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Film Review : यमला पगला दीवाना सीरिज पर फुल स्टॉप लगाने का वक्त आ गया है

इस फिल्म में धर्मेंद्र का अलावा कोई भी अपनी छाप छोड़ने में कामयाब नहीं हुआ है

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Updated On: Aug 31, 2018 06:58 PM IST

Abhishek Srivastava

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Film Review : यमला पगला दीवाना सीरिज पर फुल स्टॉप लगाने का वक्त आ गया है
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निर्देशक: नवनीयत सिंह
कलाकार: धर्मेंद्र, सनी देओल, बॉबी देओल, कृति खरबंदा

जब हमने पहली यमला पगला दीवाना देखी थी तब उस फिल्म में एक अलग चार्म नजर आया था. वो चार्म काफी हद तक दूसरे सीक्वल में खत्म हो गया था या बल्कि ये कह सकते हैं कि वो धूमिल हो गया था. इसके बाद यमला पगला दीवाना सीरिज की तीसरी फिल्म यमला पगला दीवाना फिर से का रूख किस ओर होगा इसका थोड़ा बहुत अंदाजा जब ट्रेलर आया था तब हो गया था.

फिल्म देखने के बाद ये शक यकीन में बदल जाता है की फिल्म के निर्माता को अब इस सीरिज पर फुल स्टॉप लगा देना चाहिए. बेहतर होगा की फिल्म से जुड़े लोग अब इस मुगालते में ना रहें कि तीनों देओल अगर एक फिल्म में साथ नजर आएंगे तो दर्शक उनको हाथों-हाथ ले लेंगे. कई हिट पंजाबी फिल्में बनाने वाले नवनीयत सिंह बॉलीवुड में इस फिल्म से पदार्पण हो रहा है लेकिन अपनी पहली फिल्म से वो दर्शकों को बांध कर नहीं रख पाएंगे.

दवा के पेटेंट की कहानी 

फिल्म की कहानी दो भाइयों की है - पूरन (सनी देओल) और काला (बॉबी देओल). जहां पूरन एक वैद्य है तो वहीं दूसरी तरफ काला 40 की दहलीज़ पार करने के बावजूद भी कुंवारा है और कनाडा जाने के सपने संजो कर बैठा है. पूरन अपने एक आयुर्वेदिक दवा वज्र कवच की वजह से आरोग्य की दुनिया में तहलका मचा देता है.

अपने इस रामबाण दवा से वो गरीबों का इलाज निशुल्क करता है. जब मारफतिया (मोहन कपूर) जो एक बड़े दवा कंपनी का मालिक है की नजर वज्र कवच पर पड़ती है तब उसके बाद उसकी यही कोशिश होती है कि वो कैसे भी उस दवा के फार्मूला को हथिया ले.

जब ईएनटी स्पेशलिस्ट चिक्कू पटेल पूरन के छोटे भाई काला को अपने प्रेम पाश में बांध लेती है तब मारफतिया वो फार्मूला हथियाने में कामयाब हो जाता है. इसके बाद मारफतिया उस दवा का पेटेंट लेने के बाद पूरन को नोटिस भेज देता है. धर्मेंद्र जो की पूरन और काला के घर में बतौर किरायेदार रहते हैं उन दोनों के लिए अदालत में वकील की हैसियत से उनका केस लड़ते हैं.

फिल्म में स्टीरियोटाइप्स की भरमार

यमला पगला दीवाना फिर से, देओल खानदान से जुड़ी सभी स्टीरियोटाइप्स को एक बार फिर से इंगित करती है. सनी देओल के भुजाओं का कमाल एक ट्रैक्टर को भी रोक सकता है, बॉबी देओल कॉमेडी भी कर सकते हैं और उनके पिता धर्मेंद्र कुछ भी करने मे सक्षम हैं. बात यहीं तक नहीं रूकती है ये आगे चल कर समुदायों पर पहुंच जाती है कि कैसे पंजाबी बड़े दिल वाले होते हैं और गुजराती शराब इत्यादि से दूर रहना पसंद करते हैं. लगभग ढाई घंटे की यह फिल्म आपके सहन शक्ति का इम्तिहान लेती है. कुछ जगहों पर यह हंसाने में जरूर कामयाब रहती है लेकिन इसकी आलसी लिखावट की वजह से फिल्म की जान बहुत पहले निकल जाती है.

रेस 3 किस कदर की फिल्म थी ये सभी जानते हैं और वो फिल्म किस वजह से सफल हुई थी ये बात भी किसी से छुपी नहीं है. बॉबी को फिल्म में ज्यादा स्क्रीन स्पेस देने की जुगत शायद रेस 3 की सफलता से ही आई होगी लेकिन अफ़सोस ये चीज इस फिल्म में काम नहीं कर पाती है.

धर्मेंद्र को छोड़ बाकी सब फेल

अभिनय की बात करें तो इस फिल्म में सितारों का अभिनय कम और उनकी इमेज को बार बार दर्शकों के दिमाग में बिठाने की कोशिश ज्यादा है. सिर्फ धर्मेंद्र ही कुछ हद तक अपने अभिनय से फिल्म को संभाल पाते हैं.

कोर्ट रूम में उनके और शत्रुघ्न सिन्हा के सीन्स को देखकर मजा आता है. सनी देओल जब अपने हाथ पैर चलाते हैं तभी उनको देखने में मज़ा आता है, दिक्कत तब होती है जब एक कॉमेडी फिल्म में उनको कॉमेडी करने की जरुरत पडती है. तब उनकी पोल एक तरह से खुल जाती है और इसको देखकर परेशानी होती है.

बॉबी को देखकर लगता है कि उनको भुनाने को कोशिश की गई है रेस 3 की सफलता की वजह से लेकिन अफ़सोस निर्देशक की ये चाल काम नहीं करती है. कृति खरबंदा अलबत्ता अपने गुजराती डॉक्टर के किरदार में कुछ असर डालने में जरुर कामयाब हो पाई हैं.

आउटडेटेड हो चुकी है सीरीज

सच्चाई यही है कि अब ऐसी फिल्मों का जमाना चला गया है. यमला पगला दीवाना फिर से की चाहे स्क्रिप्ट हो या फिर इसके कलाकारों का अभिनय - यह सब कुछ आउटडेटेड लगता है. इस फिल्म की कहानी 80 के दौर की लगती है जिस दौर में शायद फिल्मी इतिहास की सबसे बुरी फिल्मों को दर्शकों को झेलना पड़ा था. अगर अभी भी दर्शकों को ढाई किलो के हाथ जैसे डायलॉग सुनना पड़ता है तो इसका सीधा मतलब ये है की कुछ लोग है जिनको अपनी मानसिकता नहीं बदलनी है.

लेकिन फिल्म की आखिरी सुनवाई तो जनता के ही दरबार में होती है जहां पर कई चीज़ें बदल जाती है. अपना दिमाग अगर आप हरा भरा रखना चाहते हैं तो बेहतर होगा की इस फैमिली ड्रामे से दूर रहिए.

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