वसनीयता चली जाती है. मैं यही कामना करता हूं कि जब ऑडियंस इस फिल्म को देखे तो चाहे वो 20 साल हो या 40 साल हो जो एक्टर इस रोल को निभा रहा है वो यही समझे कि वो संजय दत्त ही है. मैंने कोशिश वही की है. जाहिर सी बात है दुनिया में एक अकेला संजय दत्त है और खुद के रोल को उनसे बेहतर और कोई नहीं कर पाएगा. हमारी कोशिश यही है कि संजय दत्त की झलक आपको इस फिल्म में नजर आए.

संजय दत्त की पत्नी मान्यता की क्या प्रतिक्रिया थी फिल्म के ट्रेलर को देखने के बाद?

जब मैं संजू सर के जिम में वर्क आउट किया करता था तब मान्यता जी मुझे उसी वक्त से बताती थीं कि अगर बाबा पर फिल्म बनेगी तो तू ही करेगा. उस वक्त ये बात सुनकर मुझे अटपटा लगता था कि मैं कैसे कर पाऊंगा. ये उस वक्त की बात हैं जब मैं बर्फी में काम कर रहा था. संजू सर मेरा बहुत मजाक उड़ाते थे कि क्या बर्फी जैसी फिल्म में काम कर रहा है. इसके बाद क्या लड्डू पेड़ा मे काम करेगा. मेरी समझ से जो प्रतिक्रिया मुझे इस फिल्म के लिए मिल रही है इसके पहले मुझे किसी और फिल्म के लिए नहीं मिला है.

 संजय दत्त निजी जीवन में काफी बिंदास हैं और आप इसके बिलकुल उलट. इस चीज को खुद के अंदर लाने में क्या आपको परेशानी हुई?

जब कैमरा ऑन होता है तो मेरी शख्सियत खुद-ब-खुद बदल जाती है. आपको एक मीडियम मिलता है कि आप किसी और की जिंदगी जी सकें. मैं अपने निजी जीवन में इस तरह का हूं शायद बचपन से ही ऐसा रहा हूं. मेरी मां मेरे बारे में काफी फिक्र करती थीं कि मैं अगर ऐसा हूं तो एक्टिंग कैसे कर पाऊंगा क्योंकि एक्टर होना एक तरह का पब्लिक फिगर होना भी होता है. लेकिन अभी उस चीज को मैं बदल नहीं पाया हूं. जब भी टोपी पहनता हूं तो खुद को छुपाने के लिए ही पहनता हूं ताकि चुपचाप कही बैठ सकूं. लेकिन अभी तक सब कुछ ठीक ही रहा है.

क्या ड्रग्स के साथ आपने कभी एक्सपेरिमेंट किया है?

जी हां मैंने बिलकुल किया है और उसके अलावा भी कई गलतियां मैंने अपनी जिंदगी में की हैं लेकिन संजू सर के लेवल जैसा नहीं. आपको फिर बाद में इस बात का एहसास होता है कि इनकी कोई जरुरत नहीं है और आपको ये एक अलग ही रास्ते पर ले जाते हैं और आपको पूरी तरह से बर्बाद कर देते हैं. मुझे परिवार की महत्ता जानने को मिली कि इनका किसी को सम्भालने में कितना बड़ा हाथ होता है. दोस्ती के बारे में जानने को मौका मिला. उनकी लाइफ से कई चीजों को सीखने का मौका मिला और शायद यही वजह है कि हिरानी ने उनके जीवन के ऊपर फिल्म बनाने की सोची. उनकी कहानी में एक या दो चीजें नहीं बल्कि सौ चीजें थीं. ये कोई प्रोपेगैंडा फिल्म नहीं है कि हम संजय दत्त को भगवान की तरह दिखाना चाहते हैं. आपको देखकर लगेगा कि संजय दत्त एक बहुत ही फाल्टी इंसान हैं जो अपनी गलतियों की वजह से गिरा लेकिन उसके बाद उठा भी गया हर दौर में.

 जब ऋषि जी ने फिल्म का टीजर देखा तो उनको विश्वास ही नहीं हुआ कि आप संजय दत्त के रोल में हैं. आपने जब वो वीडियो देखा तो क्या सोचा?

