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मूवी रिव्यूः काबिल हैं ऋतिक, बाकी सब नाकाबिल !

फिल्म काबिल अकेले ऋतिक की फिल्म है. उन्हें सहारा देने वाला यहां कोई नहीं है, वो अकेले पड़ गए हैं

Updated On: Jan 25, 2017 06:28 PM IST

Ravindra Choudhary

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मूवी रिव्यूः काबिल हैं ऋतिक, बाकी सब नाकाबिल !

‘काबिल’ और ‘रईस’ में जो सबसे बड़ा फर्क है, वो हैं नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी! ‘रईस’ का बोझ उठाने के लिये शाहरुख़ के साथ नवाज़ हैं, जबकि ऋतिक को सहारा देने वाला यहां कोई नहीं है, वो अकेले पड़ गए हैं.

‘रईस’ की तरह ‘काबिल’ भी पुराने फार्मूले वाली फिल्म है. पंद्रह-बीस साल पहले तक लगभग हर दूसरी फिल्म में हीरो की बीवी या बहन के साथ बलात्कार होता था. जिसके बाद हीरो भ्रष्ट नेताओं और पुलिस अफसरों को मारकर अपना बदला लेता था.

‘काबिल’ भी एक ऐसे ही बदले की कहानी है. फर्क बस ये है कि यहां बदला लेने वाला नायक दृष्टिहीन है. इस वजह से फिल्म का सारा दारोमदार इस बात पर टिका था कि वो बदला लेता कैसे है. लेकिन अफसोस! विजय कुमार मिश्रा और संजय मासूम की लिखी कहानी यहीं पर मार खा जाती है.

Kaabil Film

‘काबिल’ के मुख्य किरदार रोहन भटनागर (ऋतिक रोशन) और सुप्रिया शर्मा (यामी गौतम) दोनों दृष्टिहीन हैं. दोस्तों की मदद से वे मिलते हैं, झटपट प्यार हो जाता है और फटाफट शादी हो जाती है. शादी के कुछ दिन बाद ही इलाके का मवाली अमित (रोहित रॉय) और उसका दोस्त वसीम (शहीदुर रहमान) सुप्रिया के साथ रेप करते हैं. अमित का कॉरपोरेटर भाई माधव राव शेलार (रोनित रॉय) भ्रष्ट पुलिस अफसरों की मदद से दोनों को बचा लेता है. फिर रोहन इन सबको मारकर अपना बदला लेता है.

बदले के अलावा: ऋतिक की फिल्म हो और उसमें उनका डांस नंबर ना हो (चाहे वो दृष्टिहीन की भूमिका में ही क्यों ना हों) ऐसा हो नहीं सकता. काबिल में भी उनका एक डांस नंबर है, जिसमें वो बखूबी अपना हुनर दिखाते हैं. इसके अलावा, फिल्म में उर्वशी रौतेला पर फिल्माया गया ‘सारा जमाना हसीनों का दीवाना’ आइटम सॉन्ग भी है, जो शायद बॉलीवुड के इतिहास का शायद सबसे बुरा आइटम नंबर है.

पूरी फिल्म अकेले ऋतिक के कंधों पर टिकी है. उन्होंने अपनी तरफ से हर सीन में पूरा जोर लगाया है लेकिन कहानी और प्रस्तुतिकरण ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया है. यामी गौतम ज्यादा प्रभावित नहीं करतीं. विलेन के रोल में रोनित रॉय ठीक-ठाक हैं. भ्रष्ट पुलिस अफसरों के रोल में नरेंद्र झा और गिरीश कुलकर्णी (‘दंगल’ के विलेन कोच) एकदम फिट हैं.

कुल मिलाकर, कोरियन फिल्मों के मुरीद डायरेक्टर संजय गुप्ता की यह फिल्म भी उनकी पिछली फिल्मों की तरह है. यानि- ‘स्टाइल’ ज्यादा और ‘कहानी' कम! वो सौ दिन में चले सिर्फ ढाई कोस... इसलिये हमारी तरफ से उन्हें मिलते हैं ढाई स्टार !

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