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'एंग्री यंगमैन' अमिताभ बच्चन की याद दिलाता है 'रईस' शाहरुख़ ख़ान

केयू मोहनन की सिनेमैटोग्राफी के बिना शायद रईस उतनी बेहतरीन नहीं लगती.

Rohini Nair Updated On: Jan 26, 2017 07:51 PM IST

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'एंग्री यंगमैन' अमिताभ बच्चन की याद दिलाता है 'रईस' शाहरुख़ ख़ान

रईस की प्रेस स्क्रीनिंग के लिए जाते हुए, मैं पैराडाइज थिएटर के सामने से गुजरी. यह माहिम के इलाके में मौजूद एक पुराना सिंगल स्क्रीन थिएटर है. इसके धूल खाए फ्रंट के आगे शाहरुख़ खान की फिल्म का एक पोस्टर लगा हुआ है. इसके बड़े हिस्से पर शाहरुख़ का चेहरा नजर आता है.

बैकग्राउंड में कई अन्य पुलिसवालों के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी दिखाई देते हैं. प्रेस के लिए बांद्रा की स्विस हिल रोड पर मौजूद ले रेवे में प्रिव्यू आयोजित किया गया था. थिएटर को खूबसूरती से सजाया गया था. यहां भी शाहरुख़ का बड़ा सा पोस्टर गेट के पास लगाया गया था.

इन दोनों थिएटरों की कहानी बताती है कि रईस के जरिए शाहरुख़ ने क्या करने की कोशिश की है. वह मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं जो कि पहले से उनका फैन है. साथ ही वह सिंगल स्क्रीन पर जाने वाले दर्शक वर्ग को भी इस फिल्म में अपने साथ लाना चाहते हैं. रईस हाल के सालों में शाहरुख़ की सबसे बड़ी फिल्म है.

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इस बात में कोई शक नहीं है कि रईस एक जबरदस्त कमर्शियल एंटरटेनर है. इसका श्रेय फिल्म के डायरेक्टर राहुल ढोलकिया को जाता है. परजानियां और लम्हा जैसी फिल्में राहुल ने ही बनाई थीं. इसके अलावा फिल्म के लिए शाहरुख़ खान और नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी क्रेडिट के हकदार हैं.

रईस की कहानी

रईस में 1970 और 80 के दशक की गुजरात की कहानी बयां की गई है. उस वक्त राज्य में शराबबंदी को दो दशक हो चुके थे. इस फिल्म में रईस आलम (शाहरुख़ खान) की कहानी कही गई है. रईस आलम को गुजरातियों की मशहूर कारोबारी वाले छवि में दिखाया गया है. लेकिन वह एक ऐसा कारोबारी है जो कि कानून के उलट काम करता है.

रईस को एक छोटे बच्चे के तौर पर दिखाकर फिल्म की शुरुआत होती है. वह एक शराब की तस्करी करने वाले के लिए रनर का काम करत है. स्कूल में उसे बोर्ड को पढ़ने में दिक्कत होती है. उसे चश्मा दिया जाता है. इससे उसकी आंखें दोबारा मिल जाती हैं. वह उनके हिंसात्मक अवतार को दिखाता है जिसमें उन्हें बैटरी कहा जाता है.

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रईस पर एक घटना का गहरा असर होता है. अवैध शराब बेचने के लिए जब एक पुलिसवाला उसे फटकारता है, तो उसकी मां बचाव में आगे आती हैं. कचरा बीनने वाली उसकी मां को पुलिसवाला डांट देता है. इस पर उसकी मां कहती हैं, ‘कोई धंधा छोटा या बड़ा नहीं होता और धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं होता.’ मां का यह वाक्य बेटे के अंदर उतर जाता है.

वह फैसला करता है कि शराब के धंधे में वो खुद उतरेगा. लेकिन वह सस्ती देसी दारू का धंधा नहीं करेगा. वो विदेशी शराब का कारोबार शुरू करने का फैसला करता है. इसके लिए वह जयराज सेठ (अतुल कुलकर्णी) का रनर बन जाता है. सेठ ही रईस की काबिलियत को सबसे पहले पहचानता है. सेठ कहता है, ‘बनिए का दिमाग और मियांभाई की डेयरिंग’.

हम फिल्म में रईस को बड़ा होते देखते हैं. वह अपना धंधा खड़ा करता है. इस तरह से रईस के लिए मंच तैयार हो जाता है. वह धंधे में न सिर्फ दूसरों को टक्कर देता है, बल्कि कानून के लिए भी वह एक चुनौती बन जाता है.

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फिल्म में कानून की रखवाली करने वाले शख्स के तौर पर इंस्पेक्टर जयदीप मजूमदार (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) दिखाई देते हैं. वह एक ईमानदार और दबावों के आगे न झुकने वाले अफसर हैं. रईस और मजूमदार का एक-दूसरे के विरोधी का मगर सम्मानित रिश्ता इस तरह से दर्शाया गया है कि मजूमदार की फिल्म में एंट्री वैसी ही दमदार है जैसी कि शाहरुख़ खान की.

