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REVIEW : सोनू, टीटू और स्वीटी की कहानी खट्टी मीठी है

सोनू के टीटू की स्वीटी लव रंजन की सबसे कमजोर फिल्म है फिर भी ये आपको एंटरटेन जरूर करेगी

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Abhishek Srivastava Updated On: Feb 23, 2018 02:36 PM IST

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REVIEW : सोनू, टीटू और स्वीटी की कहानी खट्टी मीठी है
निर्देशक: लव रंजन
कलाकार: कार्तिक आर्यन, सनी सिंह, नुसरत भरुचा, आलोक नाथ

कुछ फिल्में होती हैं जो समीक्षा से परे होती हैं कुछ उसी तरह से जैसे सलमान खान की फिल्में होती हैं. लव रंजन की फिल्में भी उसी लीक पर चलती हैं. आपको पहले से ही पता होता है कि रोहित शेट्टी और प्रभु देवा की फिल्मों में आपको क्या मिलने वाला है लेकिन लोग फिर भी देखने जाते हैं कुछ वही हाल लव रंजन की फिल्मों का होता है.

सोनू के टीटू की स्वीटी से निर्देशक लव रंजन ने अपनी कहानी का ट्रैक पिछली फिल्मों के मुकाबले मे बदला जरूर है लेकिन दायरा उनका वही है जो हमने उनकी प्यार का पंचनामा और उसके सीक्वल में देखा था.

अगर पंचनामा तीन दोस्तों और उनकी लव लाइफ की तमाम उलझनों पर केंद्रित थी तो लव रंजन की ये फिल्म उससे थोड़ी आगे बढ़कर एक दोस्त की होने वाली शादी पर केंद्रित है और कैसे उसे उसका बचपन का दोस्त जो अब उसके परिवार का हिस्सा भी है, उसे बचाना चाहता है.

कम शब्दों में कहें तो लव की अब तक की ये सबसे कमजोर फिल्म है. फिल्म के ट्रेलर में हम फिल्म पहले ही देख चुके हैं कि इस फिल्म की क्या बुनियाद है लेकिन जब आप फिल्म देखेंगे तो आपको यही पता चलेगा कि जिस बुनियाद पर इस फिल्म को मूर्तरूप दिया गया है उसकी नींव बेहद ही कमजोर है.

इस फिल्म की सबसे बड़ी परेशानी यही है. एक दोस्त यही चाहता है कि उसके दोस्त की शादी जिस लडकी से होने वाली है उससे ना हो और इसके पीछे पहले दोस्त का तर्क यही है कि लड़की चालू प्रवृति की है. लेकिन फिल्म में ऐसा एक भी सीक्वेंस नहीं है जिसमें लड़की के चालूपन को दिखाया गया है. इसके अलावा इस फिल्म में बात ब्रोमांस और रोमांस के बीच के वार के बार में भी कही गई है. जाहिर सी बात है हिंदी फिल्म है तो किसी एक की जीत दिखानी जरुरी हो जाती है. जब जीत की बारी आती है तब उसका तर्क भी बेहद कमजोर है. लेकिन ये भी सही है कि लव रंजन की फिल्मों को जो लोग पसंद करते हैं उनको इस बार भी इस फिल्म से निराशा नहीं होगी. आपको खुद को एक फेमिलिअर टेरिटरी में पाएंगे और कुछ हद तक आपको प्यार का पंचनामा की याद जरूर आएगी.

अलग है फिल्म की कहानी

कहानी सोनू के बारे में है जो अपने भाई टीटू से बेहद प्यार करता है. सोनू के मां बाप का बचपन में देहांत हो गया था और उसके बाद वो टीटू के परिवार का ही एक हिस्सा हो गया है. इस पूरे परिवार को काफी संभ्रांत परिवार दिखाया गया है जिनकी दिल्ली में मिठाई की दुकानों की चेन है. यह ऐसा परिवार है जो अपने घर के समारोह पांच सितारा होटल में करता है और जब शादी के पहले बैचलर्स पार्टी की बात आती है तो एम्स्टर्डम का रुख करता है.

टीटू की शादी की बात जब निकलती है तो टीटू अपने परिवार की ओर से ही सुझाई गई लड़की से शादी करने का निश्चय करता है यानी टीटू अरेंज्ड मैरिज के लिए अपनी हामी भर देता है. रोका के पहले ही सोनू को इस बात का अंदेशा हो जाता है की स्वीटी एक चालू किस्म की लड़की है और टीटू उसके साथ खुश नहीं रह पाएगा. इसके बाद सोनू की पुरजोर कोशिश यही होती है की दोनों के बीच का रिश्ता टूट जाए. फिल्म के क्लाइमेक्स तक चीजें उल्टी सीधी होती रही हैं और अंत में ब्रोमांस और रोमांस की इस लड़ाई में एक की जीत होती है.

