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'करण, कंगना गलत क्यों हैं? आप भी तो विक्टिम कार्ड खेल चुके हैं'

एलजीबीटी समुदाय के लिए काम करने वाले हरीश अय्यर की करण जौहर को चिट्ठी.

Harish Iyer Updated On: Mar 10, 2017 07:40 AM IST

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'करण, कंगना गलत क्यों हैं? आप भी तो विक्टिम कार्ड खेल चुके हैं'

प्रिय करण जौहर,

ये पत्र आपको थोड़ा लंबा और थोड़ा खट्टा लग सकता है मगर उम्मीद है कि आप इसे जरूर पढ़ेंगे.

ये तो किसी से नहीं छुपा कि मैं आपको बहुत पसंद करता हूं. मैं हमेशा आपके लिए खड़ा हुआ हूं, जब भी आप सही थे. और आपके जिंदगी के फैसलों के लिए मैंने हमेशा आपका समर्थन किया है - चाहे वो आपका समलैंगिक के रूप में सामने आना हो और इस अधिकार को बिना किसी लंबे चौड़े स्पष्टीकरण के हासिल करना हो या फिर आपका सरोगेसी के माध्यम से दो बच्चों का अभिभावक बनना हो.

मैं हमेशा आपकी प्रशंसा करता हूं और आपको इसके लिए बहुत पसंद भी करता हूं. मैंने हमेशा आपके भीतर आपका असली चेहरा तलाश करने की कोशिश की है जो कि आप हैं. और आप ऊपर वाली अपनी दोनों परिस्थितियों में बहुत सुंदर नजर आए थे.

मैंने हमेशा आपकी तारीफ की है और माना है कि आप अपने लिए सच्चे हैं. इसी शैली में मुझे आपको यह बताना होगा कि दयालुता और सच्चाई को इस दुनिया में लेकर चलना बड़ा मुश्किल काम है, जहां कि आपसे अपना काम निकालने के लिए झूठ बोलने और नकली बनने की उम्मीद की जाती है. और ये एक सच्चे सितारे के लक्षण हैं.

कंगना राणावत भी ऐसी ही एक सितारा हैं. उनको 'शिकार कार्ड' खेलने की जरूरत नहीं है क्योंकि वो शिकार नहीं हैं. यदि आप तथ्यों की बात करते हैं और लोगों को उनकी कट्टरता का आइना दिखाते हैं, तो आप शिकार नहीं बनते हैं.

तब भी आप शिकार की भूमिका में नहीं होते जब आप कमजोर होकर भी लोगों की बेजा मांगों के सामने नहीं झुकते. कंगना के लिए माफी मांगने का कोई मौका अब तक आया नहीं है.

जब आप एक पाकिस्तानी अभिनेता को 'ऐ दिल है मुश्किल' में कास्टिंग करने पर माफी मांगने के लिए 'शिकार' बनाए गए थे, तो मैं आपके समर्थन में खड़ा हुआ था.

आप ही थे वो जो अयान मुखर्जी के साथ 'वेक अप सिड' बनाते समय इन्हीं राज ठाकरे के अच्छे-खासे शिकार बने थे जब उन्होंने 'बॉम्बे' शब्द इस्तेमाल करने पर आपको धमकी दी थी.

उस समय भी मैं आपके साथ खड़ा था जब लोगों ने आपके लिए कहा था कि 'दुनिया आपके कदमों में है और तकलीफों से आपका कोई लेना-देना नहीं है', जिसका लगभग ये मतलब था कि पैसेवालों और प्रसिद्ध लोगों में दिल नहीं होता.

करण जौहर, अगर आपने अपने शो का वो हिस्सा बचाकर रखा है जिसमें कंगना रानौत ने आपके खिलाफ बात की थी, तो उसमें कुछ गलत नहीं है, शालीन टॉक शो होस्ट ऐसा ही करते हैं.

इसलिए, मुझे आपकी प्रतिक्रियाएं नजर आईं- जिनमें किसी भी तरह की कोई सहानुभूति नहीं दिखी- और वो बहुत परेशान करने वाली भी थीं.

और हां, आपको 'माई नेम इज खान' तो याद होगी न? आपने किस तरह शिवसेना से माफी मांगी थी? खैर, वो फिल्म तो फ्लॉप थी. जो भी थोड़ा बहुत उसने कमाया, बस उसके विवाद की वजह से कमाया था. वो आपकी सबसे घटिया फिल्मों में से एक थी.

