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Review : तुम्बाड की दुनिया बेहद अनोखी और डरावनी दुनिया है, एक बार सैर कर के आइये

तुम्बाड की सबसे बड़ी खासियत यही है की इस फिल्म के लिए आपको कोई रेफरेंस नहीं मिलेगा. फिल्मों की दुनिया से हटकर आपको किताबों की दुनिया में जाना पड़ेगा

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Updated On: Oct 11, 2018 07:01 PM IST

Abhishek Srivastava

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Review : तुम्बाड की दुनिया बेहद अनोखी और डरावनी दुनिया है, एक बार सैर कर के आइये
निर्देशक: राही अनिल बर्वे
कलाकार: सोहम शाह, ज्योति मालशे, रोंजिनी चक्रवर्ती

तुम्बाड की सबसे बड़ी खासियत यही है की इस फिल्म के लिए आपको कोई रेफरेंस नहीं मिलेगा. फिल्मों की दुनिया से हटकर आपको किताबों की दुनिया में जाना पड़ेगा. अगर आपने बचपन में विक्रम बेताल या सिंहासन बत्तीसी या फिर चंदामामा की कहानियां पढ़ी है तो आप शुरू में ही समझ जायेंगे की तुम्बाड की दुनिया कुछ वैसी ही है. तुम्बाड गांधी जी के उस कथन को अपनी कहानी से सार्थक करती है की दुनिया में लोगो की जरुरत के लिए बहुत कुछ है लेकिन उनकी लालच के लिए चीजें कम है. तुम्बाड को देखने के बाद बेहद आश्चर्य होता है की बॉलीवुड ने इसके पहले इस तरह की कोई फिल्म क्यों नहीं बनाई. तुम्बाड की जितनी तारीफ की जाए कम है. लेकिन ये भी सच है की फिल्म को लेकर लोगो की राय विभाजित होगी. अगर कुछ लोग इसको पसंद करेंगे तो शायद उतने ही लोग इसे पचा ना पाए. इसकी वजह यही होगी की सब कुछ इसमें नया है और अगर लोगो को कुछ नया परोसा जाता है तो उसके हाजमे मे उन्हो समय लगता है.

कहानी एक गांव की है जिसके सोने की खजाने की वजह से एक परिवार बिखर जाता है

तुम्बाड की कहानी सन 1919 के भारत की है जो वो अंग्रेजों के अधीन था. फिल्म के केंद्र बिंदु में महाराष्ट्र का एक गांव है जिसका नाम है तुम्बाड. उसी गांव में विनायक अपनी माँ के साथ रहता है. बचपन के दौरान विनायक ने अपनी माँ का स्वर्ण मुद्रा के प्रति उसका प्रेम देखा था. उसकी यही चाहती थी की उसे एक स्वर्ण मुद्रा मिल जाए. लेकिन विनायक इसके बिलकुल उलट है उसे ढेरों स्वर्ण मुद्रा की चाहत है. पास के वाड़े में जहां पर उसकी माँ काम किया करती थी, उसके बारे में विनायक ने सुन रखा है की वह पर कई स्वर्ण मुद्राये है. जैसे जैसे उसकी उम्र बढ़ती है उसकी लालसा स्वर्ण मुद्राओ के प्रति बढ़ती जाती है. जब विनायक अपने बेटे को स्वर्ण मुद्रा पाने की जुगत बताता है तब उसे पता चलता है की उसका बेटा उससे एक कदम आगे है. अंत में लालच बुरी बला होती है - ये कहावत सिद्ध होती है.

तुम्बाड की दुनिया मे डर, ड्रामा, थ्रिल सभी कुछ है

फिल्म देखते वक्त आपको जिंदगी से जुड़े हुए कई मेटाफर आपको इसमे दिखाई देंगे. इस फिल्म में गर्भ की बात की गई है जहां से कई चीज़ो की उत्पत्ति होती है. इसका रेफरेंस आपको फिल्म में कई बार नजर आयेगा. फिल्म का क्लाइमेक्स भी वही पर होता है. महाराष्ट्र का एक सुदूर गांव जहां पर हमेशा बारिश होती रहती है और माहौल मे डर रहता है - इसको फिल्म से सिनेमोटोग्राफर पंकज कुमार ने जिस शानदार तरीके से अपने कैमरे में कैद किया है वो हर तरह से लाजवाब है. निर्देशक राही अनिल बर्वे ने जिस तरह का गांव का माहौल अपनी फिल्म में क्रिएट किया है वो काफी सालों के बाद देखने को मिला है. तुम्बाड की दुनिया एक बेहद ही अनोखी और शानदार दुनिया है जहां पर आपको फिल्म देखते वक़्त लगेगा की आप वही पर कोने में खड़े है और सब कुछ आपके सामने हो रहा है. तुम्बाड में सभी कुछ का समावेश है. इसको देखकर आपको डर लगेगा, थ्रिल का भी मजा मिलेगा और साथ ही साथ ड्रामा और फंतासी भी. अगर आपने मशहूर फिल्मकार गुलिरमो देल टोरो की फिल्में देखी है तब शायद आपको इस फिल्म का जॉनर पता चल जायेगा.

सही मायनो मे इस फिल्म का स्तर काफी अंतरराष्ट्रीय है

फिल्म की शुरुआत में जिस तरह का माहौल फिल्म में बनाया गया है वो अपने आप में काफी अनूठा और डरने वाला है. लगातार बारिश, लॉन्ग शॉट्स, लाइटिंग का सही तरीके से इस्तेमाल - ये सभी फिल्म के लिए एक अलग तरह का वातावरण बनाते है. बहुत लोगो को इस बात की जानकारी नहीं होगी की इस फिल्म को बनाने में लगभग ६ साल का वक़्त लगा था. जब मैंने यही बात फिल्म के अभिनेता और निर्माता से पूछा था तो उन्होंने यही कहा था की इस फिल्म को बनाने में उतना ही वक्त लगा है जितना लगना चाहिए और उनके इस कथन से मैं पूरी तरह से सहमत हुं. सोहम शाह ने लगता है की इस रोल के लिए अपना सब कुछ झोंक दिया है. सिनेमा हाल से बाहर निकल कर विनायक के रोल में आप सोहम के अलावा और किसी को सोच नहीं सकते है. एक ऐसे इंसान की भूमिका जिसके अंदर लालच कूटकूट कर भरी है लेकिन उसकी ये लालच उसकी आने वाली पीढ़ी को लील जाती है, के रोल में पूरी तरह से जान डाल दी है. उनके किरदार में जो ट्रांसफॉर्मेशन नज़र आता है उसमे काफी संजीदगी झलकती है.

इस बात में कोई शक नहीं है तुम्बाड की सिनेमा और इसकी प्रोडक्शन क्वालिटी ग्राह्य वर्ल्ड क्लास है. जिस तरह के ताले फिल्म में इस्तेमाल किये गए है उनको देखकर पता चल जाता है की इस पर कितने गहन तरीके से काम किया गया है. अपनी फिल्म के बारे में अक्सर निर्माता यह कहते हुए पाए जाते है की उनकी फिल्म काफी अलग है. तुम्बाड के बारे में मैं इस बात को मानूँगा. इस फिल्म को आप एक बार जरूर आजमाइए. ये फिल्म आपको एक अलग दुनिया के दीदार करवाएगी और हां इसकी तुलना एक आम बालीवुड कमर्शियल फिल्म से मत किजियेगा.

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