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ओम पुरी को और वक्त मिलना चाहिए था: पल्लवी जोशी

उन्हें और वक्त मिलना चाहिए था कुछ गलतियां सुधारने के लिए, जिंदगी में अपने लिए कुछ और करने के लिए.

Updated On: Jan 07, 2017 09:02 PM IST

Pallavi Joshi

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ओम पुरी को और वक्त मिलना चाहिए था: पल्लवी जोशी

6 जनवरी की सुबह मैं चाय पीते हुए अपने फोन पर व्हाट्सएप मैसेज देख रही थी कि हमारे सिने एंड टीवी आर्टिस्ट एसोसिएशन के ग्रुप में एक मैसेज आया. ये सुशांत (सिंह) का मैसेज था जिसमें लिखा था, ‘वेरी शॉकिंग, ओम जी नो मोर!’ (बेहद दुखद. ओम जी नहीं रहे).

इसे पढ़ते ही मेरा पहला रिएक्शन था- कौन से ओम जी? ओम पुरी तो नहीं हो सकते! उनकी अभी इतनी उम्र कहां है? फिर इस बारे में मैंने इंटरनेट पर चेक किया. तब तक वहां इससे संबंधित कोई खबर नहीं आई थी. मुझे लगा कोई अफवाह होगी पर फिर ख्याल आया कि सुशांत इतने गैर-जिम्मेदार नहीं है कि किसी अफवाह पर विश्वास करके कोई मैसेज फॉरवर्ड कर दें.

ओम जी सिने एंड टीवी आर्टिस्ट एसोसिएशन के प्रेसिडेंट थे और सुशांत जनरल सेक्रेटरी, वो किसी भी खबर की पुष्टि किए बिना तो ऐसी बात नहीं कह सकते. अगर ये सच न होता तो वो इसे ग्रुप में क्यों लिखते? और इसके बाद तो फोन कॉल और संदेशों की बाढ़-सी आ गयी. इस उथल-पुथल के बीच मेरा मन सीधे वहां पहुंच गया, जहां मैं ओम जी से पहली बार मिली थी.

परफेक्ट अभिनय के लिए जुलाहों के साथ रहे 

यह मेरी पहली फिल्म थी जिसे श्याम बेनेगल निर्देशित कर रहे थे. आंध्र प्रदेश के पोचमपल्ली में इसकी शूटिंग हो रही थी. मैं इसमें ओम पुरी और शबाना आज़मी की बेटी का किरदार निभा रही थी. तब मेरी उम्र तकरीबन सोलह साल रही होगी. जहां फिल्म से जुड़े सभी लोग और हम सभी कलाकार हैदराबाद के होटल में रह रहे थे.

(फोटो: नसीरुद्दीन शाह के ट्विटर अकाउंट से)

(फोटो: नसीरुद्दीन शाह के ट्विटर अकाउंट से)

वहीं ओम जी, जो फिल्म में एक हैंडलूम कारीगर की भूमिका निभा रहे थे, पोचमपल्ली गांव के जुलाहों के साथ रहते थे. वहां न ठीक बाथरूम था न कोई अन्य सुविधा पर वहां रहने में ओम जी को कभी कोई दिक्कत पेश नहीं आई. वे वहीं गांव में रहते और सुबह 9 बजे शूटिंग शुरू होने से पहले और फिर शूट खत्म होने के बाद दो-तीन घंटे लूम पर बुनाई करने की प्रैक्टिस करते.

फिल्म खत्म होने तक वे इसमें इतने कुशल हो गए थे कि सभी उन्हें चिढ़ाने लगे थे कि वो एक्टिंग के अलावा हैंडलूम के काम को भी अपना कैरियर बना सकते हैं. जब तक वहां शूटिंग पूरी हुई ओम जी ने एक खूबसूरत ब्लैक एंड व्हाइट डिजाइन बुना था. उन्होंने फिल्म की पूरी कास्ट को अपने हाथ से बुने गए कपड़े का टुकड़ा भेंट किया.

अपने काम के प्रति ऐसा समर्पण कम ही देखने को मिलता है. जहां एक ओर शूट का पैक अप होते ही सारे एक्टर अपने कमरे में जाकर टीवी देखते, रिफ्रेश होते या अगले दिन की तैयारी के लिए अपने एसी कमरों में सुकून की नींद सोते, वहीं ओम जी को इन सब की कोई परवाह नहीं होती.

वे उन छोटे झोपड़ीनुमा घरों के बेकार-से गद्दों पर बिना पंखे के भी आराम से सो जाते, आर्ट डायरेक्टर नीतीश रॉय के सेट के लिए बनाये गए टॉयलेट का प्रयोग करते और कुएं के पास खुले में ही नहा लेते. और ये सब इसलिए कि वे फिल्म के अपने जुलाहे के किरदार के साथ न्याय कर पायें.

