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नाम शबाना बैन: बॉलीवुड से पाक का रिश्ता 'कभी इनकार, कभी इकरार' का है

पाकिस्तान के सेंसर बोर्ड को फिल्म में दिखाए गए आतंकवाद के कुछ सीन पर ऐतराज है

Gautam Chintamani Updated On: Apr 13, 2017 12:27 PM IST

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नाम शबाना बैन: बॉलीवुड से पाक का रिश्ता 'कभी इनकार, कभी इकरार' का है

पाकिस्तान ने बॉलीवुड की फिल्म 'नाम शबाना' पर पाबंदी लगा दी है. पाकिस्तान के सेंसर बोर्ड को फिल्म में दिखाए गए आतंकवाद के कुछ सीन पर एतराज है. वहां के सेंसर बोर्ड का कहना है कि इन सीन में पाकिस्तान की इमेज को गलत तरीके से पेश किया गया है.

ये कोई पहली बार नहीं कि पाकिस्तान ने किसी बॉलीवुड फिल्म को अपने यहां प्रतिबंधित किया है. बॉलीवुड को लेकर पाकिस्तान का रवैया कभी इकरार, कभी इनकार का रहा है.

अभी पिछले साल ही दोनों देशों के बीच तनातनी के चलते, पाकिस्तान में भारतीय फिल्में दिखाने पर रोक लगा दी गई थी.

देशों की तनातनी से फिल्मों पर रोक 

कुछ महीनों बाद, इस साल जनवरी में ये पाबंदी हटा ली गई. सरहद के दोनों तरफ सिनेमा और बेहतर रिश्तों के पैरोकारों ने इस बात का जश्न मनाया. मगर, पाबंदी हटने के बाद जिस फिल्म 'रईस' का पाकिस्तान में बेसब्री से इंतजार हो रहा था, पाकिस्तान ने उसे ही बैन कर दिया था.

उम्मीद थी कि शाहरुख खान की रईस और ऋतिक रौशन की काबिल पाकिस्तान में दिखाई जाएंगी, मगर रईस पर पाबंदी लगा दी गई. वजह ये बताई गई कि इसमें इस्लाम के एक फिरके की गलत तस्वीर पेश की गई थी.

हिंदी फिल्मों में कई बार पाकिस्तान की थीम पर फिल्में बनीं हैं. पाकिस्तान के कई कलाकारों ने हिंदी फिल्मों में काम किया है. बॉलीवुड का यही मानना है कि सरहद खिंच जाने के बावजूद इसके आर-पार के कलाकारों का जज्बा एक जैसा ही है.

एक दूसरे से लगाव के बावजूद सरहद के दोनों तरफ के लोगों का फिल्मों और कलाकारों के बारे में नजरिया अलग है. पाकिस्तान के लोग बॉलीवुड की उन फिल्मों को खूब पसंद करते हैं, जो हालात से एकदम परे, सपनों की दुनिया में ले जाती हैं.

जैसे पश्चिमी देश, भारत को संपेरों का देश मानते हैं. उसी तरह पाकिस्तान के लोगों को भी लगता है कि बॉलीवुड की फिल्में सिर्फ शानदार सीन और नाच-गाने के लिए देखी जानी चाहिए. लेकिन जब भी बॉलीवुड की कोई फिल्म हकीकत पर आधारित होती है, तो पाकिस्तान में अक्सर उस पर पाबंदी लग जाती है.

जरा-जरा से एतराज से 15 फिल्मों पर पाबंदी

Salman-katrina

एक था टाइगर में सलमान-कटरीना ने काम किया था

पिछले कुछ दिनों में पाकिस्तान ने करीब 15 भारतीय फिल्मों पर पाबंदी लगाई है. इनमें 'एक था टाइगर' (2012) में वहां के सेंसर बोर्ड को आईएसआई एजेंट के भारतीय एजेंट के प्यार में पड़ने पर एतराज था.