मैं सिनेमाई गपशप की सीधी खबर के एक अंदर वाले दर्शक के तौर आपको बता सकता हूं कि बहुत से लोग सोच रहे होंगे कि ये आपकी फिल्मों के प्रमोशन का एक स्टंट है. इसमें उनका कसूर नहीं है. ये एक परंपरा सी बन गई है.

और आपके पास पैसा होने और खानदानी सिनेमा के जीन के होने बावजूद भी पिछले कुछ सालों में आप बिना माफी मांगे कोई रणनीति बनाने में कामयाब नहीं हो पाए. शिकार होकर ऐसी उम्मीद करना तो लाजमी है. मुझे आपसे सहानुभूति है.

मैं आपकी कमजोरी का समर्थन करता हूं जहां कि आपने अपनी लैंगिकता के शाश्वत सत्य को दुनिया को नहीं समझाने का फैसला लिया. जब एलजीबीटी की दुनिया में लगभग सभी आपके खिलाफ हो गए थे, तब मैंने अपनी तरह से बात रखने के आपके अधिकार की रक्षा की थी. चूंकि आपने ही शिकार होने की परिभाषा वाली ये बात उठाई है, मैं तो आपके डर के अधिकार के समर्थन में भी आपके साथ खड़ा हूं.

मैं कंगना की बहादुरी का समर्थन करता हूं.

एक बाहरी होते हुए भी वो सिनेमा के खानदानी और बड़े लोगों के खिलाफ खड़ी हुई थीं. उन्होंने अपने काम से जुड़े बड़े बैनरों को खो देने का जोखिम उठाया था. उन्होंने 'सही बातों' के लिए हामी न भरकर बहुत कुछ खो भी दिया है. उन्होंने इस हालत का सामना किया. वो अपनी बात से पीछे नहीं हटीं.

जहां तक बात 'भाई-भतीजावाद' की है, सभी 'बाहरी लोग' आपके अंदर के लोगों में शामिल थे. वो सब आपके सहायक निर्देशक थे. जब बात अभिनेताओं की आती है, आपके पास एक कामयाब नाम है (जो 'बाहरी' है)- सिद्धार्थ मल्होत्रा और कौन?

सही है, ये आपका हक है कि जिसे चाहें आप अपनी फिल्म में रखें. आपके पास पैसा है, आपके पास हक है. फिल्म बनाना लोकतंत्र की तरह नहीं है. आपको अपनी तरह की फिल्म बनाने और अपनी तरह के कलाकारों को रखने का पूरा हक है.

तो भी आप अपनी टिप्पणियों को लेकर थोड़ा और मर्यादित हो सकते थे. आप हरियाणवी बोल कर क्यों नहीं दिखाते, जैसा वो बोलती हैं. या सिंधी बोलने की कोशिश क्यों नहीं करते जो कि आपकी अपनी ही भाषा है? और अब भाई-भतीजावाद की उनकी समझ की बात भी कर लेते हैं.

आप बताइए- कितने गैर-सिनेमाई ऊंचे लोग, क्षेत्रीय भाषाई, काले और जवान, सीने पर बिना परफ्यूम लगाए, बिना घमण्ड वाले लोगों को आपने अपनी फिल्मों में मौका दिया है? वे सभी एक निश्चित किस्म के नमूने हैं. बताइए क्या ऐसा नहीं है? क्या वाकई वे नहीं हैं?

और हां, करण, एक बार आप अपने गूगल सर्च बार पर 'भाई-भतीजावाद की परिभाषा' क्यों नहीं टाइप करते? तब आपको समझ आ जाएगा कि भाई-भतीजावाद की परिभाषा कहां तक जाती है. तब आपको पता चलेगा कि ये परिभाषा परिवार और खून के रिश्तेदारों से लेकर, दोस्तों का पक्ष लेने से लेकर और आगे परिचय क्षेत्र /कबीले/समुदाय के नमूनों तक बढ़ाई जा सकती है, जिसके आप हिमायती हैं.

आपने बताया कि आपने शो के उन सभी हिस्सों को सहेजकर रखा है जिनमें कंगना थीं. ऐसा लगा जैसे कि आपने उन पर एहसान किया हो. सही भी हैं शालीन टॉक शो होस्ट ऐसा ही करते हैं. बहुत अच्छा किया आपने टॉक शो होस्ट्स के आदर्शों की रक्षा की.

