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REVIEW STREE : ये स्त्री खुल के हंसाती भी है और डराती भी है

बॉलीवुड में जिस हंसाने वाली भूतिया फिल्म की कमी लंबे वक्त से खल रही थी वो स्त्री ने पूरी कर दी है

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Updated On: Aug 31, 2018 04:04 PM IST

Abhishek Srivastava

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REVIEW STREE : ये स्त्री खुल के हंसाती भी है और डराती भी है
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निर्देशक: अमर कौशिक
कलाकार: राजकुमार राव, श्रद्धा कपूर, पंकज त्रिपाठी, अपार शक्ति खुराना, अभिषेक बनर्जी

स्त्री को देखने बाद लगता है कि सालों से बॉलीवुड की जो कवायद चल रही थी एक हॉरर कॉमेडी फिल्म का फार्मूला क्रैक करने की वो इस फिल्म के बाद अब पूरी हो गई है. स्त्री दोनों ही जॉनर का एक शानदार मिश्रण है जिसको देखने के बाद आप खुल के गुदगुदाएंगे भी और साथ ही साथ शरीर में सिहरन भी आएगी.

मनोरंजन के कई पैमानो पर स्त्री खरी उतरती है और इसके लिए फिल्म के निर्देशक अमर कौशिक बधाई के पात्र हैं जिन्होंने अपनी पहली फिल्म में लीक से अलग हटकर कुछ नया करने की कोशिश की है जिसके लिए उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए.

एक चुड़ैल के आतंक की कहानी

स्त्री की कहानी मध्य प्रदेश के चंदेरी जिले की है जहां पर विक्की (राजकुमार राव) अपने पिता के खानदानी पेशे टेलरिंग को आगे बढ़ता है. सिलाई मशीन पर शानदार काम करने की वजह से पूरे जिले में उसके काम को लेकर चर्चे शुरू हो जाते हैं.

विक्की के अपने जिगरी दोस्तों की टोली भी है जिनसे वो हर शाम काम खत्म होने के बाद मिलता है. चंदेरी में ही एक चुड़ैल का आतंक भी जो साल के चार दिनों के लिए वहां पर आती है और किसी पुरुष को उठा कर ले जाती है.

चुड़ैल के चार दिनों का आतंक जिले के वार्षिक चार दिनों के मेले के साथ मेल खाता है. जब श्रद्धा कपूर चंदेरी के वार्षिक देवी के मेले में शिरकत करने के लिए आती है तब उसकी मुलाकात विक्की से होती है और मिलने के बाद विक्की का एक तरफा प्यार शुरू हो जाता है. पहली ही रात जब विक्की, बिट्टू और जना के साथ अपने एक दूसरे दोस्त के पिता की हवेली पर मौज मस्ती करता है तब वहीं से चुड़ैल अपना पहला शिकार चुनती है.

दूसरी रात विक्की का दोस्त जना (अभिषेक बनर्जी) उसका शिकार बनता है. शक की सुई श्रद्धा कपूर पर जाती है लेकिन आगे चल कर विक्की और उसके दोस्त बिट्टू (अपारशक्ति खुराना) को पता चलता है की श्रद्धा को भी अपना कोई पुराना बदला चुड़ैल से लेना है.बाद में स्त्री के प्रकोप को खत्म करने के लिए यह सब सभी मिलकर एक चाल चलते हैं जिसमें उनको साथ मिलता है पंकज त्रिपाठी का.

छोटा शहर भी फिल्म में एक किरदार है 

स्त्री की सबसे बड़ी कामयाबी यही है कि ये फिल्म अपने पूरे सफर में आपको हंसा हंसा कर लोटपोट करती रहती है और इसके पीछे की वजह है इसकी लिखावट जो बेहद ही सटीक है. चंदेरी भी खुद में इस फिल्म का एक अहम किरदार है और कहानी के आगे बढ़ाने में मदद करता है. फिल्म से जुड़े जो भी किरदार हैं उनकी मेहनत इस बात को लेकर नज़र आती है कि छोटे शहर के जो भी नुआन्सेस होते हैं उसके अंदर वो पूरी तरह से रमे हुए दिखाई देते हैं.