जब मैंने उनका वीडियो देखा तब मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि वो मेरे पिता हैं क्योंकि इसके पहले उन्होंने मेरे रोल के बारे में मुझसे कभी कुछ भी नहीं कहा है. हिरानी सर ने टीजर दिखाते वक्त चुपके से उनको शूट किया था और उस वक्त मैं बुल्गारिया में ब्रह्ममास्त्र की शूटिंग कर रहा था और उन्होंने मुझे वो वीडियो भेजा था. रात को वो वीडियो मिला और देखने के बाद यही सोचा कि क्या ये असली में हो रहा है. वो कुछ बोलते नहीं हैं और ज्यादा कॉम्प्लिमेंट्स में विश्वास नहीं करते हैं. बहुत अच्छा लगा कि उनसे भी एक तरह का अप्रूवल मिल गया.

 आपका और ऋषि जी के बीच किस तरह का बाप बेटे का रिश्ता है?

मैं उनसे बहुत प्रेम करता हूं. एक अभिनेता के तौर पर भी मैं उनका बहुत बड़ा फैन हूं. हमारा रिश्ता दोस्तों की तरह का नहीं हैं. मेरे और मेरे पिता के बीच जो रिश्ता है वो वैसा ही है जो उनका और उनके पिता के बीच में था. थोड़ा फॉर्मल सा है. मेरी समझ से हिंदुस्तान में जो बाप-बेटे का रिश्ता होता है वो थोड़ा कॉम्प्लेक्स होता है. मुमकिन है कि बहुत लोग इस बात से खुद को रिलेट कर पाएंगे क्योंकि संजय दत्त का सुनील दत्त के साथ काफी कॉम्प्लेक्स रिलेशनशिप था. जिस तरह के इंसान सुनील दत्त थे - वो अच्छाइयों की इन्तेहा थे. लोग उनका सम्मान करते थे और संजय दत्त उसके बिलकुल उलट थे - ड्रग्स, बन्दूक, आतंकवाद. इसकी वजह से मेरे पिता के साथ रिश्ते की बात कई दफा शूटिंग के दौरान याद आई.

 क्या आपको उनसे आज भी डांट पडती है?

उनको डांटने की कोई जरुरत नहीं होती थी. किसी भी आवाज में मुझे बोलते थे तो मैं रोने लगता था बचपन में. ऐसा नहीं कि उन्होंने कभी मुझे मारा था या फिर मेरे उपर चिल्लाये लेकिन वो थोड़े गुस्सैल किस्म के इंसान हैं वो क्या कहते हैं न शॉर्ट टेम्पर्ड. लेकिन वो बेहद ही अच्छे इंसान हैं जो भी उनके दिल में होता है वो कह देते हैं. जैसे अपने देखा होगा कि ट्विटर पर कुछ भी बोल देते हैं. वो वैसे ही हैं. मैंने आजतक पापा के आंखों का कलर नहीं देखा है, मैं नीचे देखकर उनसे बात करता हूं.

ब्रह्ममास्त्र अभी कैसी शेप अप हो रही है? आलिया ने राजी के दौरान बताया था कि ये फिल्म बॉलीवुड की अवेंजर्स है?

अरे आलिया ने तो बहुत बड़ी तुलना कर दी है. ऐसा कुछ भी नहीं है. अयान जो मेरे करीबी दोस्त हैं इसके निर्देशक है और उन्होंने ये जवानी है दीवानी के बाद पांच साल लगाए हैं इसकी कहानी को लिखने के लिए. ब्रह्ममास्त्र बहुत ही नई फिल्म है हमारी सिनेमा के लिए. सुपर हीरो मैं बोलना नहीं चाहूंगा बल्कि ये कहूंगा कि ये सुपरनैचुरल फिल्म है. आज के जमाने का फेयरी टेल है. आज के जमाने में कोई एतिहासिक चीज होगी तो क्या होगा. कई सारे फिल्म के किरदारों के पास सुपर पावर भी है. बेहद ही उत्साहित हूं मैं इस फिल्म को लेकर और अगले साल यह 15 अगस्त को रिलीज होगी और ये तीन भागों में बनेगी.

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