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Review: 'मॉनसून शूटआउट' की जगह फिल्म स्कूल की लाईब्रेरी में होनी चाहिए

अगर आपका उद्देश्य मनोरंजन है तो शायद आपके हाथ निराशा लगेगी. ये बेहद ही अलग तरीके की फिल्म है जिसके खरीदार आम जनता के बदले खास जनता होगी

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Updated On: Dec 15, 2017 03:49 PM IST

Abhishek Srivastava

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Review: 'मॉनसून शूटआउट' की जगह फिल्म स्कूल की लाईब्रेरी में होनी चाहिए

कलाकार - विजय वर्मा, नवाजुद्दीन सिद्दिकी, नीरज काबि, तनिष्ठा चटर्जी

सितारे - ढाई

पुणे के एफ़टीआईआई कैंपस में अपनी फ़िल्मी गुर सीखने वाले अमित कुमार की पहली फिल्म मॉनसून शूटआउट की सबसे बड़ी खामी यही है कि अपनी कहानी को कहने के लिए इन्होंने स्टाईल का ज्यादा सहारा लिया है वनिस्पत कंटेंट के. मुंबई की गन्दी और अंधेरी गलियों में इस फिल्म कहानी आगे बढ़ती है. शुरुआत का बिल्ड-अप तो बड़े ही शानदार ढंग से होता है लेकिन आगे चलकर इसकी चाल कहीं न कहीं ठहर जाती है. मॉनसून शूटआउट हिंदी फिल्म के दर्शकों के लिए एक अलग अनुभव होगा. लेकिन हकीकत यही है कि यहाँ पर अनुभव का मतलब सुहाना नहीं है.

मॉनसून शूटआउट की कहानी एक नए पुलिस अफसर की है जो मुंबई की पुलिस डिपार्टमेंट में हाल ही में शामिल हुआ है लेकिन उसे अपने पहले ही काम में इस दुविधा से दो चार होना पड़ता है कि वो हत्या के एक आरोपी पर गोली चलाए या नहीं. कहानी आदि (विजय वर्मा) के बारे में है जिसने मुंबई की पुलिस फोर्स कुछ दिनों पहले ही ज्वाईन किया है लेकिन जब उसका सामना एक हत्या के आरोपी शिवा (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) से होता है तो उसे महज चंद पलों में इस बात का फैसला लेना है कि उसके ऊपर उसे अपनी बन्दूक से गोली चलानी है या नहीं. वो इस दुविधा में है कि वो सही रास्ते पर जाए या गलत रास्ते पर लेकिन जब उसका सामना सच्चाई से होता है तो उसे इस बात का एहसास होता है कि जिंदगी किसी को भी इस बात का मौका नहीं देती है कि उसके किए पर उसे सोचने का मौका मिला. जिंदगी में समझौते की कितनी अहम भूमिका होती है, ये बात भी इस कहानी से निकलकर सामने आती है.

अगर पेपर पर इस फिल्म की कहानी के बारे में बात की जाए तो कोई भी यही कहेगा कि आइडिया बेहद ही जबरदस्त है लेकिन कहीं न कहीं सेल्यूलाईड पर जब इस फिल्म को उतारने की बारी आती है तब उसी खांके को फिल्म के निर्देशक खींचने में कामयाब नहीं रहे हैं. उसी हादसे के तीन अलग-अलग वर्जन से सिने दर्शक जब दो-चार होते हैं तो वो एक तरह से बोर ही करता है. फिल्म के सभी सितारे उसी हादसे को तीन ढंग से जीते हैं. ये सिनेमा की बड़ी ही मूल सीख है कि कहानी एक हो और क्लाइमैक्स भी उसका एक ही हो. अगर उसी के तीन अलग-अलग वर्जन देखने को मिलेंगे तो फिर वो एक फिल्म न होकर एक रिसर्च स्टडी हो जाता है और मनोरंजन कहीं पीछे छूट जाता है.

अगर अभिनय की बात करें तो पुलिस अफ़सर के रोल में विजय वर्मा ने सधा हुआ अभिनय किया है. इसके पहले हम उनकी प्रतिभा के दर्शन शूजित सरकार की फिल्म पिंक में देख चुके हैं लेकिन इस फिल्म में उनको लीड करने का मौका मिला है और इस मौके को उन्होंने हाथ से जाने नहीं दिया है. गैंगस्टर के रोल में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने भी वही किया जिसकी उम्मीद उनसे हमेशा रहती है. बेहद डरावने और निर्मम आरोपी हत्यारे के रोल मे उन्होंने जान डाल दी है. इस फिल्म में नीरज काबि और तनिष्ठा चटर्जी भी हैं और उन्होंने भी अपने रोल में पूरी ईमानदारी बरती है लेकिन अमित कुमार का अजीबो गरीब निर्देशन कहीं न कहीं उनके काम के ऊपर फिल्म में हावी हो जाता है और परेशानी वहीं से शुरु हो जाती है. तीन वर्जन होने की वजह से भी फिल्म के सितारे फिल्म के अंदर पूरी तरह से घुस पाने में कामयाब नहीं हो पाते हैं.

अगर फिल्म के सिनेमैटोग्राफर को शानदार कैमरा वर्क के लिए पूरे नंबर मिलने चाहिए तो वहीं दूसरी तरफ इस फिल्म की एडिटिंग इसका पूरा मजा किरकिरा कर देती है. देखकर थोड़ा आश्चर्य होता है कि ये वही अमित कुमार हैं जिन्होंने नवाजुद्दीन और इरफ़ान खान के साथ एक शानदार शॉर्ट फिल्म बनाई थी. अमित कुमार की मॉनसून शूटआउट एक एक्सपेरिमेंटल फिल्म है जिसकी जगह फिल्म स्कूल के करिकुलम में आगे चलकर बन जाएगी लेकिन अगर आपका उद्देश्य मनोरंजन है तो शायद आपके हाथ निराशा लगेगी. ये बेहद ही अलग तरीके की फिल्म है जिसके खरीदार आम जनता के बदले खास जनता होगी.

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