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नाम शबाना रिव्यू: तापसी-अक्षय-पृथ्वीराज में दम है, लेकिन कहानी में कुछ कम है

फिर भी ‘नाम शबाना’ बेबी से बेहतर फिल्म है.

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Updated On: Mar 31, 2017 08:05 AM IST

Anna MM Vetticad

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नाम शबाना रिव्यू: तापसी-अक्षय-पृथ्वीराज में दम है, लेकिन कहानी में कुछ कम है
निर्देशक: शिवम नायर
कलाकार: तापसी पन्नु, पृथ्वीराज, मनोज बाजपेयी, अक्षय कुमार, वीरेंद्र सक्सेना, अनुपम खेर, जाकिर हुसैन

निर्देशक शिवम नायर की ‘नाम शबाना’ के शुरू में ही फिल्म की मुख्य किरदार शबाना अपने प्रेमी से पूछती है कि वह उसे प्यार क्यों करता है. वह जबाव देता है: मुझे शक है कि पहले कभी किसी पुरूष ने यह बात किसी महिला से कही होगी, लेकिन मैं तुम्हें इसलिए प्यार करता हूं क्योंकि तुम्हारे साथ रहकर मैं खुद को सेफ महसूस करता हूं.

चूंकि इस बात की कोई तार्किक या वैज्ञानिक वजह नहीं है कि किसी महिला के साथ रहकर किसी व्यक्ति को क्यों भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस नहीं करना चाहिए. मुझे लगता है कि इस डायलॉग के जरिए इस बात को उभारने की कोशिश की गई है कि शबाना मार्शल आर्ट में माहिर है.

किसी इंसान को प्यार करने की यह एक अजीब वजह है. फिल्म में इस सवाल का जबाव बार-बार देने की कोशिश की गई और हर बार जबाव आपको असंतोषजनक लगेगा.

उदाहरण के लिए ये सुनिए: फालतू-सा लड़का जय क्यों शबाना को प्यार करेगा. न तो वह इतनी मोहक है और न ही इस सब में उसकी कोई दिलचस्पी दिखती है. हां, जब वह रिंग में होती है तो सबके छक्के छुड़ा देती है.

इस रिव्यू में आपको आगे कई ऐसे सवाल मिलेंगे.

सवाल ही सवाल

तापसी पन्नु यानी शबाना कॉलेज में पढ़ने वाली एक लड़की का किरदार निभा रही हैं, जो कूडो की प्रैक्टिस भी करती है. उसे भारत की एक टॉप सीक्रेट खुफिया एजेंसी में नौकरी पर रखा जाता है.

शबाना महाराष्ट्र में अपनी मां के साथ रहती है. जय अकेला नहीं है जिसकी शबाना पर नजर है. कोई एक अदृश्य इंसान हर कदम पर उसका पीछा कर रहा है. मध्यवर्गीय शबाना मुंबई की एक भीड़भाड़ वाली कॉलोनी में रहती है. तभी उसकी जिंदगी में एक हादसा होता है. हमें वह बात बताई जाती है जिसका अंदाजा तब तक हमें हो जाता है. यानी एक गुमनाम खुफिया एजेंसी उसका पीछा कर रही थी ताकि उसे अपने यहां भर्ती कर सके.

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सीक्वल तो आपने बहुत सुने होंगे. लेकिन ‘नाम शबाना’ 2015 में आई अक्षय कुमार की फिल्म ‘बेबी’ का प्रीक्वल है. इस फिल्म में ‘बेबी’ से पहले की कहानी बताई गई है. ‘बेबी’ में पन्नु ने एक छोटा सा लेकिन दमगार रोल किया था. ‘बेबी’ के निर्देशक नीरज पांडे ‘नाम शबाना’ के निर्माता हैं.

‘बेबी’ में पन्नु के अभिनय और फाइट सीन्स में गजब परफॉर्मेंस की खूब तारीफ हुई थी, इसलिए यह सोचा गया होगा कि क्यों न इस किरदार को केंद्र में रखकर फिल्म बनाई जाए. लेकिन उन्हें शबाना के किरदार को तैयार करने और उसके इर्दगिर्द एक विश्वसनीय कहानी बुनने पर भी मेहनत करनी चाहिए थी.

‘नाम शबाना’ के मारधाड़ वाले बहुत सारे दृश्यों में पन्नु धाकड़ दिखाई दी हैं, लेकिन जहां तक एक्टिंग की बात है, वहां ज्यादा दम नहीं दिखाई देता. अपनी भावनाओं के दबा कर रखने वाली महिला के किरदार में वह कोई जान नहीं डाल पाई हैं. बस फिल्म में उनके मुक्के ही देखने लायक हैं. जब वह मुक्के जड़ रही होती हैं, तो आपको बांध लेती हैं. लेकिन जब वह किसी टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं ले रही हैं या फिर किसी बदमाश की धुनाई नहीं कर रही हैं, उस वक्त वह फीकी नजर आती हैं.

