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मूवी रिव्यूः देखने लायक है ये ‘हरामखोर’ !

नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी और श्वेता त्रिपाठी के जानदार अभिनय और बोल्ड सब्जेक्ट पर बनी अच्छी फिल्म है हरामखोर

Ravindra Choudhary Updated On: Jan 13, 2017 05:20 PM IST

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मूवी रिव्यूः देखने लायक है ये ‘हरामखोर’ !

बॉलीवुड के ‘ग्रीक गॉड्स’ को मात देने वाले ओमपुरी के निधन पर ‘हरामखोर’ से बेहतर श्रद्धांजलि और कोई नहीं हो सकती थी. इतने ‘डिस्टर्बिंग’ और ‘डार्क’ सब्जेक्ट पर फिल्म बनाने के लिये लेखक-निर्देशक श्लोक शर्मा निश्चित रूप से प्रशंसा के पात्र हैं. हालांकि ‘हरामखोर’ शब्द से जेहन में जो छवि उभरती है, उस हिसाब से यह टाइटल थोड़ा भ्रामक प्रतीत होता है.

कहानीः श्याम टेकचंद (नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी) मध्य प्रदेश के एक कस्बे में टीचर है. जो घर पर ट्यूशन भी पढ़ाता है. उसके स्कूल में नौवीं क्लास में पढ़ने वाली संध्या (श्वेता त्रिपाठी) उसके घर ट्यूशन पढ़ने आती है. शादीशुदा श्याम उस पर डोरे डालता है. ट्यूशन में कमल और मिन्टू नाम के दो लड़के भी हैं, जो श्याम की करतूत को जानते हैं. कमल भी संध्या को चाहता है और उससे शादी करने के सपने देखता है.

संध्या की मां नहीं है और उसके पुलिस इंस्पेक्टर पिता रोज रात को शराब के नशे में धुत होकर घर लौटते हैं. जिनका एक महिला से संबंध है. संध्या को यह सब मालूम है. ऐसे हालात में वो अपने शादीशुदा लंपट टीचर की ओर आकर्षित हो जाती है और दोनों के बीच शारीरिक संबंध बन जाते हैं. जिसका अंत बड़े चौंकाने वाले ढंग से होता है.

‘हरामख़ोर’ को इसके ट्रेलर में प्रेम-त्रिकोण बताया गया है, जो ठीक नहीं है.  फिल्म के तीनों मुख्य किरदारों में से किसी को किसी से ‘प्रेम’ नहीं है.

फिल्म के हिलाकर रख देने वाले अंत के बावजूद अगर आप इसके पात्रों के लिये कोई सहानुभूति महसूस नहीं करते तो शायद यह निर्देशक श्लोक शर्मा की ताकत भी है और कमजोरी भी.

श्याम खलनायक तो है लेकिन वो शक्ति कपूर या रंजीत की तरह नहीं है. जो ‘आज तो तेरा भगवान भी तुझे नहीं बचा सकता!’ जैसे डायलॉग बोलता हो. बल्कि वो हम सब लोगों जैसा ही नज़र आता है. उसकी हरकतों पर आप हंस भी सकते हैं. फ़िल्म देखते हुए लगता है कि हमारे अंदर भी श्याम जैसा कोई टीचर रहा है या कमल जैसा कोई लड़का!

फिल्म में कुछ दृश्य तो बेहद कमाल के बन पड़े हैं. मिसाल के तौर पर- श्याम का अपनी पत्नी सुनीता से झगड़े वाला सीन. तीन-चार मिनट के इस एक सीन के लिये आप इस फिल्म को दोबारा भी देख सकते हैं. यह एक सीन हमें बताता है कि नवाज़ुद्दीन कितने बड़े एक्टर हैं. ऐसे किरदार को, जो भयानक शक्ल और मूंछों वाला खलनायक नहीं है, नवाज़ ने परदे पर कमाल की खूबसूरती से निभाया है.

Nawazuddin Siddiqui

फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने एक स्कूल टीचर का किरदार निभाया है  (फोटो: रॉयटर्स)

श्वेता त्रिपाठी के रूप में हमारे समानांतर/सार्थक सिनेमा को एक और सशक्त अभिनेत्री मिल गयी है. मसान के बाद (असल में मसान से पहले) कमल और मिंटू के रूप में मास्टर इरफ़ान और मास्टर समद ने अपनी उम्र से बड़ा काम किया है. श्याम की पत्नी के रूप में त्रिमाला अधिकारी ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है.

फिल्म की अवधि केवल डेढ़ घंटा है इसके बावजूद भी यह लंबी लगती है. अपने दमदार सब्जेक्ट और अभिनय के बावजूद हरामखोर कुछ मामलों में कमजोर साबित होती है.

श्लोक शर्मा ने कुछ किरदारों को अधूरा छोड़ दिया है. बीच-बीच में कहानी के कई सिरे अधूरे से छूट जाते हैं. स्क्रीन प्ले और एडिटिंग पर और मेहनत की जरूरत थी. इन कमियों के बावजूद हरामखोर को एक अच्छी फिल्म कहा जायेगा.

अच्छी बात है कि अब हवा-हवाई ‘पॉपकॉर्न सिनेमा’ के साथ-साथ ‘भारत’ की कहानियां भी परदे पर आ रही हैं. ये फिल्में ना सिर्फ अपनी लागत वसूल रही हैं बल्कि मुनाफा भी कमाने लगी हैं. जो बॉलीवुड के लिये बहुत अच्छा संकेत हैं.

अंत में यही कहूंगा कि ‘हरामखोर’ ‘कमज़ोर’ संवेदनाओं वाले लोगों के लिये नहीं है. यह उनके लिये है, जो अपनी फिल्मों को वैसा ही देखना चाहते हैं. जैसा उनके आस-पास का समाज है.

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