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Famous Review: अच्छी नींद चाहिए तो चंबल की ये कहानी देख लीजिए

‘फेमस’ रुपये और समय की बर्बादी के अलावा और कुछ नहीं है

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Updated On: Jun 01, 2018 05:20 PM IST

Abhishek Srivastava

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Famous Review: अच्छी नींद चाहिए तो चंबल की ये कहानी देख लीजिए
निर्देशक: करन बुटानी
कलाकार: के के मेनन, जिमी शेरगिल, पंकज त्रिपाठी, जैकी श्रॉफ

 

फिल्म के निर्देशक करन बुटानी एक लम्बे अरसे तक फिल्म निर्देशक तिग्मांशु धूलिया के सहायक रह चुके हैं. जाहिर सी बात है उनकी फिल्मों पर अपने फिल्मी अध्यापक की फिल्मों का असर तो रहेगा ही. तिग्मांशु धूलिया के करियर में पान सिंह तोमर उनकी सबसे बेहतरीन फिल्म मानी जाती है. और कहना पड़ेगा कि शागिर्द ने अपनी प्रेरणा यहीं से उठाई है. बल्कि ये कहना ठीक होगा कि फिल्म के निर्देशक ने वाल्मिकी की बंदूक नाम से एक शार्ट फिल्म बनाई थी और फेमस एक तरह से उसका फिल्मी वर्जन है. चंबल की कहानी को आज के अंदाज में कहा है. लेकिन अफसोस इसी बात का है कि पान सिंह तोमर का अगर दस प्रतिशत कंटेंट भी इस फिल्म में होता तो ये बर्दाश्त करने लायक होती. ‘फेमस’ को देखते वक्त आपको नींद आएगी, आप कंफ्यूज होंगे और अपनी किस्मत पर रोएंगे कि मैंने इस फिल्म को देखने का चुनाव क्यों किया? फेमस की कहानी बुरी है, इस फिल्म से जुड़े सितारों का अभिनय औसत है, लेखन में कोई दम नहीं है और निर्देशन को देखकर लगता है कि करन को अभी बहुत कुछ सीखना है.

'फेमस' की कहानी चंबल के एक बाहुबली की है

कहानी चंबल की है जहां पर कड़क सिंह का राज है. कड़क सिंह चंबल इलाके का बाहुबली है और नेता उसकी जेब में रहते हैं. वहां की जनता के साथ कड़क अक्सर मनमानी करता है और एक भी विरोध का स्वर उसके खिलाफ नहीं उठता है. उठता भी है तो उसे दबा दिया जाता है. इसी कड़ी में शम्भू (जैकी श्रॉफ) की बेटी की शादी के दिन जब उसको कड़क सिंह (के के मेनन) उठा कर जबरन ले जाने की कोशिश करता है तब गोलीबारी में शम्भू की बेटी को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है. शम्भू इसके बाद कड़क सिंह से बदला लेने की कसम खाता है. इस बीच एक अलग ट्रैक राधे का फिल्म में चलता है. राधे (जिम्मी शेरगिल) अपनी स्कूल की टीचर रोजी (माही गिल) को बेहद पसंद करता है लेकिन जब वहां का सांसद रामविजय त्रिपाठी उसका बलात्कार करता है तो इसका गहरा सदमा राधे के ऊपर पड़ता है. इस बीच राधे कड़क सिंह द्वारा किये गए एक खून के मामले में गवाह भी बनता है लेकिन ऐन वक्त पर राधे उसको पहचानने से मुकर जाता है. आगे चलकर जब कड़क सिंह और रामविजय त्रिपाठी की मनमानी इलाके मे बढ़ जाती है और आगे चलकर उनकी हरकतें राधे के घर यानि कि उसकी बीवी तक पहुंच जाती है तब राधे बन्दूक उठा लेता है और बदले की इस मुहिम में उसको साथ मिलता है शम्भू की ओर से.

फेमस की कहानी पर कोई मेहनत नहीं की गई है

‘फेमस’ कई जगहों पर लड़खड़ाती है. सबसे बड़ी परेशानी है इसकी लिखावट से. जैकी श्रॉफ का किरदार जब अपनी ही बेटी को गलती से गोली मार देता है तो उसके बाद वो क्या करता है इसको बताने की जरुरत नहीं समझी है. सीधा उनको क्लाइमेक्स के दस मिनट पहले लाया जाता है. कुछ इसी तरह से जब कड़क सिंह और रामविजय त्रिपाठी की कहा सुनी हो जाती है तो उसके बाद उन दोनों के बीच में कैसे सुलह होती है इसको भी बताने की कोई जरुरत नहीं समझी गई है. झगड़े के बाद सीधे उन दोनों को कड़क सिंह के फार्म हाउस पर चिकन करी बनाते दिखाया गया है. राधे का किरदार पुलिस के सामने एक खूनी को पहचानने से क्यों इंकार कर देता है इसके भी पीछे की कहानी को बड़े ही सफाई से गायब कर दिया गया है. अब जब पूरी फिल्म में ही ढेर सारे गड्ढे आपको मिलेंगे तो आपके दिमाग की मोटर भला इस पर कैसे दौड़ेगी?

के के से लेकर जिम्मी सभी का फिल्म में औसत दर्जे का अभिनय है

अभिनय की बात करें तो सबसे बड़ा रोल फिल्म में के के का है लेकिन पूरी फिल्म में उनके तेवर कुछ अलग ही तरह के दिखाई देते हैं. कुछ भी सामान्य उनके किरदार में नहीं दिखाई देता है. वो किस तरह के चम्बल के बाहुबली हैं इस बात को भी बताने में ज्यादा मेहनत नहीं की गई है. राधे के रोल में जिमी शेरगिल ने अपना काम ठीक तरह से निभाया है. जैकी श्रॉफ का उतना बड़ा रोल नहीं है  जिसके बारे में कुछ लिखा जाए. अलबत्ता रामविजय त्रिपाठी सांसद की भूमिका में पंकज त्रिपाठी ही ऐसे हैं जो थोड़ी बहुत जान डाल पाए हैं. लेकिन हर सीन में उनके जिस्मानी भूख की बात करना कुछ समय के बाद बोर करने लगता है. श्रेया शरण और माही गिल फिल्म में हाशिये पर ही है और उनकी भूमिका में कोई दम नहीं है.

सशक्त कलाकारों के बावजूद इस फिल्म में कोई दम नहीं है

देखकर बेहद आचार्य होता है कि इस फिल्म में कुछ एक सशक्त कलाकारों का जमावड़ा है लेकिन इसके बावजूद निर्देशक महाशय उनसे ठीक तरह से काम नहीं निकाल पाए हैं. लेकिन इस कमी के लिए कलाकारों के मत्थे सारा दोष मढ़ देना भी ठीक नहीं होगा. अब जब फिल्म की लिखावट ही औसत दर्जे से नीचे की है तो अभिनेताओं की जमात भी भला क्या करे. इस फिल्म के बारे में ये कहना ठीक होगा कि किसी को कुछ पता नहीं था कि इस फिल्म के लिए उनको क्या करना है. ‘फेमस’ रुपये और समय की बर्बादी के अलावा और कुछ नहीं है. इस फिल्म से दूरी बनाये रखने में ही भलाई है.

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