S M L

Review Soorma : बढ़िया स्टोरी, तापसी और दिलजीत दोसांझ की एक्टिंग आपका दिल छू लेंगे

सूरमा कहानी है भारतीय हॉकी टीम के पूर्व कप्तान संदीप सिंह की जिसे निर्देशक शाद अली ने अपनी क्रिएटिविटी से सुनाया है

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Updated On: Jul 13, 2018 01:11 PM IST

Abhishek Srivastava

0
Review Soorma : बढ़िया स्टोरी, तापसी और दिलजीत दोसांझ की एक्टिंग आपका दिल छू लेंगे
निर्देशक: शाद अली
कलाकार: दिलजीत दोसांझ, तापसी पन्नू, विजय राज, अंगद बेदी

शाद अली के सूरमा की जीत इसकी सादगी में छुपी हुई है. एक बेहद ही सरल कहानी जिसको कहने में किसी भी तरह के हथकंड़ों का इस्तेमाल नहीं किया गया है जिसके लिए बॉलीवुड एक तरह से बदनाम है. सूरमा को देखकर ये भी लगता है कि फिल्म मेकर्स के लिए ये फिल्म एक तरह का सबक है कि एक फिल्मी कहानी बेहद सीधी-सादी और सरल भी हो सकती है.

जरूरी नहीं कि महज दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए उसमे थोक के भाव से ड्रामा डाल दिया जाए. सूरमा अपनी कहानी कहने के लिए एक लीनियर पैटर्न फॉलो करती है और इसकी सादगी आपको अपनी ओर खींच कर ले आती है. शाद अली की पिछली तीन फिल्में बॉक्स ऑफिस पर पिट गईं थी मुमकिन है कि सूरमा से वो एक लम्बे अरसे के बाद बल्कि बंटी और बबली के बाद सफलता का मीठा स्वाद चखने मे कामयाब रहेंगे.

हॉकी टीम के पूर्व कप्तान संदीप सिंह की कहानी

सूरमा की कहानी भारतीय हॉकी टीम के पूर्व कप्तान संदीप सिंह के बारे में है. कहानी शुरू होती है संदीप के बचपन से जब वो और उसका भाई बिक्रमजीत एक साथ हॉकी की बारीकियों को सीखने के लिए एक कोच के पास जाते हैं. कोच की बदतमीजियों से तंग आकर संदीप वहां जाना बंद कर देता है लेकिन बिक्रमजीत हॉकी से अपना रिश्ता बनाए रखता है. बिक्रमजीत को आगे चलकर भारतीय टीम में शामिल होने का मौका भी मिलता है लेकिन एन वक़्त पर उसका चयन टीम में नहीं हो पाता.

ये जरूर पढ़ें : ‘सूरमा’ की वो कहानी जान लीजिए, जो बड़े पर्दे पर नजर आएगी

एक दिन खेत में जब वो अपने भाई संदीप से मिलने जाता है तब उसे वहा हॉकी के कुछ अनोखे गुर देखने को मिलते हैं. उसके बाद से बिक्रमजीत इस बात को अपने ऊपर ले लेता है की वो संदीप का चयन भारतीय टीम में करवाकर दम लेगा. बिक्रमजीत को अपनी इस कोशिश में सफलता भी मिल भी जाती है लेकिन कुछ समय के बाद एक ट्रेन सफर के दौरान जब संदीप को गोली लग जाती है तब उसकी और उसके घरवालों की दुनिया एक तरह से उलट जाती है.

इसके बाद संदीप का आत्मविश्वास और उसके परिवार का सहयोग उसको वापस हॉकी के मैदान पर वापस कैसे लाकर खड़ा करता है सूरमा इसी दास्तां को बयां करती है.

फिल्म के सभी कलाकारों का शानदार अभिनय  

सूरमा उन फिल्मों में से है जिसमें फिल्म के सभी कलाकारों ने सधा अभिनय किया है. दिलजीत दोसांझ को देखकर नहीं लगता है की उन्होंने असल जिंदगी में कभी भी हॉकी स्टिक नहीं पकड़ी थी. संदीप सिंह की चाल ढाल को उन्होंने अपने अभिनय में पूरी तरह से उतार दिया है. उनका अभिनय बेहद ही सहज है.

उनकी प्रेयसी हरप्रीत की भूमिका में तापसी पन्नू हैं और उनको देखकर कहा जा सकता है की आने वाले समय में वो फिल्म जगत की मौजूदा ए-लिस्ट अभिनेत्रियों के लिए खतरे की घंटी बनने वाली है. पूरी फिल्म में उनका रोल बेहद स्वभाविक और सधा हुआ है.

