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Poster Boys Review: सफल फिल्म का फॉर्मूला चाहिए तो सरकार के पास जाइए

आजकल जो कुछ भी हम बाकी फिल्मों में देख रहे हैं, उनके मुकाबले कॉमेडी का स्तर इस फिल्म में कोसों बेहतर है.

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Abhishek Srivastava Updated On: Sep 08, 2017 10:59 AM IST

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Poster Boys Review: सफल फिल्म का फॉर्मूला चाहिए तो सरकार के पास जाइए

कलाकार- सनी देयोल, बाॅबी देयोल, श्रेयस तलपडे

पोस्टर ब्वायज की कहानी एक सच्ची घटना से प्रेरित है जब तीन कुलियों ने सरकारी महकमे की गलती की वजह से खुद को एक नसबंदी के पोस्टर में पाया.

अभिनेता श्रेयस तलपडे की हल्के फुल्के अंदाज में इसी कहानी को रुपहले पर्दे पर कहने की कोशिश गुदगुदाती है. गुदगुदाने और हंसाने के चक्कर में उन्होंने ढेर सारी सिनेमैटिक लिबर्टीज ले तो ली है लेकिन अगर इनको आप दरकिनार कर दें तो ये फिल्म आपका पुरी तरह से मनोरंजन करेगी. बिना फूहड़पन के श्रेयस के निर्देशन का अंदाज काबिले-तारीफ है. इस फिल्म की सबसे बड़ी बात ये है कि ये अपने ऊपर हंसने में शर्म नही करती है. श्रेयस की कॉमेडी के ऊपर अच्छी-खासी पकड़ है और ये बात हमने उनकी फिल्मों में पहले भी देखा है और यही चीज इस फिल्म में भी नजर आती है.

स्टोरीलाइन

कहानी है तीन लोगों की जो गलती से नसबंदी के पोस्टर में उसका प्रचार करते हुए दिख जाते हैं. फिल्म में ये तीन किरदार हैं जगावर चौधरी (सनी देओल), विनय शर्मा (बाॅबी देयोल) और अर्जुन सिंह (श्रेयस तलपडे). सनी, गांव के चौधरी बने हैं तो बाॅबी फिल्म में एक स्कूल के मास्टर हैं, जो बेहद ही शुद्ध हिंदी में बात करते हैं. श्रेयस तलपडे रिकवरी एजेंट के रोल मे हैं जिनका काम है लोगों से वसूली करना.

जब इन तीनों को पता चलता है कि उनके नाम पर लोगों के बीच नसबंदी का प्रचार किया जा रहा है तो उसके बाद ये ठान लेते हैं कि इसके लिए समाज में जो उनको जगहंसाई सहनी पड़ी है उसकी वसूली वो करके रहेंगे. उसके बाद कहानी सरकारी दफ्तर से लेकर स्वास्थ्य मंत्री से लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्री तक खिंचती चली जाती है. अंत में इन सभी का पटाक्षेप जनता के सामने होता है जब मुख्यमंत्री को लगता है कि इन तीनों के नंगा आंदोलन की वजह से उनकी कुर्सी को खतरा हो सकता है.

एक्टिंग

इस फिल्म में सभी का अभिनय औसत से बेहतर है. सनी और बाॅबी देओल से आप इस बात की उम्मीद नहीं लगा सकते हैं कि वो अभिनय की सीमाओं को लांघ जाएंगे लेकिन यहां पर कहना पड़ेगा कि अपनी पिछली फिल्मों के मुकाबले बाॅबी थोड़े सुधरे हुए नजर आए हैं.

अगर फिल्म देखने लायक बनती है तो वो निश्चित रुप से फिल्म के बाकी कलाकारों के लिए है. एक रिकवरी एजेंट के रोल मे श्रेयस का अभिनय बेहद ही लुभाने वाला है. लेकिन उनसे भी बाजी मार ली है उनके दो चेलों ने जो उनके इस काम मे उनका साथ देते हैं. उनका काम बेहद सटीक है और लंपट किरदारों की भूमिका को उन्होंने बड़े ही सधे तरीके से अंजाम दिया है. मैं तो यहां तक कहूंगा कि निर्देशक ने फिल्म के दूसरे हाफ मे उनका रोल कम करके जनता के मनोरंजन के साथ अन्याय किया है.

