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फिल्लौरी: आधुनिकता की ओट में पुराने जमाने की खूबसूरत प्रेम कहानी

भारतीय इतिहास, कलाकारों और महिला ऑटोनोमी के प्रति सामाजिक रुख के चित्रण से इस फिल्म का दायरा बढ़ जाता है

Updated On: Mar 27, 2017 09:10 AM IST

Anna MM Vetticad

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फिल्लौरी: आधुनिकता की ओट में पुराने जमाने की खूबसूरत प्रेम कहानी

'फिल्लौरी' के पहले दृश्य में शराब पीती एक बुजुर्ग महिला जिसके सफेद बालों पर काले रंग की चढ़ी हुई परत काफी स्पष्ट दिखती है, वो अपने बेटे से कहती है कि यह शराब की एक प्याली का नतीजा है.

वाकई ये एक मजाकिया टिप्पणी है. जिसे आप नजरअंदाज इस आधार पर कर भी दें कि हाल की हिंदी फिल्मों में किसी महिला के मुंह से भद्दी गालियां और सेक्स की बातें सुनना अब चलन बन गई है, तो फिल्मों में महिलाओं के शराब, सिगरेट पीने वाले दृश्य अब महिलाओं के आधुनिक होने का एकमात्र प्रतीक बन कर रह गया है.

इतना ही नहीं कई फिल्मकार भी अब ऐसे प्रॉप्स का इस्तेमाल वुमनहुड के प्रति अपनी पितृसत्तात्मक विचारों को ढंकने के लिए कर रहे हैं. तो ऐसा कर वो खुद को आधुनिक विचारों वाले दिखने का ढोंग कर रहे हैं.

हालांकि फिल्म में एक घंटे बाद एक किरदार उस महिला से ये कहता दिखता है कि एक पुरुष है जो उसके लायक है. ऐसा उसके सामाजिक प्रतिष्ठा की वजह से नहीं बल्कि वो सही में उसे सम्मान और आदर की नजर से देखता है.

diljit dosanjh

दिलजीत दोसांझ के फेसबुक वाल से

समानता का ढोंग नहीं है फिल्लौरी में

इसके बाद ही आप ये जान पाते हैं कि अंशाई लाल की 'फिल्लौरी' इस बात का सिर्फ ढोंग नहीं करती है. फिल्म के डायरेक्टर और लेखक अन्विता दत्ता ये बताने में सफल रहे हैं कि समानता का सही अर्थ आखिर क्या होता है. और समानता कितनी बड़ी राहत है.

उस पीढ़ी के साथ रिश्ता जोड़ती है जो ‘प्रेम: आज और कल’ पर यकीन करती है. वर्ष 2017 में कन्नन और अनु की इस प्रेम कहानी का समानांतर आजादी से पहले शशि और रूप की कहानी में मिलता है.

कन्नन ने (सूरज शर्मा) कनाडा में अपनी पढ़ाई तुरंत ही खत्म की है. और अपनी बचपन की प्रेमिका अनु (महरीन पीरजादा, जिनकी यह डेब्यू फिल्म है) से शादी करने के लिए वो पंजाब में है.

लेकिन अपनी इच्छा के खिलाफ सिर्फ परिवार के बुजुर्गों का मान रखने के लिए वो अपने मांगलिक दोष को खत्म करने के लिए एक पेड़ से शादी करता है. चूंकि सदियों से उस पेड़ में शशि का भूत (अनुष्का शर्मा) का डेरा था कन्नन ना चाहते हुए भी उसका दूल्हा बन जाता है.

और इसी के बाद से वो खूबसूरत भूत उसके साथ चिपक जाती है. और जैसे-जैसे कन्नन की शादी की तारीख नजदीक आती जाती है, कन्नन और अनु के बीच के रिश्ते में तमाम तरह के कंफ्यूजन को पैदा होने लगता है. इसकी वजह यह है कि सिर्फ वही शशि को देख सकता है और दूसरी तरफ वह अनु से कमिटेड भी है.

शशि हकीकत में है? या फिर वो कपोल कल्पना से जन्मी एक किरदार का नाम है? सच क्या है कोई नहीं जानता. लेकिन हां जो बात तय है वो ये कि लोकल सिंगर रूप (दिलजीत दोसांझ) के साथ पंजाब के फिल्लौर शहर में शशि के प्यार के अफसाने करवट लेने लगते हैं.

इधर कन्नन अपनी जिंदगी को लेकर जो भी कंफ्यूजन है उसे खत्म करने में जुट जाता है. और वो उन बातों पर फोकस करने लगता है जो उसे अपनी जिंदगी से चाहिए होता है.

