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FILM REVIEW : इक्कीस तारीख का इंतजार क्यों, शुभ मुहूर्त इसी शुक्रवार को है

पंडित गिरिधर लाल शर्मा की भूमिका में संजय मिश्रा नजर आयेंगे और आँखों देखी और कड़वी हवा के बाद एक और बेजोड़ अभिनय का नमूना उन्होंने इक्कीस तारीख शुभ मुहूर्त में दिया है

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Updated On: Nov 02, 2018 12:59 PM IST

Abhishek Srivastava

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FILM REVIEW : इक्कीस तारीख का इंतजार क्यों, शुभ मुहूर्त इसी शुक्रवार को है
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निर्देशक: पवन चौहान
कलाकार: संजय मिश्रा, बृजेन्द्र काला, मुकेश तिवारी, काजल जैन, महेश शर्मा

इक्कीस तारीख शुभ मुहूर्त बॉलीवुड की उन फिल्मों की श्रेणी में शुमार होती है जो अच्छी फिल्म जरूर है फिर भी उसे रिलीज होने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ता है क्योंकि अच्छे कॉन्टेंट की फिल्मों के लिए अभी भी बाजार उतना परिपक्व नहीं हुआ है.  गनीमत इस बात की है कि जब आप फिल्म देखेंगे तब आपको पता चल जाएगा कि एक बड़े मल्टिपलेक्स ने इसे अपनी स्क्रीन पर जगह देकर इसका जो सम्मान बढ़ाया है वो ऐसी अच्छी फिल्मों के लिए शुभ मुहूर्त है.

लगभग 100 मिनट की यह फिल्म आपको बांध कर रखेगी और आपको इस बात का एहसास दिलाएगी की वाकई में आप उन 100 मिनट के लिए मथुरा के एक पंडित जी के घर पर घटित हो रही घटनाओं के साक्षी बने हुए हैं. इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी सिम्पलिसिटी में है. आपको यही लगता है कि पंडित जी के परिवार की कहानी आपके पड़ोस में ही चल रही है.

एक बेहद ही सिंपल कहानी जिसको बेहद ही सरल अंदाज में कहा गया है और कहानी कहने का ये अंदाज कहीं ना कहीं आपके दिल में घर कर जाता है.

कहानी मथुरा के पंडित जी के बारे में है जिनको अपने बेटे के लिए एक वर की तलाश है

इक्कीस तारीख शुभ मुहूर्त की कहानी मथुरा के पंडित जी गिरिधर लाल शर्मा (संजय मिश्रा) के बारे में है. उनकी बेटी राधा (काजल जैन) अगर बच्चों को पढ़ाती है तो वही दूसरी तरफ उनका बेटा बनवारी आईएएस अफसर बनने की पुरजोर तैयारी में लगा हुआ है. राधा मथुरा शहर के ही एक दुकानदार गोपाल (महेश शर्मा) को अपना दिल दे बैठती है. लेकिन जब शादी की बात आती है तब लगन का ऐसा संयोग बैठता है की शुभ मुहूर्त उसी महीने की 21 तारीख को निकलता है.

पैसे की किल्लत और कुछ दिनों में बेटी की शादी के ऊपर के खर्चे - ये दोनों एक साथ पंडित जी पर मुसीबत का पहाड़ बन कर टूट पड़ते हैं. जब पंडित जी का दोस्त उनको ये उपाय सुझाता है कि पहले अपने बेटे की शादी में मिलने वाली धन राशि से अपनी बेटी की शादी वो बिना किसी परेशानी और ठाठ से कर सकते हैं तब पंडित जी को उसमें एक आशा की किरण नज़र आती है. पंडित जी अपने बेटे की शादी के लिए योग्य वधू की तलाश में लग जाते हैं.

जहां कहीं भी वो जाते हैं यही कहते हैं की उनका बेटा आईएएस अधिकारी है. लेकिन सच्चाई का पता चलते ही सभी उनसे किनारा कर लेते हैं.  जब उनका बेटा बनवारी वाकई में आईएएस की परीक्षा में सफल हो जाता है तब पासे पलट जाते हैं. पंडित जी के अंदर की लालसा जाग उठती है और उसके बाद तमाम परेशानियों का दौर शुरू हो जाता है.