इसी तरह एजेंट विनोद (2012) पर आईएसआई और पाकिस्तान की गलत तस्वीर पेश करने का इल्जाम लगा. बेबी (2012) फिल्म में सभी आतंकियों को मुसलमान दिखाने में दिक्कत थी.

डेल्ही बेली (2011), डर्टी पिक्चर (2011) पर अश्लील होने का इल्जाम लगाकर रोक लगाई गई. खिलाड़ी 786 (2012) से पाकिस्तान को अपने लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचने का डर था. 'तेरे बिन लादेन' (2013) की कॉमेडी पर भी पाकिस्तान के सेंसर बोर्ड को ऐतराज था.

डेविड (2013) फिल्म में मुहर्रम के जुलूस को गलत ढंग से फिल्माने का आरोप लगाकर पाबंदी लगाई गई. रांझणा (2013) पर इसलिए रोक लगी क्योंकि उसमें एक मुस्लिम लड़की को हिंदू लड़के से प्यार होने की कहानी थी.

सरहद के पर बॉलीवुड फिल्में खूब पसंद की जातीं हैं 

पाकिस्तानी नागरिक बॉलीवुड फिल्में पसंद करते हैं. बॉलीवुड को भी इस बात से तसल्ली होती है कि सरहद के उस पार भी उसकी फिल्मों के शैदाई हैं. जब भी किसी फिल्म को सरहद के दोनों पार पसंद किया जाता है, तो बॉलीवुड को इससे काफी खुशी मिलती है.

हाल ही में पाकिस्तान के एक लेखक ने सोशल मीडिया पर बताया कि पाकिस्तान में बॉलीवुड फिल्में कितने चाव से देखी जाती हैं, तो इस पर लोगों ने खुलकर खुशी जाहिर की.

सोशल मीडिया पर ये पोस्ट, फिल्म बदरीनाथ की दुल्हनिया के पाकिस्तान में रिलीज होने के बाद लिखी गई थी. फिल्म को पाकिस्तान में जितना पसंद किया गया, उससे साफ है कि पाकिस्तान को बॉलीवुड फिल्मों का कितना इंतजार रहता है. लेकिन ये खुशी ज्यादा दिन नहीं टिक सकी.

सेंसर बोर्ड के फरमान उनके इंतजार पर पानी फेर रहे 

पिछले साल ही पाकिस्तान के सेंसर बोर्ड ने आमिर खान की फिल्म दंगल के कुछ सीन हटाने को कहा था. इसमें एक सीन वो भी था जब भारत का तिरंगा लहरा रहा था और राष्ट्रगान बज रहा था.

इससे ही जाहिर है कि फैंटम (2016) और नाम शबाना फिल्मों से पाकिस्तान के सेंसर बोर्ड को किस कदर ऐतराज रहा होगा. दोनों ही फिल्मों में दिखाया गया है कि पाकिस्तान का निजाम आतंकवाद को बढ़ावा देता है.

लेकिन दंगल और भाग मिल्खा भाग जैसी फिल्मों के सीन पर ऐतराज जताना हास्यास्पद लगता है. 'भाग मिल्खा भाग' में मिल्खा सिंह का अपने पाकिस्तानी प्रतिद्वंदी अब्दुल खालिक को पीटना, पाकिस्तान के सेंसर बोर्ड को नहीं पचा. वो इस सच्ची घटना पर भी पर्दा डालना चाहते थे.

पिछले साल की दो घटनाओं का जिक्र

Kabir Khan

पिछले साल अप्रैल में जब फिल्मकार कबीर खान पाकिस्तान गए तो एयरपोर्ट पर उनके साथ बदसलूकी की. पाकिस्तान के वो लोग कबीर खान के फैंटम जैसी फिल्म बनाने से नाराज थे.