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अश्विनी कालसेकर डॉक्टर की भूमिका में हैं और उनकी तारीफ जितनी भी की जाए कम होगी. भले ही पूरी फिल्म में उनका स्क्रीन अपीयरेंस १५ मिनट का होगा लेकिन जब भी वो पर्दे पर आती हैं मजा आ जाता है. इसके अलावा बाॅबी की पत्नी की भूमिका में हैं समीक्षा भटनागर और एक तेजतर्रार पत्नी का रोल उन्होंने बखूबी निभाया है.

स्क्रीनप्ले और डायलॉग

इस फिल्म में कुछ एक सीन्स कमाल के बन पड़े हैं. मैं ये तो नहीं कहूंगा कि उनमें पूरी तरह से इनोवेशन दिखाई देता है लेकिन फिर भी आजकल जो कुछ भी हम बाकी फिल्मों में देख रहे हैं उनके मुकाबले कॉमेडी का स्तर इस फिल्म में कोसों बेहतर है. सीधे सादे शब्दों में कहे तो लिखावट पर ध्यान दिया गया है और डायलॉग जोकि कॉमेडी फिल्मों में जान होते हैं, उनके ऊपर मेहनत की गई है.

जब श्रेयस पहली बार रिकवरी करने जाते हैं तो उस सीन में ठहाके लगाने का पूरा मौका मिलता है. इसके अलावा जब अश्विनी कालसेकर को बाॅबी रात में श्रेयस की प्रेमिका की तबियत खराब होने की वजह से उनको चेकअप के लिए लेकर आते हैं तब उसमें भी काफी गुदगुदी मिलती है. देखकर अच्छा लगता है कि सनी भी जमाने के साथ कदम से कदम मिला रहे हैं. उनके बहुचर्चित डायलॉग्स को भी एक अलग अंदाज में फिल्म में पिरोया गया है.

कमियां

लेकिन एेसा नहीं की फिल्म में खामियां नहीं हैं. अगर सनी सेल्फी का शौक रखते हैं तो ये जरूरी नहीं कि उनके इस अंदाज पर लोगों को हंसी आएगी. ये बड़ा ही बोर करता है. सनी प्रमाण के लिए लोगों को मारकर उनके साथ सेल्फी लेते हैं ये बात बिल्कुल भी हजम नही होती है. ये फिल्म कॉमेडी फिल्मों के सारे मापदंडों पर खरी नही उतरती है लेकिन इसको देखने मे मजा इसलिए आता है क्योंकि आजकल जो बाकी कॉमेडी फिल्में हमारे सामने परोसी जा रहीं है उसके मुकाबले ये पूरी तरह से उन्नीस है.

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कहानी और स्क्रीनप्ले ही इस फिल्म की जान है जिसके लिए बंटी राठौर, परितोष पेंटर और खुद श्रेयस को धन्यवाद कहना पड़ेगा. ये बात किसी से छुपी नहीं है कि सनी और बाॅबी के लिये कॉमेडी करना पहाड़ चढ़ने वाली बात हो जाती है लेकिन सटीक लेखन से उनके ऐब छुप जाते हैं.

और हां अजय देवगन, अरशद वारसी, कुनाल खेमू और परिनीति चोपड़ा की आने वाली फिल्म गोलमाल अगेन के प्रमोशन के लिए पोस्टर ब्वायज से बेहतर जरिया नही हो सकता था, जब आप फिल्म को देखेंगे तो खुद ही इस बात को समझ जाएंगे.

ये एक हल्की-फुल्की फिल्म है, जिसके लिए आपको दिमाग की जुगत लगाने की कोई जरुरत नहीं है. इस हफ्ते ये फिल्म आपके मनोरंजन का साधन हो सकता है. अंत में इस बात को कहूंगा कि लगता है कि फिल्म वालों को आइडिया के लिए सरकार के पास जाना पड़ रहा है. अक्षय कुमार ने टायलेट-एक प्रेम कथा से लोगों का दिल लुभाया तो लगता है कि अब बारी है नसबंदी की.

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