लेकिन ये जरा भी अच्छी बात नहीं है कि आप ऐसा जताएं जैसे आप कोई एहसान कर रहे हों. आपने ये भी बताया कि आप शो के दौरान अपने मेहमानों के सम्मान की निशानी के तौर पर खामोश होकर बैठ गए थे. ये झूठ है. आप खामोश इसलिए हुए कि आपकी बातों के जवाब में कंगना ने आपको लाजवाब कर दिया था.

आप बोल नहीं पाए क्योंकि वो आपके सामने तनकर बैठी हुई थीं और उनके चेहरे पर उसका गुमान नजर आ रहा था और आपका मजाक उन्हें हंसाने या प्रभावित करने में नाकाम रहा था.

एक उत्साही प्रशंसक के तौर पर उन्होंने आपके कार्यक्रम में हिस्सा लिया और साफ जाहिर कर दिया कि आपने उनकी अंग्रेजी का मजाक उड़ाया था. और जवाब में लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में आपने फिर वही बेवकूफी की, आपने उनकी अंग्रेजी का मजाक उड़ाया.

कंगना जो हैं, उसके लिए मैं उनका सम्मान करता हूं. आपको ये कहने की जरूरत नहीं है कि उन्होंने वुमन कार्ड खेला यानी कि महिला होने का फायदा उठाया. वुमन कार्ड क्या होता है?

लिंग एक जैविक घटना है, करण. अगर आपको पूरा यकीन है कि वो वुमन कार्ड खेल रहीं हैं तो कृपा कर हमें ये बताने की हिम्मत दिखाइए कि आप अपने अभिनेताओं को अपनी अभिनेत्रियों के मुकाबले में कितना पेमेंट करते हैं?

कंगना 100 प्रतिशत प्रामाणिक हैं. ये कबूल करना कि आपमें भी कहीं कमज़ोरियां हैं, सबसे बड़ी बहादुरी की बात है. ये सबसे बड़ी बहादुरी की बात है कि उन्होंने माना कि मुहब्बत में उनसे बेवकूफी हुई. यही वजह है कि कंगना वो हैं जो वो हैं. आप उनके सामने नहीं ठहरते. कोई भी नहीं ठहर सकता.

वो मिशेल ओबामा के एक उद्धरण की जिंदा मिसाल हैं - 'जब वे नीचे चले जाते हैं तो हम ऊपर हो जाते हैं'. आप अपनी सारी अक्ल लगाकर भी उनका सामना नहीं कर सकते. ना अपने शो पर, न ही यहां एलएसई पर!

कल आपको कोई देखने वाला नहीं था. लेकिन आज आपकी बेटी रूही देख रही है. जब आप ऐसी महिलाओं को धमकाते हैं जो किसी क्षेत्रीय भाषा में बात करती हैं, जो बड़े घरों से ताल्लुक नहीं रखती हैं, या जो समानता के लिए खड़ी होती हैं, तो अपने शब्दों पर गौर करिएगा. रूही भी ऐसे ही संघर्षों से होकर गुजरेगी.

करण, अभिभावकों से हमेशा ये उम्मीद होती है कि वे अपने बच्चों की उम्मीदों को पूरा करेंगे. कोई भी पिता कंगना की तरह के बच्चे का पालनपोषण करना पसंद करेगा. आशा है कि रूही भी बड़े होकर कंगना की तरह बनेगी और अपने पिता की लैंगिकता के अधिकार के लिए मुखर होकर संघर्ष करेगी.

उसकी प्रामाणिकता बिलकुल वैसी ही होगी जैसी कि कंगना की है, जो कि एक पूर्वाग्रह की शिकार दुनिया में अपने लिए जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रही है.

उम्मीद है कि आपके बच्चे, छोटी रूही और यश देखेंगे कि आप उन लोगों की सबसे अच्छी मिसाल हैं जो खुद अपने खिलाफ खड़े लोगों के साथ खड़े होते हैं, उन लोगों के साथ भी खड़े होते हैं जिनमें निडर होकर बिना माफी मांगे आपके घर आकर आपके मुंह पर बोलने की हिम्मत होती है क्योंकि आपको उनकी परवाह है और आपको आजादी के साथ बोलने वाले बहुत पसंद हैं !!

करण, मैं आपको बहुत पसंद करता हूं लेकिन इस मामले में मुझे आपसे कतई प्यार नहीं है. जहां मैं आपकी परवाह करता हूं, वहां मैं अभी भी आपकी परवाह करता हूं. लेकिन नहीं, मैंने आपको लेकर अपनी आंखें बंद नहीं की हैं.

आपका दोस्त,

हरीश अय्यर

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