जब पंकज त्रिपाठी शुद्ध हिंदी में बात करते हैं तो वो कहीं से भी अजीब नहीं लगता बल्कि ये लगता है कि मैं तो इस तरह के लोगों से मिल चुका हू. राजकुमार राव, अपारशक्ति खुराना और अभिषेक बनर्जी  - तीनों फिल्म में दोस्त बने हैं और उनकी वेषभूषा और डीलडौल पूरी तरह से इस तरह के शहरों में रहने वाले युवाओं जैसी ही लगती है.

फिल्म का पेस कहीं भी ड्राप नहीं होता और इसके पीछे की एक वजह यह भी है कि फिल्म को चार रातों में बांट दिया है जब चुड़ैल शहर से आती है जिसकी वजह से लोगों की रूचि बनी रहती है कि उस रात क्या होगा?

राव, खुराना और त्रिपाठी का शानदार अभिनय 

अभिनय की बात करें तो चाहे वो राजकुमार राव हो या फिर पंकज त्रिपाठी या फिर अपार शक्ति खुराना या अभिषेक बनर्जी - इन सभी का फिल्म में शानदार अभिनय है और यहां पर इन सबमें कोई बाज़ी मारता है तो वो हैं अपारशक्ति खुराना जो बेहद ही सहज हैं और उनके तौर तरीकों से यही लगता है कि वो वाकई में चंदेरी के बाशिंदे हैं.

पंकज त्रिपाठी ने इसके पहले कॉमेडी की है लेकिन इस फिल्म में उनकी ये कला पूरी तरह से फूटकर बाहर निकलती है. फिल्म मे उनका हर डायलॉग आपको हंसने पर मजबूर करेगा. श्रद्धा कपूर ही अकेली फिल्म में ऐसी है जिनका काम सामान्य कहा जाएगा गनीमत इसी बात की है कि निर्देशक का फोकस दोस्तों के ऊपर ज्यादा रहता है. विजय राज़ भी फिल्म में एक छोटे से रोल में हैं और अपना असर छोड़ जाते हैं.

निर्देशन, लेखन और सिनेमैटोग्राफी सब कुछ बेहद सटीक 

ये तो बात थी फिल्म के कॉमेडी के पहलू को लेकर, कुछ वही हाल इसके हॉरर को भी लेकर है. इसके हॉरर में जान आती है फिल्म के साउंड एफ्फेक्ट्स की वजह से जो कभी-कभी आपके दिल की धड़कनों को बढ़ा देता है. निर्देशक ने स्त्री के माध्यम से डर को ज्यादा पनपने का मौका नहीं दिया है.

कहने का मतलब यह है कि उन्होंने स्त्री के आने के पहले जो टेंशन क्रियेट होना चाहिये था उसको वो पूरी तरह से क्रियेट नहीं कर पाये है लेकिन ये भी सच है कि जब जब स्त्री स्क्रीन पर रहती है उस वक़्त के साउंड इफेक्ट्स टेंशन की भरपाई पूरी तरह से कर देते हैं. कैमरे के पीछे अमलेंदु चौधरी का कमाल फिल्म में नज़र आता है और कुछ वही हाल है सुमीत अरोड़ा के डायलॉग की. पूरे नंबर मिलने चाहिए राज निदिमोरू और कृष्णा डी के को जिन्होंने इसकी कहानी और स्क्रीनप्ले लिखी है.

अमर कौशिक अपनी पहली कोशिश में कामयाब 

लेकिन इन सबके के ऊपर स्त्री को एक अच्छी फिल्म का जामा पहनने का सेहरा किसी के सर बांधना चाहिए तो वो है इसके निर्देशक अमर कौशिक. आमिर और नो वन किल्ड जेसिका बनाने वाले राजकुमार गुप्ता के सानिध्य में अपने निर्देशन की धार पैनी करने वाले अमर ने अपनी पहली फिल्म में ही बॉलीवुड से सेट नियमों को तोड़ दिया है. स्त्री कई वजहों से एक अपरंपरागत फिल्म है जो आपको पूरी तरह से अपने सीट से बांध कर रखेगी. चुड़ैल के दर्शन इस हफ्ते आप कर सकते हैं. मजा ही आएगा.

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