जबकि इससे कुछ महीनों पहले ही कबीर खान की फिल्म बजरंगी भाईजान को देखकर यही पाकिस्तानी उन्हें मोहब्बत का मसीहा बता रहे थे. लेकिन जब उन्हेंने 26/11 के हमले की साजिश करने वालों को सबक सिखाने की काल्पनिक कहानी पर फिल्म बनाई, तो पाकिस्तान के लोग उनसे नाराज हो गए.

फैंटम फिल्म पर पाबंदी लगा दी गई. यहा तक कि लश्कर ए तैयबा के प्रमुख हाफिज सईद ने इस फिल्म पर रोक लगाने की कोर्ट में अर्जी भी दे डाली. उसने इस फिल्म को पाकिस्तान के खिलाफ दुष्प्रचार बताया.

यहां जब फिल्में सच्ची घटनाओं को ध्यान में रखकर बनती हैं, तो अक्सर पाकिस्तान को उससे ऐतराज हो जाता है. हमें पाकिस्तान के सेंसर बोर्ड के ऐतराज से ज्यादा बॉलीवुड के नजरिए पर गौर करने की जरूरत है.

फिल्म फैंटम की रिलीज से पहले प्रेस कांफ्रेंस में कबीर खान लगातार सफाई देते रहे कि उनकी फिल्म पाकिस्तान विरोधी नहीं है. उन्होंने पत्रकारों पर इल्जाम लगाया कि वो हर पाकिस्तानी को आतंकवादी समझते हैं.

कबीर खान का ये नजरिया उनके पाकिस्तान दौरे से पहले का था. जब वो पाकिस्तान गए और उन्हें बदसलूकी का सामना करना पड़ा. इसके बाद उन्होंने कहा कि अब वो कभी पाकिस्तान नहीं जाएंगे क्योंकि उनकी पत्नी ने उन्हें ऐसा करने को कहा है.

उरी के आतंकी हमले के बाद बॉलीवुड में बहुत से लोगों ने पाकिस्तानी कलाकारों के समर्थन में आवाज उठाई. इन लोगों ने कहा कि पाकिस्तानी कलाकारों को भारत में काम करते रहना चाहिए. ये वही बॉलीवुड था जो हर मसले पर बंटा नजर आता है.

मगर पाकिस्तान के कलाकारों के लिए सब एकजुट हो गए. वैसे तो ये कलाकार और फिल्मकार एक दूसरे को तंग करते रहते हैं. लेकिन जैसे ही पाकिस्तानी कलाकारों का विरोध होता है, तो सभी एक सुर से उनका समर्थन करते हैं, फिल्मों में लगे लाखों-करोड़ों रुपयों का हवाला देते हैं.

दोनों देशों की राजनीति के सिर चढ़ जाती हैं बॉलीवुड फिल्में 

पाकिस्तान ने कुलभूषण जाधव को फांसी की सजा सुनाई है. जोकि भारतीय नौसेना के पूर्व अफसर हैं. उन पर जासूसी का इल्जाम है. लेकिन भारत का कहना है कि जाधव को ईरान से अगवा करके पाकिस्तान लाया गया था. इसी से साफ है कि पाकिस्तान का भारत और भारत के लोगों के बारे में क्या नजरिया है.

अभी पिछले साल दिसंबर में ही पाकिस्तान के पीएम के विदेशी मामलों के सलाहकार सरताज अजीज ने कहा था कि जाधव के खिलाफ ठोस सबूत नहीं हैं. फिर भी पाकिस्तान की मिलिट्री कोर्ट ने जाधव को फटाफट मुकदमा चलाकर फांसी की सजा सुना दी.

हाल ही मे निजामुद्दीन की दरगाह के खादिम जब लापता हो गए थे, तो पाकिस्तान ने भारत सरकार की तमाम अपीलों को अनसुना कर दिया था.

साफ है कि पाकिस्तान का अपना अलग ही मिजाज है. हर तल्ख सच्चाई को पाकिस्तान में बैन कर दिया जाता है. ऐसे में बॉलीवुड को कोई उम्मीद नहीं पालनी चाहिए.

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