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कुंग फू योगा मूवी रिव्यू: अधकचरे खाने की भद्दी सजावट है ये फिल्म

कहानी प्राचीन मगध साम्राज्य और एक खोए हुए खजाने की खोज की है.

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Anna MM Vetticad Updated On: Feb 03, 2017 03:11 PM IST

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कुंग फू योगा मूवी रिव्यू: अधकचरे खाने की भद्दी सजावट है ये फिल्म
निर्देशक: Stanley Tong
कलाकार: Jackie Chan, Sonu Sood, Disha Patni, Amyra Dastur

कुंग फू योगा मार्शल आर्ट के सुपर स्टार जैकी चैन, भारत के बॉडी बिल्डर एक्टर सोनू सूद की फिल्म है. इसकी कहानी प्राचीन मगध साम्राज्य और एक खोए हुए खजाने की खोज की है. इसमें जैकी चैन ने जैक नाम का किरदार निभाया है. जैक चीन के रहने वाले एक कुंग फू एक्सपर्ट हैं और साथ में उन्हें आर्कियोलॉजी यानी पुरातात्विक चीजों में भी काफी दिलचस्पी है.

जैक भारत आते हैं और यहां की युवा प्रोफेसर दिशा पटानी और उनकी सहायक अमायरा दस्तूर के साथ खोए हुए खजाने की तलाश करते हैं. उनकी तलाश के अभियान में विलेन का रोल निभाया है, किराए पर कत्ल करने वाले रैंडाल यानी सोनू सूद ने. रैंडाल खजाने के असली मालिकों का वंशज है.

जब आप ऐसी एक्शन फिल्में बनाते हैं जिसमें किसी खजाने की तलाश भी शामिल हो, तो आपके अंदर इसे कामयाब बनाने के लिए जबरदस्त काबिलियत होनी चाहिए. क्योंकि आप एक पौराणिक कहानी, मार्शल आर्ट, हंसी-मजाक और आधुनिक दौर के चलन का कॉकटेल तैयार कर रहे होते हैं. इसमें सबसे बड़ा खतरा आपकी बेवकूफी जाहिर होने का होता है.

कुंग फू योगा नाम क्यों?

फिल्म कुंग फू योगा के लेखक-निर्देशक स्टैनले टॉन्ग जैकी चैन के साथ पुलिस स्टोरी सीरीज की दो फिल्में और रंबल इन द ब्रॉन्क्स जैसी कामयाब फिल्में बना चुके हैं. लेकिन कुंग फू योगा में वो कायमाबी का फॉर्मूला दोहराने में बुरी तरह नाकाम दिखते हैं.

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पहला सवाल तो ये है कि फिल्म का नाम 'कुंग फू योगा' क्यों है? ऐसा नहीं है कि फिल्म में कुंग फू और योगा के ढेर सारे सीन है. फिल्म में कुंग फू के तो तमाम सीन हैं. मगर योगा न के बराबर है. शायद फिल्म का ये नाम इसलिए रखा गया क्योंकि कुंग फू का नाम चीन से जुड़ा है और योग से भारत की पहचान बनती है. शायद स्टैनले अपनी अगली फिल्म का नाम 'पांडा महाराजा' या 'करी नूडल' रख लें. क्योंकि इन नामों से भारत और चीन दोनों की नजदीकी जाहिर होगी. जाहिर है फिल्म का नाम तय करने में जरा भी मेहनत नहीं की गई है.

हॉलीवुड फिल्मों में एशियाई किरदारों को एक ही चश्मे से देखा गया है. हमेशा स्टीरियोटाइप रोल, सीन और कहानियां एशिया के बारे में दिखाई गई हैं. ऐसा करने पर हम हॉलीवुड के निर्माता-निर्देशकों को बुरा-भला कहते रहे हैं. पर अब क्या करें जब हमारे अपने बीच का एक निर्देशक ऐसा करे तो? स्टैनले टॉन्ग, हांगकांग के रहने वाले हैं. उनसे तो उम्मीद थी कि वो एशियाई किरदारों को उनके असली रंग-रूप में पेश करेंगे. मगर उन्होंने भी लकीर के फकीर वाला आसान रास्ता ही चुना है.

कब बदलेगी नजर?

फिल्म में स्टीरियोटाइप सीन की भरमार है. अब जैसे रैंडाल एक भारतीय किरदार है तो उसके घर में शेर घूमते नजर आते हैं. जैक जब रैंडाल के घर से एक गाड़ी चुराता है तो गाड़ी में उसे एक शेर बैठा मिल जाता है. और ये सब दुबई के बेहद आधुनिक होटल में हो रहा है.

