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सुरों में छलकते समाज के मुद्दे

सुरों से सामजिक मसले साधने की कोशिश में लगे रहते हैं हमारे संगीतकार

Hemant R Sharma Hemant R Sharma Updated On: Jan 29, 2017 12:11 PM IST

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सुरों में छलकते समाज के मुद्दे

कला के क्षेत्र में संगीत की संवेदना सबसे ज्यादा संजीदा होती है. यही वजह है कि सामाजिक मसलों को लेकर संगीतकार पहले से ही मुखर रहे हैं. आज भी ये परम्परा बदस्तूर जारी है.

मौजूदा समय में भी कई संगीतकार 'वुमन एमपॉवरमेंट, सुरक्षा, धारा 377, लिंगभेद और यौन उत्पीडन' जैसे मुद्दों पर ना केवल खुलकर बोल रहे हैं,  बल्कि अपने संगीत के माध्यम से भी ऐसे मसलों के प्रति अपना रोष जाहिर कर रहे हैं.

कला को सामजिक सरोकारों से जोड़ने का इनका ये प्रयास रंग भी ला रहा है और जनता में इनका सन्देश भी काफी प्रभावशाली तरीके से पहुँच रहा है. आइये बात करते हैं उन कलाकारों की जो सुरों से सामाजिक मसलों को साधने की कोशिशों में जुटे हुए हैं.

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ए आर रहमान : 2014 में ए आर रहमान ने अपने अल्बम "रौनक' के जरिये 'वुमन एम्पॉवरमेंट' के मुद्दे को काफी संजीदगी से देश के सामने रखा. इस अल्बम के टाइटल ट्रैक 'लाडली' में रहमान के साथ लता मंगेशकर ने सुर से सुर मिलाते हुए अपनी सामाजिक जवाबदेही को अभिव्यक्ति दी. कपिल सिब्बल द्वारा लिखे गए गीतों में रहमान ने जैसे संगीत की सारी करुणा को उड़ेल दिया. रहमान का ये क्रिएशन इस दिशा में आज भी काफी अहम स्थान रखता है.

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शालमली खोलगड़े: बॉलीवुड में कई पॉपुलर ट्रैक के जरिये मजबूत जगह बना चुकी शाल्मली ने अपने अल्बम 'आय' से लिंगभेद के मुद्दे को काफी मुखरता से पेश किया. इस अलबम की खासियत ये है कि इसमें महिला या पुरुष को एक-दूसरे से बेहतर बताने के बजाय दोनों की समानता की बात की गयी है. इसी अलबम में सोना महापात्रा ने अपने एक गाने से लोगों को क्लेफ्ट डिफॉर्मेटिव जैसे रोग के प्रति जागरूकता पैदा करने की कोशिश की ताकि इससे पीड़ित लोग सामान्य जीवन जी सकें.

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अनुष्का शंकर: सीरिया संकट के लिए कलंक बन चुके एलेन कुर्दी की मौत से उपजी वैश्विक करुणा को अनुष्का ने अपने अलबम "लैंड ऑफ गॉड' से नयी धार दे दी. इस मासूम बच्चे की बलि के बाद पूरी दुनिया को सीरिया के रिफ्यूजियों का दर्द समझ में आया. अनुष्का ने अपने अलबम से पूरी मानवता को ही झकझोर डाला. इससे पहले साल 2013 में भी अनुष्का अपने अलबम "ट्रेसेज ऑफ़ गॉड ' से दिल्ली गैंग रैप ' के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद कर चुकी है.

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सलीम-सुलेमान : 'खिलापन के जरिए सलीम-सुलेमान ने पेशावर हमले में मारे गए बच्चों को लेकर अपना आक्रोश जाहिर किया. इस अल्बम में बच्चों के प्रति क्रूरता और सीरिया,यमन वॉर के प्रति भी संगीतकार की चिंता साफ़ जाहिर होती है.

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विशाल डडलानी : सामजिक मसलों को लेकर काफी मुखर रहने वाले विशाल डडलानी ने सलीम-सुलेमान के साथ मिलकर आतंकवादी कार्रवाइयों में मारे गए बच्चों को लेकर अपनी संवेदना  'ब्रोकन वर्ल्ड' अल्बम से जाहिर की.

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शंकर-एहसान-लॉय : चाइल्ड एजुकेशन जैसे मुद्दों को शंकर-एहसान-लॉय की तिकड़ी ने अपने अलबम 'डिंग डिंग डिंगा' में पेश करते हुए बच्चों की शिक्षा को एक नारे का रूप दे दिया. इस अल्बम का गाना ' आ स्कूल चलें हम' को नेशनल एजुकेशन एंथम जैसा  दर्जा हासिल है.

इनके अलावा सुनिधि चौहान ने 'बेटियां'से भ्रूण ह्त्या और सोनू निगम ने 'होप इन द फ्यूचर' से कुपोषण जैसी सामजिक बीमारी को प्राभावी तरीके से रेखांकित किया.

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