एक्टिंग ने भरी फिल्म में जान

अभिनय के मामले में इस फिल्म में हमें तीन वही चेहरों के दीदार होते हैं जिन्हें हम पहले लव रंजन की फिल्मों में देख चुके हैं. कार्तिक आर्यन सोनू के रोल में जंचे हैं और उनके बारे में ये कहना भी ठीक होगा कि लव रंजन की सभी फिल्मों में उनके रोल एक जैसे ही यानी स्टीरियोटाइप्ड ही रहे हैं. बहरहाल अगर सिर्फ अभिनय की बात करें तो उनका काम फिल्म में अच्छा है. टीटू के रोल में सनी सिंह हैं और एक कन्फ्यूज्ड थोड़े से परेशान युवक की भूमिका में अपना काम ईमानदारी से निभाया है. नुसरत भरुचा भी स्वीटी के रोल में अपना काम ठीक से निभाया है. लेकिन अभिनय के मामले में कोई बाज़ी मार ले गया है तो वो है सोनू टीटू के घरवाले. इस परिवार के हिस्सा है आलोक नाथ और वीरेंदर सक्सेना. उनके साथ के सीन्स कमाल के बन पड़े हैं. ये कहना भी ठीक होगा कि आलोक नाथ और वीरेंदर सक्सेना के साथ वाले सीन्स फिल्म के हाईलाइट हैं. उनके साथ में शराब पीने वाले सीन्स को देखकर हंसी जरूर आएगी, खासकर के उस वक़्त जब कार्तिक को आलोक नाथ की ओरे से डांट पड़ती है.

लव रंजन पर एक्सपेरिमेंट पड़ा भारी

लव रंजन से ढेर सारी उम्मीदें इस फिल्म से बंधी थीं लेकिन उन उम्मीदों पर लव खरे नहीं उतर पाए है. मुजरिम भी उन्हीं को करार देना चाहिए क्योंकि कहानी उनकी कलम से ही निकली है. स्वीटी के किरदार के ऊपर सोनू पहले दिन से शक क्यों करता है इसके पीछे की वजह बताने की कोशिश लव ने फिल्म में एक बार भी नहीं बताई है. फिल्म का क्लाइमेक्स भी काफी कमजोर बन पड़ा है. अलबत्ता दिल्ली का मूड किस-किस तरह से कैमरे में क़ैद किया जाता है यह लव बखूबी जानते हैं. फिल्म में मोमेंट्स ज़रूर हैं जब उनकी कलम की ताकत दिखाई देती है. फिल्म के शुरू में किसकी मिठाई बेहतर है वाला सीन काफी शानदार बन पड़ा है इसके अलावा जब सोनू स्वीटी के नौकर से परेशान हो जाता है उससे भी देखने में अच्छा लगता है लेकिन जब सोनू अपनी जुगत लगाकर बाबू को घर से निकलवाने की कोशिश करता है तब उनकी लेखन एक बार फिर से कमजोर हो जाती है.

इस फिल्म में आपको हंसने के उतने सारे मौके नहीं मिलेंगे जो हमे लव की पिछली फिल्मों में नजर आए थे. इस फिल्म के बारे में यही कहना ठीक होगा की इस फिल्म के मोमेंट काफी अच्छे हैं लेकिन जब आप उन्हीं मोमेंट को एक पूरी फिल्म के रूप में देखते हैं तो कुछ ना कुछ कमी नजर आती है. अगर लव ने फिल्म में कोई ठोस वजह बताई होती सोनू और स्वीटी के तकरार के बारे में या फिर क्लाइमेक्स में भावनाओ का सहारा ना लेते तो इस फिल्म का मजा कुछ और हो सकता था.

इस फिल्म से मुझे सिर्फ एक ही शिकायत है कि लव अब अपनी फिल्मों में लड़कियों को विलेन बना ही रहे हैं तो उसका पूरा जस्टिफिकेशन दें. इसके अलावा लव रंजन की फिल्मों के चाहने वालों का एक वर्ग है उनको इस फिल्म से शिकायत नहीं होगी. सेक्सिस्म की बातों को थोड़ा किनारे पर कर दें तो इस फिल्म को देखने में आपको मजा आएगा.

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