अब दुबई की बात हो रही है, तो ऊंटों की रेस दिखानी भी जरूरी है. आखिर हम शेखों को इसी तरह से तो देखते आए हैं. अफसोस की बात कि दौड़ते हुए ऊंटों के मुंह से निकलता झाग देखकर आपको उनके ऊपर दया आती है.

किसी आम भारतीय बाजार में संपेरों की भरमार है. फिल्म में भारतीय बाजार के सीन में एक नट रस्सी पर कलाबाजी दिखा रहा हो, ये सीन डालना भी स्टैनले के स्टीरियोटाइप का हिस्सा है.

भारत की बात हो रही है तो रहस्यमयी संन्यासी, आग खाने वाले आदिवासी दिखाने भी जरूरी हैं. समझ नहीं आता कि जनपथ या सरोजिनी नगर के बाजार में स्टैनले को ये किरदार कहां से मिल गए? आखिर वो दिखाना क्या चाहते हैं? शायद स्टैनले को लगता है कि ऐसे बाजार ही भारत की असली तस्वीर पेश करते हैं. यहां वो पूरी तरह से लकीर के फकीर बन गए हैं.

एक बात है. एक कचरा फिल्म लिखना और उसका निर्देशन करना आसान काम नहीं. फिर आपके सामने चुनौती बुद्धिमान दर्शक को हंसाने की होती है. मुझे लगता है कि डेविड धवन और रोहित शेट्टी की एक्शन-कॉमेडी फिल्मों के मुकाबले, कुंग फू योगा एकदम कचरा फिल्म है.

हां, फिल्म में चीन के सीन और कुंग फू के सीन ही नेचुरल लगे हैं. हालांकि कुंग फू के सीन और बेहतर किए जा सकते थे.

जहां तक सोनू सूद की बात है कि वह एक्शन रोल में भी फिट बैठ जाते हैं. भले ही उस रोल में कोई दम न हो. हम दबंग और जोधा अकबर फिल्मों में उन्हें ऐसा करते देख चुके हैं. हालांकि कुंग फू योगा में उनके एक्शन सीन असर डालने में बुरी तरह नाकाम साबित होते हैं.

फिल्म में दिशा पटानी और अमायरा दस्तूर के रोल भी असरदार नहीं हैं. वैसे भी उनके किरदार साइड रोल वाले ही हैं. हां, दोनों ही ने एक्शन सीन अच्छे किए हैं. बॉलीवुड के निर्देशकों को उनकी इस खूबी के हिसाब से कुछ रोल देने चाहिए.

न एक्शन दमदार, न कॉमेडी

कुंग फू योगा के कुछ सीन में हंसी आने के सिवा कुछ खास नहीं. खास तौर से वो सीन जिसमें रैंडाल के घर में भूखे भेड़ियों से बच के निकलने की कोशिश होती है, वो मजेदार है.

ऐसी फिल्में मजाक का विषय इसीलिए बनती हैं कि इन्हें बिना दिमाग लगाए बनाया जाता है. अधकचरे खाने की भद्दे तरीके से सजावट की ये फिल्म बेहतरीन मिसाल है.

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फिल्म के आखिर में बॉलीवुड की तरह का गाने वाला सीन डालकर, टॉन्ग ने बॉलीवुड को सलाम करने की कोशिश की है. ये कोशिश भी अधकचरी लगती है. शायद स्टैनले को नहीं पता कि बॉलीवुड के निर्देशक इससे आगे निकल चुके हैं. अब देखिए न, फिल्म के एक सीन में कलाकार, भगवान शिव की मूर्ति के सामने, बात कर रहे हैं, लड़ाई कर रहे हैं और अचानक वो नाचना-गाना शुरू कर देते हैं.

अगर आप देखना चाहते हैं कि किसी विदेशी फिल्म ने हिंदी फिल्मों के सीन को बेहतरीन ढंग से पेश किया है तो आपको जूलिया रॉबर्ट्स की 'मिरर-मिरर' देखनी चाहिए. इसका निर्देशक तरसेम सिंह ने किया था. इसके मुकाबले कुंग फू योगा की बॉलीवुड को सलामी बेहद भद्दी मालूम होती है. उसमें नाचते हुए सोनू सूद और भी अजीब नजर आते हैं.

फिर भी फिल्म का अंत उतना बुरा नहीं. इसकी सिनेमैटोग्राफी काफी अच्छी है. दिशा पाटनी ने अपना किरदार खूबसूरती से जिया है. और जैकी चैन खजाने की खोज में मस्त नजर आते हैं. हालांकि किसी को अगर जैकी चैन की पुरानी फिल्मों की याद ताजा करने के लिए ये फिल्म देखने जाना है, तो उसे इससे परहेज करना चाहिए.

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