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ओम पुरी के आने से जीवंत हो उठता था सिनेमाई पर्दा

उन्होंने कथित ‘गंभीर’ और ‘हिट’ फिल्मों के बीच एक पुल बनाने में भी मदद की है, यह उनके प्रोफेशनलिज्म का सुबूत है.

Updated On: Jan 07, 2017 09:01 PM IST

Vishnu Khare

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ओम पुरी के आने से जीवंत हो उठता था सिनेमाई पर्दा

दरमियाना कद,सादा लेकिन चेचक से भरा चेहरा, जिसे भारी मेक-अप के नीचे छिपाने या प्लास्टिक सर्जरी करवाने की कोई कोशिश नहीं की.

खैर भावनाओं को शक्ल-ओ-सूरत के एक-एक नक्श से अभिव्यक्ति देने की प्रतिभा, बदन की हर हरकत पर नियंत्रण, साथ ही ढील देने की क्षमता और इस सब के साथ एक ऐसी सशक्त आवाज जो अमरीश पुरी, रजा मुराद और अमिताभ बच्चन को चुनौती देती थी.

मेथड स्कूल के फौलादी एक्टर 

ओम पुरी पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा दिल्ली की दुहरी भट्ठी में तपे-ढले हुए भारतीय शैली के मेथड स्कूल के फौलादी एक्टर थे.

वह अम्बाला से सिर्फ हीरो नहीं, बल्कि बड़े और सार्थक अभिनेता बनने निकले थे. 1970 के उस दशक में सिर्फ हिंदी में ही नहीं, दूसरी भारतीय जुबानों में भी नई सोच, रुझान और सूझ-बूझ वाले अभिनेता-अभिनेत्री और निर्माता-निर्देशक सक्रिय हो रहे थे जो एक-दूसरे को जानते थे.

ओम पुरी की प्रतिभा को 1976 में ही राष्ट्रीय स्तर पर असाधारण ढंग से जिस फिल्म से पहचान मिली थी, उसकी भाषा हिंदी भी नहीं थी.

ओम पुरी को मराठी के नाटककार विजय तेंदुलकर के मूल नाटक पर आधारित फिल्म ’घाशीराम कोतवाल’ के ’कुख्यात’ नायक की जोखिम-भरी भूमिका दे दी गई. फिल्म और उसमें ओम पुरी की अदाकारी दोनों सफल रही.

तस्वीर: यू ट्यूब से

तस्वीर: यू ट्यूब से

केतन मेहता के 'भवनी भवई' और सत्यजित राय के ’सद्गति’ ने ओम पुरी को फिल्मी दुनिया में स्थापित कर दिया. प्रेमचंद की कहानी पर आधारित फिल्म 'सद्गति' में उन्होंने एक दलित नायक की भूमिका निभाई.

’अर्धसत्य’ में पुलिस अफसर की उनकी भूमिका अतुलनीय है. ’मिर्च मसाला’ वर्तमान युग की पृष्ठभूमि पर बनी शायद पहली नारीवादी फिल्म है. इसमें ओम ने एक ईमानदार बूढ़े चौकीदार की अत्यंत ही जीवंत भूमिका निभाई.

इन फिल्मों के बाद ओम पुरी सर्वसम्मति से पूरे भारत में एक अद्वितीय अभिनेता मान लिए गए.

किसी एक ढर्रे में नहीं बंधा था उनका अभिनय 

ओम पुरी ने स्वयं को एक ओर न तो दलित,आदिवासी या विद्रोही पुलिसवाले के एक ढर्रे या ‘टाइप’ के किरदारों तक सीमित रखा और न ही उन्होंने केवल समानांतर सिनेमा को अपनी शरणस्थली बनाई.

वह केवल गोविन्द निहालानी या श्याम बेनेगल की फिल्मी धारा से  जुड़े नहीं रहे. शायद इसमें उन्होंने अपने वरिष्ठ अमरीश पुरी से कोई सबक लिया हो. 'माचिस’, 'नरसिम्हा’, 'आस्था’, 'मकबूल’, 'चाची 420’, 'हेराफेरी’, 'चोर मचाए शोर’, 'मालामाल वीकली’, 'दबंग’, 'बजरंगी भाईजान’, 'सिंग इज किंग’ आदि सरीखी बॉक्स-ऑफिस पर सफल, 'मुख्यधारा’ फिल्मों में कामयाबी और समर्पण से काम करने से उन्होंने कभी गुरेज नहीं किया.

ओम पुरी

इससे शायद उन्होंने कथित ‘गंभीर’ और ‘हिट’ फिल्मों के बीच एक पुल बनाने में भी मदद की हो. यह उनके प्रोफेशनलिज्म का भी सुबूत है.

बड़े परदे पर अपने विशिष्ट चेहरे-मोहरे,आवाज और अदाकारी की वजह से अनायास ही ‘सीन’ के केंद्र में आ जाते थे. वह केवल गंभीर अदाकारी के कैदी नहीं थे. स्वाभाविक रूप से हास्य-भूमिकाएं भी निभा ले जाते थे. उनकी प्रारंभिक फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ इसका सुबूत है.