अंगद बेदी जिनको इसके पहले हम पिंक और टाइगर ज़िंदा है में देख चुके हैं और सूरमा मे बिक्रमजीत के रोल में वो पूरी तरह से निखर कर सामने आए हैं. लेकिन इन सब के बीच अगर कोई अपना ध्यान पूरी तरह से खींचने में कामयाब होता है तो वो विजय राज़ है. एक कोच के रूप में उनकी भूमिका दमदार है और फिल्म में किसी के डायलॉग पर ताली पड़ेगी तो वो विजय राज़ के ही डायलॉग होंगे.

वापस लौटी शाद अली के डायरेक्शन की लय

देखकर अच्छा लगता है कि शाद अली जिन्होंने किसी जमाने मे साथिया और बंटी और बबली जैसी फिल्में बनाई थी वापस अपना पुरानी धार को पाने मे कामयाब रहे हैं. शाद अली की पिछली ढंग की फिल्म सन 2005 में आई थी जब उन्होंने बंटी और बबली बनाई थी उसके बाद से मानो उनके ऊपर एक तरह से ग्रहण लग गया था.

झूम बराबर झूम, किल दिल और ओके जानू की असफलता के बाद उनसे सूरमा के लिए कुछ ज्यादा उम्मीदें नहीं थी लेकिन सूरमा से उन्होंने अपनी खोई हुई लय पा ली है. शाद के निर्देशन में कसावट है और एक बायोपिक को बड़े ही सधे और परिपक्व तरीके से उन्होंने तराशा है. इस फिल्म में कई सीन्स हैं जहां पर निर्देशक की महारथ साफ झलकती है.

एक सीन जिसका मैं उदाहरण यहां पर दे सकता हूं वो फिल्म के सेकेंड हाफ में आता है जब संदीप सिंह की हॉस्पिटल से छुट्टी हो जाती है और वो अपने घर आते हैं. सिर्फ उसके घरवाले अकेले उसी गाने पर डांस करते हैं जिस गाने पर इलाके के सभी लोगों ने डांस किया था जब संदीप पहली बार विदेश से ट्रॉफी जीतकर आए थे. ये बेहद ही इमोशनल सीन फिल्म में बन पड़ा है.

शंकर एहसान लॉय और गुलज़ार के गीत संगीत फिल्म के मूड में सराबोर है  

दाद देनी पड़ेगी शंकर एहसान लॉय के संगीत की जो पूरे फिल्म के मूड हिसाब से चलता है. गुलज़ार के बोलों ने गानों में एक तरह से जान डाल दी है. गानों को सुनने में खासा मज़ा आता है. अगर एक नज़रिए से देखें तो संदीप सिंह के जीवन की कहानी में एक फिल्म लायक उतना ड्रामा नहीं है. फिल्म का ग्राफ एक पैटर्न पर ही जाता है. संदीप अपनी मेहनत से भारतीय टीम में जगह बनाने में सफल होते हैं बाद में उनको एक गोली लग जाती है जिसकी वजह से उनको सब कुछ फिर से शुरू करना पड़ता है.

फिल्म स्क्रिप्ट के नजरिए से देखें तो उनका गोली लगना ही सबसे बड़ा एकमात्र हाई पॉइंट है. लेकिन यहां पर सही मायनों में निर्देशक ने उनके आत्मविश्वास को सबसे आगे रखा है है जो बेहद कमाल का है. और इसी आत्मविश्वास को शाद ने बखूबी इस फिल्म में क़ैद किया है. इस फिल्म से मुझे एक बड़ी शिकायत भी है और वो ये है की शाद ने बिक्रमजीत के किरदार को एक तरह से हाशिये पर ही रखा है.

संदीप की जिंदगी में बिक्रमजीत का कितना बड़ा रोल था ये ठीक तरह से उभर कर नहीं आ पाया है. अगर बिक्रमजीत के किरदार को शायद थोड़ा स्क्रीन स्पेस और देते तो बात कुछ और होती. यही बात मैं विजय राज़ के बारे में भी कहूंगा की उनके सीन्स को फिल्म में और रखना चाहिए था. अगर इस फिल्म की तुलना हम भाग मिल्खा भाग से करे तो सूरमा उसके पीछे ही खड़ी होगी और इसके पीछे वजह यही है की मिल्खा सिंह की जिंदगी में ड्रामा काफी था जिस वजह से फिल्म भी काफी शानदार बन पड़ी थी.

खैर बेहतर यही होगा कि इस फिल्म में हम ज्यादा नुक्ताचीनी ना ढूंढें. ये एक बेहद ही सिंपल फिल्म है जिसमे चीजों को भी बेहद ही सादगी भरे अंदाज मे कहा गया है. जाइए और देखकर आइए कि संदीप सिंह की जिंदगी आपको कितनी प्रेरणा दे सकती है. सूरमा को इस हफ्ते आप आप अपना वीकेंड प्लान बना सकते हैं.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Ganesh Chaturthi 2018: आपके कष्टों को मिटाने आ रहे हैं विघ्नहर्ता

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi