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हकीकत में महिलाओं की जिंदगी ‘पिंक’ नहीं

क्योंकि पिंक में नारीवाद का असली सार जहां निहित है उसे महज़ छोटा सा हिस्सा कह कर खारिज़ नहीं किया जा सकता.

Updated On: Nov 17, 2016 09:32 AM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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हकीकत में महिलाओं की जिंदगी ‘पिंक’ नहीं

 

अमूमन महिलाओं के मुद्दे पर बनने वाली फिल्में ज्यादा सुर्खियां नहीं बटोर पातीं . लेकिन अनिरुद्ध रॉय की छोटी सी फिल्म ‘पिंक’ सबका ध्यान खींचने में कामयाब हुई. महिलाओं के खिलाफ हुए अन्याय के न्याय के लिये पिंक अलग अंदाज में बात रखती है.

पिंक के दिलो दिमाग पर असर छोड़ने की कई वजह हैं . इसने नैतिकता, न्याय और शारीरिक उत्पीड़न के हर उस पहलू को छुआ. जिसे एक महिला झेलती है या फिर रोजाना की जिंदगी में शिकार होती है.

पिंक समाज में मौजूद स्त्री और पुरुषों पर दोहरे मानदंड रखने का सवाल उठाने में कामयाब हुई. फिल्म ने उस मर्म को छुआ जिसके जरिए महिलाओं के चरित्र और नैतिकता पर सवाल उठाए जाते हैं.

फिल्म में एक तरफ बिंदास और बेलौस महिलाएं हैं, तो दूसरी तरफ उपदेशक वकील की संजीदा भूमिका में अमिताभ बच्चन. इनका कॉकटेल नायाब है.

ये विषय की प्रासंगिकता से मेल खाता है. तभी पिंक की अचानक बड़ी कामयाबी पर हैरानी नहीं होती. हां, फिल्म ने विषय को बेबाक तरीके से पेश करने का दुस्साहस किया. इसके लिए थोड़ी आलोचना भी हुई है.

हालांकि यहां एक बात है. आप बिना किसी हिचक के कह सकते हैं कि पिंक का मकसद नारीवाद नहीं है. न कि बहस और आक्रोश का सैलाब इकट्ठा करना. बल्कि एक ऐसी फिल्म तैयार करना था, जो महिलाओं की आजादी की बात रख सके.Amitabh-Bachchan-as-Deepak-in-Pink-1068x580

फिल्म के मर्म को समझने के लिये आपको उसकी 3 लड़कियों के दर्द को गहराई से महसूस करना होगा. अमिताभ बच्चन और पीयूष मिश्रा की कोर्ट रूम की गर्म बहस को देखना होगा.

नारीवाद के सही अर्थ की तलाश

पिंक में नारीवाद का असली मतलब जहां बसा है, उसे महज छोटा सा हिस्सा कह कर खारिज नहीं किया जा सकता.

फिल्म की कहानी तापसी पन्नू के किरदार मीनल के इर्द-गिर्द घूमती है. मीनल के खिलाफ फर्जी एफआईआर दर्ज की जाती है. और हिंसा के एक मामले में उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है.

बुजुर्गवार वकील अमिताभ बच्चन कोर्ट में ये साबित कर देते हैं, कि पुलिस अधिकारी ने अपने सीनियर के दबाव में गिरफ्तारी की है. दरअसल पूरा मामला एक नेता से जुड़ा होता है.

मीनल को गिरफ्तार करने वाली पुलिस अधिकारी भी एक महिला ही है. लेकिन इसे एक इत्तिफाक से ज्यादा नहीं माना गया है. कोर्ट की बहस में भी इसकी चर्चा तक नहीं होती.

आमतौर पर एक महिला का दूसरी महिला के प्रति गैरसंवेदनशील रवैये को फिल्म में उभारा जाता है. लेकिन पिंक के कोर्ट रूम बहस में ये कहीं दिखा.

मसलन वकील ने तल्खी के साथ कभी नहीं कहा कि- 'एक महिला होते हुए भी तुमने दूसरी महिला के साथ ऐसा क्यों किया' या ' तुमने एक ऐसे आदमी की मदद क्यों की, जिसने एक महिला के साथ बदसलूकी की थी ' या 'महिला होते हुए भी तुम्हारा कलेजा नहीं कांपा'.

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इस पूरे सीन को एक नाकाबिल पुलिस अधिकारी की गलती के तौर पर दिखाया गया. जो अपने सीनियर के दबाव में आकर नाइंसाफी करती है. यही इस पूरे सीक्वेंस की खूबसूरती है.

नारीवाद का ये मतलब नहीं है कि औरत को मर्द से ऊंचा दिखाया जाए, या मर्द के मुकाबले में औरतों के अधिकार को तवज्जो दी जाए. सिर्फ फीमेल होने के नाम पर सामने वाले का ज्यादा विनम्र बन जाना, या औरतों के लिए जरूरत से ज्यादा नरमी रखना फेमिनिज्म नहीं है.

नारीवाद को समानता के स्तर पर समझने की जरूरत है. पिंक में आपको इस आंदोलन की झलक दिखेगी .

कोर्ट में उठे सवालों से पुलिस अधिकारी ( हरियाणा कॉप सरला प्रेमचंद की भूमिका में ममता मलिक) खुद की करतूत पर शर्मिंदा होती हैं. जो कि पूरी तरह ठीक है.

नारीवाद एक महिला को शर्मिंदा करता है क्योंकि वो महिला है. सहमति, सेक्स वर्कर्स और महिलाओं की यौन इच्छाओं पर गैरजरूरी नैतिकता पर बहस छिड़ती है.

पिंक ने कई मुद्दों की बात उठाई. जो कि कमर्शियल सिनेमा में या तो सेक्स सिंबल हैं या फिर वर्जित. लेकिन पिंक नारीवाद से हटकर सबकी सोच प्रभावित करने में कामयाब होती है .

पिंक के निर्माता ने उस विशेष चरित्र पर प्रकाश डाला है, जो नारीवादी मुद्दों पर बात करने के लिये नैतिक अधिकार देता है. क्योंकि वास्तविक जीवन में महिलाएं 'पिंक' नहीं बल्कि धुंधलाई सी हैं.

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