Anushka

बड़ी दायरे की फिल्म 

'फिल्लौरी' में भूतिया किरदार तब और अब में इश्क के अंदाज की तुलना के लिए शामिल किया गया है. लेकिन सांकेतिक रूप से भारतीय उपनिवेश के इतिहास, कलाकारों और महिला ऑटोनोमी के प्रति सामाजिक रुख के चित्रण से इस फिल्म का दायरा और भी बढ़ जाता है.

यह फिल्म दकियानुसी परंपराओं और उसे बिना तर्क और समझ के मानने वाले लोगों पर एक करारा प्रहार है. यह फिल्म इस बात को दर्शाती है कि मौजूदा समय में भी जब कुदरती तौर पर बेहतर महिलाओं का ऐसे इंसान से सामना होता है जो कम टैलेंटड हैं, तो महिलाओं के लिए अपनी आकांक्षाओं को पालना कितना कठिन है.

इससे भी ज्यादा ये कि किसी त्रासदी में होने वाली मौत सिर्फ मरने वालों का आंकड़ा नहीं होता है. बल्कि ये वो लोग होते हैं जो अपने सपने और लक्ष्य को बगैर पूरा किए ही दुनिया को अलविदा कह देते हैं.

हालांकि फिल्म के असल बिंदु तक पहुंचने में लाल को काफी देर हो जाती है. वैसे भी ज्यादातर हिंदी फिल्में सेकेंड हाफ पहुंचते पहुंचते अपना फोकस खो देती हैं. लेकिन सौभाग्य से 'फिल्लौरी' में ऐसा नहीं है.

शुरुआती ह्यूमर, किरदारों के इर्द गिर्द बुनी कहानियों के चलते इंटरवल से पहले का हिस्सा काफी विस्तृत लगता है. तो शशि की भूतिया मौजूदगी इस हिस्से को थोड़ा फीका बनाती है.

इससे भी ज्यादा कन्नन और शशि के इर्द गिर्द बुनी गई कहानी में कुछ ज्यादा ही समय निकल जाता है. फिल्म के पहले हिस्से में सूरज के चेहरे पर सिर्फ एक ही अभिव्यक्ति दिखती है. तो अनुष्का सामान्य तौर पर अपनी करिश्माई एक्टिंग की छांव भर दिखती है. इसके अलावा कन्नन-अनु और शशि-रूप के मुकाबले दोनों के बीच का इक्वेशन भी कम दिलचस्प लगता है.

शानदार संगीत बनाती है फिल्म को खास 

दोनों जोड़े 21 वीं सदी के दो नौजवानों की जोड़ी के मुकाबले बुजुर्ग दंपत्ति की जोड़ी लगती है.

'फिल्लौरी' दूसरे हाफ में पूरी लय में आ पाती है. जब पोस्ट इंटरवल शशि और रूप के रोमांस को प्राथमिकता दी जाती है. आधुनिक समय में फिल्म का परिप्रेक्ष्य फिल्म की सेलिंग प्वाइंट में दिखता है.

'फिल्लौरी' की दूसरी खासियत इसके संगीत में है. खासकर शशि और रूप के प्रेम प्रसंग को जिस तरह से संगीत के इर्द गिर्द बुना गया है वो लाजवाब है.

म्यूजिक डायरेक्टर शाश्वत सचदेव और गीतकार अन्विता दत्ता प्रशंसा के पात्र हैं. खास कर शाहिबा सॉन्ग तो बेहतरीन है. ये गाना मिर्जा और शाहिबा की प्रचलित कथाओं के संदर्भ को दर्शाता है. तो रोमी और पावनी पांडे की लुभावनी आवाज का कोई मेल नहीं दिखता है. लाल को इसके लिए सलामी दी जानी चाहिए.

2009 में इम्तियाज अली की फिल्म 'लव आज कल' आई. इस फिल्म में भी अतीत का शानदार चित्रण किया गया था. इसके पीछे संदर्भ उस सवाल से जुड़ा है कि उस रूढ़िवादी और परंपरागत वक्त के बीच मैं कैसे रह पाता? हालांकि इस अकेले संदर्भ से 'फिल्लौरी' को समझा नहीं जा सकता.

जहां तक बात लेखन, निर्देशन और एक्टिंग की है तो अतीत में उत्साह की झलक दिखती है. जबकि इस कहानी में वर्तमान का संदर्भ हल्का जान पड़ता है.

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