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ओमपुरी: चक्रव्यूह से मुक्त हो गया अनंत वेलनकर

'अर्धसत्य' में उनकी पढ़ी कविता सभी को याद आती रहेगी और उनका जज्बा भी याद दिलाती रहेगी...

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Jan 06, 2017 12:03 PM IST

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ओमपुरी: चक्रव्यूह से मुक्त हो गया अनंत वेलनकर

ओमपुरी से मेरी मुलाकात अक्टूबर 2015 में काम के ही सिलसिले में हुई थी. उस समय भी उनकी तबियत खराब चल रही थी. वो एक फिल्म प्रमोशन के सिलसिले में मुंबई से दिल्ली आ रहे थे.

इस दौरान मुझे उनसे मिलना था. दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर मैं उनका इंतजार कर रहा था.

ओमपुरी से मिलने के हड़बड़ी में मैं एयरपोर्ट करीब एक घंटे पहले ही पहुंच गया था. घंटे भर के इंतजार के दौरान मुझे 'अर्द्धसत्य' के अनंत वेलनकर की बारहा याद आ रही थी.

उसकी लाल आंखें. समाज में फैली कुरीतियों को अकेले दमन कर देने की उसकी सोच याद आ रही थी. अपराधियों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटने वाला मुंबई पुलिस का एक नया सब इंस्पेक्टर.

फिल्मों के बाहर बिल्कुल आम इंसान थे ओम पुरी

ये सब सोचते हुए घंटे भर बीत गए. फ्लाइट के लैंड करने की सूचना बाहर मिल गई. करीब 15 पंद्रह मिनट बाद ओमपुरी बाहर आते दिखे.

मुलाकात हुई तो बातें करने के दौरान उनकी सांसें फूल रही थीं. ऐसा लग रहा था कि उन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही है. उन्होंने थोड़ी ही देर बाद कहा कि मुझे अपना बैग खोलना होगा. उसमें मेरी दवाएं हैं.

उन्होंने बैग खोला और दवाएं खाईं. लेकिन इन फूलती सांसों के बीच भी वो लगातार बातें कर रहे थे. ऐसा कहीं से नहीं लग रहा था कि उनकी तबियत नासाज है.

फोटो. रॉयटर्स

फोटो. रॉयटर्स

जैसा की कोई भी आम आदमी करता, मैंने उनसे मिलते ही उनकी फिल्मों पर उनसे कुछ चर्चा शुरू की. लेकिन एक बेहतरीन कलाकार की तरह उन्होंने बातों का रुख अपने मनचाहे विषय की तरफ मोड़ने में समय नहीं लगाया.

सिनेमाई परिदृश्य से बाहर का कोई आदमी शायद ही ये भरोसा कर पाए कि उन्होंने विदर्भ के किसानों की बातें करना शुरू कर दिया. वे किसानों की लगातार होती मौतों पर चिंतित दिख रहे थे. उन्होंने कहा कि सरकारें गंभीरता से इन मौतों पर नहीं सोच रही है. ये समस्या एक दिन त्रासदी में तब्दील हो जाएगी.

राजनीति और सामाजिक विषयों में थी दिलचस्पी

उनकी बातों से आराम से महसूस किया जा सकता था कि भले ही वे सिने जगत में हों लेकिन आम लोगों से जुड़े विषय उनके लिए उतने ही महत्वपूर्ण थे जितने की किसी आम आदमी के लिए हो सकते हैं.

तीन दिनों तक हम साथ रहे. प्रमोशन के काम के लिए जब भी उन्हें मीडिया से बात करनी होती थी, बस उतनी ही देर तक वे फिल्मों पर चर्चा कर रहे थे. उसके बाद वे फिर शुरू हो जाते आम राजनीतिक मुद्दों और देश की घटनाओं पर चर्चा करने.

फोटो. रॉयटर्स

फोटो. रॉयटर्स

ये मैं लगातार देख रहा था. मैंने बरबस उनसे पूछा कि क्या आपकी सिनेमाई विषयों में दिलचस्पी नहीं है?

उन्होंने कहा ‘तुम मेरी जिंदगी की ज्यादातर फिल्मों को देखोगे तो पाओगे कि ये आम आदमी के विषयों पर ही बनी हुई हैं. वो फिल्में मेरी इसी सोच का नतीजा है. या ये भी कह सकते हो कि शायद वैसी फिल्में करते हुए मैं ऐसा बन गया. हम एनएसडी वालों की ट्रेनिंग ही ऐसी होती है.’

वो खुद के बारे में बताने से ज्यादा अपने से मिलने वालों के बारे में जानना पसंद करते थे. शायद ये उनका फिल्मों के लिए कहानी खोजने का तरीका रहा होगा. लेकिन उनसे मिलने वाला खुद को ही एक सेलिब्रिटी जैसा महसूस करने लगता था.

तीन दिन बाद वे वापस लौट गए. लेकिन उनसे मुलाकात के दौरान भी मेरे लिए ये यकीन करना मुश्किल था कि 70 एमएम के पर्दे पर अपने अभिनय से दर्शकों के रोंगटे खड़े कर सकने में सक्षम एक कलाकार इतना सामान्य जीवन जीता है. वो सामान्य लोगों के मुद्दे पर सोचता है.

ओमपुरी का भले ही निधन हो गया. लेकिन उनकी सोच और सोच पर बनी फिल्में हमेशा जिंदा रहेंगी. 'अर्धसत्य' में उनकी पढ़ी कविता सभी को याद आती रहेगी और उनका जज्बा भी याद दिलाती रहेगी...

चक्रव्यूह से बाहर निकालने पर मुक्त हो जाऊं भले ही, फिर भी चक्रव्यूह की रचना में फर्क नहीं पड़ेगा....

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