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पहचाना? राजन नाम है मेरा, राजन हक्सर

कुछ ऐसे कलाकार होते हैं, जिनका नाम नहीं उनके किरदार बोलते हैं

Satya Prakash Updated On: May 21, 2017 07:14 AM IST

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पहचाना? राजन नाम है मेरा, राजन हक्सर

हिंदी फिल्मों में नायक, नायिका, खलनायक के अलावा चरित्र कलाकार भी होते हैं जो कथानक को चलाने और बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. आम दर्शक की जानकारी नायक, नायिका और खलनायक की तक ही सीमित रहती है.

किताबों, अखबारों और फिल्म पत्रिकाओं में भी मूल रूप से अपना ध्यान इन्हीं पर केंद्रित किया जाता रहा. यही कारण है कि 200 से अधिक फिल्में कर लेने के बाद भी चरित्र कलाकार गुमनामी की ज़िंदगी ही जीते रहे और गुमनाम ही दुनिया ही छोड़ जाते हैं.

‘राजन हक्सर’ एक ऐसे ही चरित्र कलाकार थे. सत्तर और अस्सी के दशक की फिल्मों में बेहद सक्रिय रहे राजन हक्सर ने लगभग पचास वर्षो तक फिल्मों को अपनी सेवाएं दीं. मूलरूप से कश्मीरी, राजन हक्सर ने अपने करियर में पिता, चाचा, मछुआरे, ट्रस्टी, डॉक्टर, वकील, ग्रामीण, ठाकुर तथा इंस्पेक्टर की कई भूमिकाएं अदा कीं.

मगर उनकी असली पहचान सह-खलनायक के रूप में ही स्थापित हुई. तस्कर, डाकू तथा अवैध बार-मालिक के रूप में इनके किरदार ही दर्शकों के जेहन में बसे.

आजादी के साल में आई फिल्म ‘दो भाई’ से अपने फिल्मी जीवन की शुरुआत करते हुए राजन नब्बे के दशक तक फिल्मों में दिखे. 1997 में आई वर्षो ने लंबित फिल्म ‘आखिरी संघर्ष’ इनकी अंतिम प्रदर्शित फिल्म थी. फिर भी बंजारन और हीर-रांझा (1992) में राजन छोटे-मोटे रोल में नजर आए. वह अपने करियर के शिखर पर सत्तर से अस्सी के दशक में ही रहे जब डकैतों,तस्करों, जुआरियों की भूमिकाएं बहुतायत में लिखी गईं.

राजन हक्सर, अपने मित्र चंद्रमोहन के सहयोग से शूटिंग के दौरान ही चरित्र अभिनेत्री मनोरमा से संपर्क में आए और शादी कर ली. लगभग 20 साल तक विवाह में रहने के बाद दोनों अलग हो गए. दोनों की बेटी रीता हक्सर ने भी सन सत्तर के अंतिम सालों में कुछ फिल्में बतौर अभिनेत्री की. आशानुरूप सफलता न मिलने के कारण उन्होंने विवाह के बाद फिल्में छोड़ दी.

राजन हक्सर फिल्में करते रहे और इन्हीं दिनों में उन्होंने डॉन, लोक परलोक जैसी फिल्मों में यादगार भूमिकाएं अदा कीं. बहुत संभव है कि भूमिकाएं राजन हक्सर को ध्यान में रखकर न लिखी जाती हों, मगर जो भी भूमिकाएं उन्होंने निभाईं उसे किसी और अभिनेता से बदल कर देखा नहीं जा सकता.

राजन हक्सर ने बतौर सहयोगी निर्माता भी अपनी किस्मत आजमाई. आधी रात के बाद (1965), प्यार का सपना (1969) तरहा रेशम की डोरी (1974). रेशम की डोरी इस तीनों में सबसे यादगार फिल्म रही. इस फिल्म के बाद राजन हक्सर ने किसी फिल्म का निर्माण सहयोग नहीं किया और अभिनय पर ही अपना ध्यान केन्द्रित किया.

नब्बे का दशक आते-आते, फिल्मों के चरित्रकलाकारों की भरमार हो गयी. धारावाहिकों के अदाकार फिल्मों के चरित्र भूमिकाओं पर हावी हो गए. ऐतिहासिक कथानक वाली इक्का दुक्का फिल्मों में राजन दिखें मगर फिर उम्र और स्वास्थ्य कारणों से फिल्मों से दूर होते चले गए. उनके मृत्यु के वर्ष का पता अनेक कोशिशों के बाद भी नहीं लगा.

यह सही है कि आम दर्शक की जानकारी नायक,नायिका और खलनायक की तक ही सीमित रहती है. किताबों, अखबारों तथा फिल्म पत्रिकाओं ने भी मूल रूप से अपना ध्यान इन्हीं पर केन्द्रित किया जाता रहा. मगर आम दर्शकों कि याददाश्त, उनका अदाकारों से प्रेम किसी अखबार, किसी रिसाले का मुहताज नहीं है.

राजन हक्सर हिन्दी फिल्मों का चेहरा थे. जिनका नाम भले ही दर्शकों कि जुबान पर नहीं आया मगर उनका चेहरा,उनकी अदाकारी आज भी लोगों के जेहन में खुदी हुई है. वह ईस्टमैन सिनेमा का चेहरा थे, हैं और बोलती फिल्मों के इतिहास तक रहेंगे.

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