दक्षिण भारत के सिनेमा प्रेमी पन्नु को अच्छी तरह जानते हैं. हिंदी दर्शकों ने उनकी एक्टिंग का जौहर पिछले साल आई ‘पिंक’ में देखा था. ‘नाम शबाना’ में वह उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती हैं. वह कमजोर लेखन और निर्देशन का शिकार बनी हैं.

लचर कहानी, कमजोर किरदार

पिछले साल आई ‘अकीरा’ की टीम की तरह ही ‘नाम शबाना’ की टीम का ध्यान भी पूरी तरह ऐसी फिल्म बनाने टिका नजर आता है जिसे ‘महिला केंद्रित’ फिल्म का तमगा मिल सके. उनका ध्यान महिला किरदार को मजबूती से खड़ा करने पर कम दिखाई देता है. न कहानी दमदार है और न ही मुख्य किरदार में दर्शकों को बांधे रखने की कूवत है. ऐसे में, यह फिल्म अच्छी तरह कोरियोग्राफ किए गए एक्शन सीन्स की लड़ी से ज्यादा कुछ नहीं दिखती. कहानी में कई कमियां हैं और बहुत से सवालों के जवाब नहीं मिलते.

एक सवाल तो यही है कि आखिर एजेंसी शबाना को ही क्यों रखती है? उसमें ऐसा क्या है जो देश के राष्ट्रीय और निजी खेल कार्यक्रमों और क्लबों में मौजूद तेज तर्रार, आक्रामक, जोशीली और ईमानदार महिला खिलाड़ियों में नहीं है? हमें बताया जाता है कि उसका धर्म एक अहम योग्यता है, क्योंकि यह उसे ऐसा नजरिया देता है जो किसी हिंदू या मुसलमान राजनेता के पास नहीं है. क्या बस यही काफी है?

सवाल कई और भी हैं.

जैसे, क्यों उसकी ट्रेनिंग बीच में छुड़वाकर उसे दुनिया के सबसे अहम खुफिया मिशनों में से एक मिशन का हिस्सा बनाया जाता है? जाहिर तौर पर वह अच्छी होगी, लेकिन इतनी अच्छी? इस बात का कोई सबूत नहीं है कि इस काम के लिए भारत में वही बेस्ट है.

क्यों भारत सरकार की इतनी बड़ी खुफिया एजेंसी एक नौसिखिये पर अपना सब कुछ झोंक देती है?

क्यों दुनिया का एक मोस्ट वॉन्टेड अपराधी बेहद सुरक्षा वाली किसी अनजान जगह पर जाकर नहीं रह सकता है जबकि वह इतने सालों से सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को चमका देता रहा है?

क्यों वह एक दिन बहुत बड़ी बेवकूफी करेगा- लगता है मानो यह शबाना और उसकी टीम की सुविधा के लिए किया गया हो और इसलिए क्यों फिल्म के लेखक पांडे और बेहतर ट्विस्ट नहीं लिख पाए हों.

और भी बहुत सारे ऐसे सवाल हैं जो इस फिल्म को देखते हुए आपके जेहन में आएंगे.

जब अगली बार फिल्म बनाएं...

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अक्षय कुमार ने नाम शबाना में अजय नाम का एक छोटा सा किरदार निभाया है, जो बेबी का मुख्य किरदार था. जितना फिल्म के निर्माताओं ने सोचा होगा, नाम शबाना में अक्षय का किरदार उसका आधा भी कूल नहीं है. अनुपम खेर भी टेक्निकल एक्सपर्ट के तौर पर शुक्लाजी के छोटे से किरदार में है जिसे हम पहले बेबी में भी देख चुके हैं. मनोज वाजपेयी शबाना के बॉस बने हैं और डैनी डेंगजोम्पा मनोज वायपेयी के बॉस के रोल में है. दोनों का अभिनय बस ठीक ठाक ही है.

मलयालम फिल्मों के सुपरस्टार पृथ्वीराज फिल्म में खलनायकों में से एक हैं. वह हमेशा की तरह हैंडसम लगे हैं और उन्होंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है. एक एक्टर में इतना करिश्मा तो होता है कि वह किसी भी सीन में जान डाल दे, लेकिन तभी जब कहानी या सीन को अच्छी तरह लिखा गया हो. लेखन बहुत कमजोर है.

फिर भी ‘नाम शबाना’ ‘बेबी’ से बेहतर फिल्म है. ‘बेबी’ के मुकाबले इसमें ज्यादा निखार है और बेवकूफ बदमाश भी इसमें कम बेवकूफ हैं.

एक सुझाव है. जब भी आप अगली बार किसी महिला पर फिल्म बनाएं तो इसलिए बनाएं कि आपके पास एक अच्छी कहानी है. फिल्म इसलिए न बनाएं कि महिला प्रधान फिल्मों का ट्रेंड चल रहा है तो आप भी बहती गंगा में हाथ धो लें.

अगली बार आप किसी हिट फिल्म का प्रीक्वल बनाएं, तो इसलिए बनाएं कि आपके पास एक दमदार कहानी है. सिर्फ इसलिए फिल्म न बनाएं कि आप एक कामयाब ब्रैंड के सहारे फिल्म बनाकर फिर पैसा बनाने चाहते हैं.

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