शाहरुख से ज्यादा दमदार नवाजुद्दीन

नवाजुद्दीन की एंट्री माहिरा खान से भी ज्यादा प्रभावशाली दिखाई गई है. माहिरा पहले शाहरुख की प्रेमिका बनती हैं और फिर उनकी पत्नी. पहले हाफ में रईस को अवैध शराब के कारोबारी के तौर पर दबदबे वाली शख्सियत के तौर पर पेश किया गया है. इसके अलावा हिंसा भी दिखाई गई है.

हिंसा के दृश्यों में स्टाइलिश एक्शन नहीं है. यह क्रूर, खून-खराबे से भरा, और शारीरिक ताकत पर टिका हुआ एक्शन है. इसी सबके बीच सनी लियोनी का लैला मैं लैला वाला गाना होता है.

आखिर आप रईस आलम को कैसे पसंद कर सकते हैं जबकि वह एक बुरा आदमी है? इसी तरह से एक अच्छे पुलिसवाले मजूमदार को भी आप नाकाम होते कैसे देख सकते हैं?

हालांकि, शाहरुख खान का चित्रण इसकी बड़ी वजह है, और इसे इसी तरह से राहुल ढोलकिया ने लिखा है. रईस को मुख्यतौर पर प्रॉफिट कमाने के मकसद से बनाया गया है, लेकिन वह सैडिस्ट नहीं है.

हालांकि, उन्होंने हिंसा दिखाने से गुरेज नहीं किया है, लेकिन इसका इस्तेमाल फिल्म की जरूरत के हिसाब से किया गया है. लेकिन वह अपनी पत्नी और अपने करीबी दोस्त (मोहम्मद जीशान अयूब) के साथ खुशनुमा पलों को जीते हैं. अपने घमंड में भी वह काफी आकर्षक नजर आते हैं.

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फिल्म का दूसरा हाफ रईस आलम के दूसरे पक्ष को दिखाता है. उनकी छवि रॉबिनहुड की तरह दिखाई जाती है. वह गरीबों के मसीहा हैं और लोगों के कल्याण के काम करते हैं. कुछ वक्त के लिए फिल्म धीमी हो जाती है. इसी वक्त मजूमदार को रईस की हकीकत का पता चलता है. दोनों के बीच के संबंधों को दिखाया गया है.

अभिषेक की 'गुरु' और अमिताभ का 'एंग्री यंग मैन'

रईस की कहानी बहुत हद तक पैब्लो एस्कोबार के करीब दिखाई देती है. रईस की अप्रोच अभिषेक बच्चन की गुरु की याद दिलाती है. गुरु में कहा गया है, ‘सरकारी दरवाजे थे ये आपके बनाए हुए. या तो लात मारकर खुलते थे या जी हुजूरी दे के. मैंने दोनों किया. जहां लात मार सकता था लात मारी, जहां बोला सलाम दो मैंने बोला सलाम लो.’

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वह शून्य से खड़ा हुआ शख्स है. सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचा, लेकिन तब उसे पता चला कि जब आप सबसे ऊपर पहुंच जाते हैं तब आपको सबसे ज्यादा मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं.

रईस को पता चलता है कि सरकार में उसके सहयोगी ही उसे गिरा रहे हैं. वह सत्ता हासिल करने का फैसला करता है. राजनीति के जरिए. वह चुनाव लड़ने का फैसला करता है. उसके ऊंचाइयां चढ़ने को चुनौती मिलती है. जल्द ही ऐसी दिक्कतें उसके सामने खड़ी हो जाती हैं, जो उसकी पहुंच से बाहर की होती हैं.

इस पूरे दौरान रईस गंभीर खतरों से जूझता है. अंत तक पहुंचने तक कहानी कई मोड़ लेती है. इसमें धोखा, हार और मौत शामिल है. रईस की समाप्ति की ओर पूरी कहानी और डायलॉग्स घूमते हैं. इसमें शाहरुख़ खान भीड़ को खुश करने वाला एक और डायलॉग बोलते हैं, ‘धंधा मेरा धर्म है, पर मैं धर्म का धंधा नहीं करता.’

शाहरुख़ खान ने फिल्म में जबरदस्त परफॉर्मेंस दी है. शायद यह उनके करियर की बेस्ट परफॉर्मेंस है. जबरदस्त स्टोरी से कसी हुई फिल्म में शाहरुख़ ने जादू भर दिया है. वह अमिताभ बच्चन के एंग्री यंग मैन की छवि की याद दिलाते दिखते हैं. हां, केयू मोहनन की सिनेमैटोग्राफी के बिना शायद रईस उतनी बेहतरीन नहीं लगती.

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अंत में, रईस को शाहरुख़ खान के लिए देखें. रईस को नवाजुद्दीन सिद्दीकी के लिए देखें. रईस को राहुल ढोलकिया के लिए देखें. लेकिन, सबसे बढ़कर रईस को रईस के लिए जरूर देखने जाएं.

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