संजय मिश्रा का एक और बेजोड़ अभिनय का उदाहरण है ये फिल्म

पंडित गिरिधर लाल शर्मा की भूमिका में संजय मिश्रा नजर आएंगे और आंखों देखी और कड़वी हवा के बाद एक और बेजोड़ अभिनय का नमूना उन्होंने इक्कीस तारीख शुभ मुहूर्त में दिया है. पंडित जी की भूमिका में वो पूरी तरह से जंचे हैं. उनके हाव भाव और रहन सहन का अंदाज जो आपको फिल्म में नज़र आएगा शायद आपको ये सोचने पर मजबूर कर देगा कि मथुरा के एक आम पंडित की बारीकियों को वो पर्दे पर कैसे लाये हैं.

उनका अभिनय बेहद शानदार है. कुछ वही हाल फिल्म में उनके दोस्त बने बृजेन्द्र काला का है. फटी जेब होने के बावजूद अपने मित्र की मदद के लिए हमेशा तैयार रहना - इस काम को बृजेन्द्र काला ने बेहद ही शानदार तरीके से अंजाम दिया है. जिस तरह से वो नाव पर पंडित जी के साथ मिलकर जिंदगी की जद्दोजहद को कुछ पलों के लिए भुलाने के लिए शराब पीते हैं वो सीन बेहद ही सजीव बन पड़ा है.

राधा के प्रेमी की भूमिका में है महेश शर्मा जो फिल्म में गोपाल के किरदार में नजर आएंगे. सिनेमा हॉल से बाहर निकलने के बाद आपके चेहरे पर महेश की कॉमेडी की वजह से आपके चेहरे पर एक हंसी बनी रहेगी. गोपाल के किरदार में महेश शर्मा ने मथुरा का पूरा अंदाज उड़ेल दिया है जो बेहद लुभावना लगता है.

फिल्म की लिखावट में कुछ कमियां जरूर हैं लेकिन मस्ती में कमी नहीं होगी

फिल्म की लंबाई थोड़ी और कम की जा सकती थी. लेकिन इसमें भी लोगों की अपनी-अपनी धारणाएं हैं जब मैंने कुछ दूसरे लोगों से इस पर बात की तो उन्हें फिल्म के माहौल के लिए ये जरूरी भी लगा. इसलिए इस बहस को मैं आपके ऊपर छोड़ता हूं. फिल्म हमेशा वो ही अच्छी मानी जाती है जो दर्शकों का दिल जीत ले.

फिल्म की चीजें देखने में काफी रियल लगती हैं - चाहे वो फिल्म का माहौल हो या फिर फिल्म के किरदार. अगर इसी कड़ी में पंडित जी के बेटे बनवारी के ऊपर भी कुछ समय अलग से दिया जाता तो वो फिल्म के अंदाज को और रियल बनाता.

मेरे कहने का मतलब ये है कि फिल्म में सिर्फ ये बताया गया है कि वो आईएएस की तैयारी में लगा हुआ है. अगर उसी से जुड़ी कुछ और चीजों पर भी ध्यान दिया जाता तो कहानी को और सटीक बन जाती. आईएएस वाली संजीदगी बनवारी के किरदार मे नदारद है. परेशानी क्लाइमेक्स को भी लेकर है. एक कॉमेडी ऑफ एर्रर्स का माहौल फिल्म के आखिर में बनता है और अगर लिखावट पर थोड़ा और ध्यान दिया जाता तो कहानी और भी मजेदार बन सकती थी.

लेकिन आप इन परेशानियों को नजर अंदाज कर सकते हैं. इक्कीस तारीख शुभ मुहूर्त एक अच्छी फिल्म है और इसके लिए सेहरा इसके निर्देशक पवन कुमार चौहान के सिर बंधना चाहिए. जाइये और जाकर इस फिल्म का लुत्फ उठाइए. आपको पता चल जायेगा कि जब चीज़ें सिंपल और सरल होती है तब भी उनमें उतनी ही कशिश होती है और उनमे भी अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता होती है.

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