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Helicopter Eela review: शानदार ‘ईला’ की कहानी है बेकार

‘हेलीकॉप्टर ईला’ को देखने में आपको बोरियत महसूस नहीं होगी लेकिन फिल्म की लिखावट में कुछ चीजें है जो आपका मजा किरकिरा कर सकती हैं

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Updated On: Oct 12, 2018 10:43 AM IST

Abhishek Srivastava

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Helicopter Eela review: शानदार ‘ईला’ की कहानी है बेकार
निर्देशक: प्रदीप सरकार
कलाकार: काजोल, रिद्धि सेन, तोता रॉय चौधरी, नेहा धूपिया

 

प्रदीप सरकार की फिल्म ‘हेलीकॉप्टर ईला’ से सबसे बड़ी शिकायत यही है कि फिल्म का जो सबसे बड़ा मुद्दा है उसको फिल्म के बीच में कहीं गायब कर दिया गया है. फिल्म का मुद्दा है कि काजोल के भीतर एक गायिका बनने की दबी ख्वाहिश जो बच्चे की पैदाइश के बाद वो सपना अधुरा रह जाता है. फिल्म का क्लाइमेक्स यही है कि वो अपने सपने को स्टेज पर गाकर पूरा करती है लेकिन परेशानी इस बात की है कि काजोल की इस दबी हुई मंशा को फिल्म में महज शुरू और आखिर में दिखाया गया है. बाकी फिल्म के दौरान आपको ऐसा कोई सीन देखने को नहीं मिलेगा जब काजोल अपनी इच्छा किसी के सामने जाहिर करती है. ‘हेलीकॉप्टर ईला’ को देखने में आपको बोरियत महसूस नहीं होगी लेकिन फिल्म की लिखावट में कुछ चीजें है जो आपका मजा किरकिरा कर सकती हैं.

कहानी ईला के गायिका बनने के सपनों के बारे में है जो मातृत्व के बाद पूरा नहीं हो पाता है

‘हेलीकॉप्टर ईला’ की कहानी है ईला राईतुरकर (काजोल) की जो एक गायिका होने का ख्वाब देखती है. उसके सपनों को हकीकत का जामा पहनने में उसका प्रेमी अरुण (तोता रॉय चौधरी) पूरा साथ देता है. आगे चल कर दोनों की शादी हो जाती है और ईला का करियर भी धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ने लगता है. जब ईला का म्यूजिक करियर परवान चढ़ने वाला ही होता है तब एक हादसे की वजह से वो रुक जाता है. मां बनने के बाद उसके सभी सपने धरे के धरे रह जाते हैं. उसके बाद ईला अपनी पूरी जिंदगी अपने बेटे विवान (रिद्धि सेन) के नाम कर देती है. लेकिन युवा विवान को अपनी जिंदगी मे अपनी मां की दखलंदाजी पसंद नहीं है. इन्तेहा तब हो जाती है जब विवान अपनी मां को अपने सपने पूरे करने के लिए कहता है और बदले में उसकी मां उसी के कॉलेज में दाखिला ले लेती है. परेशानियों का एक नया दौर शुरू होता है लेकिन ईला जब म्यूजिक के मंच पर चढ़ती है तब जिंदगी वापस अपनी पटरी पर लौट आती है.

फिल्म का पूरा दारोमदार काजोल के कंधे पर

कहने की जरुरत नहीं है कि ‘हेलीकाप्टर ईला’ पूरी तरह से काजोल के कंधे पर टिकी हुई है. फिल्म के पहले फ्रेम से लेकर आखिर फ्रेम तक काजोल नजर आती है. उनकी शानदार भूमिका की वजह से फिल्म में रूचि बनी रहती है. रिद्धि सेन फिल्म में विवान के रूप में नजर आएंगे और उनको देखकर यही लगता है कि कम उम्र के होने के बावजूद उनके काम में किसी तरह की कमी नहीं है. उनका काम भी बेहद सधा हुआ है और अपने हर सीन में उन्होंने अपने अभिनय हुनर का परिचय दिया है. बंगाली फिल्मों के जाने-माने कलाकार तोता रॉय चौधरी इस फिल्म में काजोल के पति की भूमिका में दिखाई देंगे और अपने छोटे रोल में भी उनका काम सहज और जोरदार है. नेहा धूपिया भी कालेज की ड्रामेटिक्स की प्रोफेसर की भूमिका से लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचने में कामयाब रही हैं.

प्रदीप सरकार का निर्देशन साधारण

अलबत्ता अगर किसी ने फिल्म में निराश किया है तो वो हैं फिल्म के निर्देशक प्रदीप सरकार. अगर उनकी पिछली फिल्म ‘मर्दानी’ एक कसी हुई स्क्रिप्ट का शानदार नमूना था तो वहीं दूसरी तरफ ‘हेलीकॉप्टर ईला’ में उनकी पकड़ काफी ढीली दिखाई देती है. कई चीजों को फिल्म में काफी सतही स्तर पर दिखाया गया है. जिस वजह से अरुण अपनी पत्नी और बच्चे को छोड़कर चला जाता है वो बेहद ही बचकाना लगता है फिल्म में. जब अरुण की कई साल बाद घर में वापसी होती है तो वो सीन भी काफी बचकाना लगता है. जाने के पहले अरुण अपनी एक डायरी अपने बच्चे को सुपुर्द करता है और यही कहता है कि डायरी पढ़कर उसे शायद चीजों की समझ आ जाए. डायरी की बात पर फिल्म में वहीं फुल स्टॉप लगा दिया गया है. क्या मालूम अगर उसी मोमेंट को फिल्म में और टटोला जाता तो फिल्म कहीं और जा सकती थी. इंटरवल तक इस फिल्म को देखने में मजा आता है. फिल्म का वो पूरा सीक्वेंस जब ईला गायिका बनने की कोशिश कर रही होती है, वो काफी अच्छा बन पड़ा है. पहला हाफ एक स्लाइस ऑफ लाइफ फिल्म का अच्छा उदाहरण है. लेकिन इस फिल्म का पतन इंटरवल के बाद शुरू हो जाता है. प्रदीप सरकार ने मां और बेटे के बीच के रिश्ते को बड़े ही आधुनिक तरीके से दिखाया है जो अच्छा लगता है. नब्बे के दशक के इंडी म्यूजिक सीन को जिस तरह से फिल्म में दिखाया गया वो काफी मजेदार है.

शानदार अभिनय के बीच में स्क्रीनप्ले अड़ंगा डालता है 

अमित त्रिवेदी के गाने फिल्म में आते हैं और चले जाते हैं लेकिन दिमाग में घर नहीं कर पाते हैं. ये फिल्म आनंद गांधी के गुजराती प्ले पर आधारित है जिसका स्क्रीनप्ले मितेश शाह और आनंद गांधी ने साझे तौर पर लिखा है. स्क्रीनप्ले की सबसे बड़ी खामी यही है कि फिल्म एक ही ढर्रे पर चलती है यानि मोमेंट्स ही हैं जो फिल्म को आगे बढ़ाते हैं न कि इसकी कहानी. फिल्म के अंत में आप खुद से यही कहेंगे कि मस्ती में कहीं कमी रह गई थी. आप इस फिल्म को आजमा सकते हैं लेकिन चेतावनी यही होगी कि सितारों के अभिनय को छोड़कर आप फिल्म से ज्यादा उम्मीद मत बांधिएगा.

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