वह नियमित रूप से दोनों किस्म की फिल्मों में दोनों तरह के किरदार निभाते रहे. उन्हें माफियाई चरित्र भी मिलते रहे.

उनका चेहरा सर अलेक गिनेस सरीखा सादा न था लेकिन वह हर अलग पात्र में खुद को इस तरह ढाल लेते थे कि दर्शक एक विशेष चेहरे और विशेष आवाज वाले ‘ओम पुरी’ को भूल जाता था. वह परदे पर दिखाए जा रहे किरदार में खो जाता था.

यह यूं ही नहीं है कि उन्होंने दो सौ के करीब फिल्मों में काम किया. वह कभी बेकार बैठे नहीं रहे. मृत्यु की शाम को भी वह एक शूटिंग से लौटे थे.

विदेशी फिल्मों में भी छोड़ी अपने अभिनय की छाप

उन्होंने कई भारतीय भाषाओं की फिल्मों में तो काम तो किया ही है. साथ ही कई विदेशी फिल्मों में भी अभिनय किया.

यह वैश्विक स्तर पर उनकी अभिनय-क्षमता की स्वीकृति का प्रमाण है कि बहुत पहले से उन्हें ‘गाँधी’, 'सिटी ऑफ जॉय’, 'माइ सन दि फैनैटिक’, 'ईस्ट इज ईस्ट’, 'दि पैरोल ऑफिसर’, 'वुल्फ’, 'दि घोस्ट एंड द डार्कनैस’ तथा 'चार्ली विल्सन्स वॉर’ जैसी ब्रिटिश और हॉलीवुड फिल्मों में हास्य और गंभीर दोनों किस्म की प्रमुख भूमिकाएं मिलती रहीं.

ओम पुरी की एक विदेशी फिल्म ईस्ट इज ईस्ट का ट्रेलर:

ओम पुरी को नियमित रूप से राष्ट्रीय-विदेशी अभिनय-सम्मान मिलते रहे. ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर’ पदवी से और भारत ने ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया.

राजनीतिक रूप से उन्हें प्रतिबद्ध और धर्म-निरपेक्ष ही माना जाएगा. हाल ही में उन्होंने पाकिस्तान में अपनी पहली फिल्म ‘एक्टर इन लॉ’ खत्म की थी जो रफ़ाक़त मिर्ज़ा द्वारा निर्देशित एक कॉमेडी है. इस फिल्म की अब पूरी दुनिया में फैले दक्षिण एशियाई बिरादरी में बहुत उत्सुकता से प्रतीक्षा रहेगी.

टीवी सीरियलों में अमर अभिनय 

खास बात यह है कि ओम पुरी बहुत सफलतापूर्वक टेलीविजन पर भी आते रहे. एक ओर तो उन्होंने मनोहर श्याम जोशी के सीरियल ‘कक्काजी कहिन’ में जुगाडू कक्काजी को अमर कर दिया.

दूसरी ओर एक हिन्दू दलित शरणार्थी के रूप में अपनी संजीदा, त्रासद उपस्थिति से उन्होंने भीष्म साहनी के ऐतिहासिक विभाजन-क्लासिक ‘तमस’ को करोड़ों राष्ट्रीय दर्शकों की चेतना में हमेशा के लिए स्थापित कर दिया.

tamas

इससे यह भी सिद्ध होता है कि उत्कृष्ट साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए हमें ओम पुरी जैसे श्रेष्ठ अभिनेता चाहिए. वह एक्टिंग की पाठ्य-पुस्तक थे.

एक बड़े अभिनेता की मौजूदगी से कई निर्माता-निर्देशक असामान्य चरित्रों और विषयों को सिनेमा या टीवी के परदे पर उतारने की प्रेरणा, दृष्टि, साहस और उत्साह बटोर पाते हैं.

यह सिनेमा और टीवी के लिए सिर्फ अपनी भाषा में ही नहीं अन्य जुबानों में भी, कभी-कभी तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, एक बेहतर वातावरण निर्मित करता है.

वह राजनीतिक पार्टियों, सरकारों और जनता को सोचने पर भी बाध्य कर सकता है.

विवादों के बीच भी करते रहे अभिनय 

यह एक बदकिस्मती ही थी कि ओम पुरी का पारिवारिक जीवन अंतिम वर्षों में विवादग्रस्त हो गया था. लेकिन इसे उन्होंने अपनी अभिनय-कला को कुप्रभावित नहीं करने दिया था. कुछ असावधान राजनीतिक विवादों ने भी उन्हें परेशान किया था.

अभी उनकी कुछ देशी-विदेशी फिल्मों की शूटिंग चल रही थी जिनमें शायद उनके रोल पूरे हो गए हों. लेकिन आजकल 66 वर्ष कोई उम्र नहीं होती. ओम पुरी की जीवन-फिल्म का प्रोजेक्शन इस तरह बीच में नहीं टूटना चाहिए था.

दक्षिण एशियाई और विश्व-सिनेमा के पास उनकी इतनी यादगार फिल्में हैं, जो उनकी कालजयी उपस्थिति से बड़े और छोटे परदे को लंबे अर्से तक जीवंत बनाए रखेंगी.

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