वे अपनी बुनाई की स्पीड और एक्शन बिल्कुल परफेक्ट चाहते थे इसलिए उन्हें वहां रहना, बुनाई सीखना सब मंजूर था. पर क्या आप यकीन करेंगे कि उन्होंने ये सब मेहनत बस फिल्म के तीन सीनों के लिए की थी. ऐसा था उनका अपने काम के प्रति समर्पण.

खुशदिल और पिता समान व्यक्तित्व

इस जुझारू, कर्मठ अभिनेता का एक दूसरा पहलू भी था, खुशदिल, सबको प्यार करने वाला और मजाकिया रूप. उन्होंने थिएटर में काफी काम किया था. पैरेलल सिनेमा के क्षेत्र में भी वे खासे एक्टिव थे. इस वजह से उनके पास ज्ञान का भंडार था.

कई बार हम सब लोग घंटो बैठकर फिल्मों के बारे में बातें किया करते थे. मुझे एक घटना याद है. हैदराबाद में फिल्म का एक लंबा शेड्यूल था. मैं काफी बोर हो चुकी थी. एक रोज छुट्टी का दिन था और बेनेगल साहब हमें लंच पर बाहर ले जाने वाले थे.

मेरा चेहरा देख कर ओम जी को समझ आ गया कि मुझे वहां अच्छा नहीं लग रहा है. और फिर वो मुझे अपने साथ मोटरसाइकिल पर बंजारा हिल्स तक घुमाने लेकर गए. यह 1985 का साल था और वहां तब तक निर्माण कार्य चल ही रहा था. हमने वहां खूब मस्ती की.

इस फिल्म में वे मेरे पिता का किरदार निभा रहे थे शायद इसीलिए उनसे मेरा उदास चेहरा नहीं देखा गया. उन्होंने बिल्कुल एक बेटी की तरह मेरा ख्याल रखा. वे तब राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजे जा चुके अभिनेता थे और मैं बिल्कुल नई अभिनेत्री.

उन्हें मेरा ध्यान रखने या मुझे अच्छा महसूस करवाने की कोई जरूरत नहीं थी, पर वो ऐसे ही थे, एक निहायत खूबसूरत इंसान.

वे मेरे साथ बिल्कुल सामान्य तरीके से बातचीत करते, मुझे कभी ऐसा महसूस ही नहीं हुआ कि मैं देश के इतने टैलेंटेड और सम्मानित अभिनेता से बात कर रही हूं.

वे हमेशा प्यार बांटते रहे. कोई और उन जैसा हो ही नहीं सकता. और शायद इसीलिए मुझे टीवी पर दिए गए उनके बयानों के बारे में सुनकर बहुत दुःख होता है. मुझे लगता है कि अपनी बात लोगों को समझाने के लिए उन्हें और वक्त मिलना चाहिए था.

(फोटो: नसीरुद्दीन शाह के ट्विटर अकाउंट से)

(फोटो: नसीरुद्दीन शाह के ट्विटर अकाउंट से)

किसी का बुरा नहीं चाहते थे ओम पुरी 

उन्हें और वक्त मिलना चाहिए था कुछ गलतियां सुधारने के लिए, जिंदगी में अपने लिए कुछ और करने के लिए, निजी मसलों को सुलझाने के लिए, और कई यादगार किरदार निभाने के लिए, और सबसे जरूरी प्यार बांटने के लिए.

उन्हें हम सब के साथ बिताने के लिए और वक्त मिलना ही चाहिए था. पर अब वो बस हमारी यादों में बाकी रह गए. हम आपको हमेशा मिस करेंगे ओम जी!

मुझे नहीं पता ऐसा कहना सही है या नहीं पर मैं अपने दिमाग से ये बात निकाल ही नहीं पा रही हूं. अगर मौत ही इस दुनिया का आखिरी सच है तो ये तीन महीने पहले क्यों नहीं हुआ? उनके उस विवादित बयान से बहुत पहले... जब वे न्यूज़ चैनलों के गुस्से का शिकार नहीं बने थे. जब लोग हर रात टीवी पर इस मुद्दे की बात छेड़कर उनकी बेइज्जती नहीं कर रहे थे.

वो किसी का का बुरा नहीं चाहते थे, पर फिर भी उन्हें ऐसी जिल्लत का सामना करना पड़ा. कोई नहीं जानता क्यों?

पर अब यहां अजीब-सी शांति है. वो जा चुके हैं. वहां जहां अब कोई विवाद नहीं होगा, कोई चिंता नहीं, कोई बहस या झगड़ा नहीं. ओम जी को आखिरकार शांति मिल ही गयी. ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दे ओम जी.

लेखिका राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित अभिनेत्री हैं

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