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FULL REVIEW 2.0 : रजनीकांत और अक्षय कुमार की ये फिल्म टोटल पैसा वसूल है

550 करोड़ रुपए की लागत से बनी ये फिल्म हॉलीवुिड का साउथ इंडियन फिल्म इंडस्ट्री का जवाब है कि अब वो भी उनकी तरह परिपक्व हो चला है

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Updated On: Nov 29, 2018 02:31 PM IST

Abhishek Srivastava

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FULL REVIEW 2.0 : रजनीकांत और अक्षय कुमार की ये फिल्म टोटल पैसा वसूल है
निर्देशक: शंकर
कलाकार: रजनीकांत, अक्षय कुमार, एमी जैक्सन, आदिल हुसैन, सुधांशु पांडे

रोबोट 2.0 इस देश की अब तक की सबसे महंगी फिल्म क्यों है?  इस बात का पता आपको फिल्म देखने के बाद चल जाएगा. रोबोट 2.0 हॉलीवुड से निकलने वाली सुपरहीरो थीम की फिल्मों को हिंदुस्तान की ओर से जवाब है.

बल्कि ये कहना ठीक होगा कि ये साउथ के फिल्म उद्योग का करारा जवाब है क्योंकि इसके लिए बॉलीवुड किसी भी तरह का कोई क्रेडिट नहीं ले सकता है. आमतौर पर ऐसा भी देखने में आता है कि फिल्मों में उच्चकोटि की तकनीकी व्यवस्था के बावजूद ऐसी कई फिल्में भी आती हैं जो अपनी कहानी को लेकर मात खा जाती हैं. रोबोट 2.0 इस मामले में भी खरी उतरती है क्योंकि इसकी कहानी का सरोकार कहीं न कहीं हमारी-आपकी जिंदगी से है.

अगर किसी बात को लेकर इस फिल्म में मुझे परेशानी हुई तो वो थी इस फिल्म में ह्यूमर की मात्रा बेहद कम होने से और अक्षय कुमार की जो बैक स्टोरी है वो भले ही कमाल की है लेकिन कहीं न कहीं वो दिल को छू नहीं पाती है.

पक्षी विशेषज्ञ की कहानी

रोबोट 2.0 की कहानी की शुरुआत होती है पक्षी राजन (अक्षय कुमार) से जो एक सेल टावर पर चढ़कर आत्महत्या कर लेता है. पक्षी राजन एक ओर्निथोलॉजिस्ट है यानी पक्षियों का विशेषज्ञ. जब उसके घर के बाहर एक सेल फ़ोन टावर का निर्माण होने लगता है तब उसके पक्षियों के ऊपर आफत का पहाड़ टूट पड़ती है. सारे पक्षी एक के बाद एक रेडिऐशन की वजह से मरने लगते हैं. सेल फोन ऑपरेटर्स पर नकेल कसने की वजह से वो टेलीकॉम मिनिस्टर और सेल फ़ोन ऑपरेटर्स के मालिक से भी मिलता है लेकिन उसको अपने मुहिम में सफलता नहीं मिलती है.

आत्महत्या के बाद अचानक एक-एक करके शहर के सभी मोबाइल फोन्स गायब होने लगते हैं. जब मामला संजीदा हो जाता है तब डॉक्टर वशीकरण (रजनीकांत) मंत्री को रोबोट चिट्टी को वापस ले आने का मशवरा देते है. चिट्टी, वशीकरण और वशीकरण की असिसटेंट नीला की वजह से वो पक्षी राजन पर नकेल कसने में कामयाब हो जाते है. लेकिन डॉक्टर बोहरा का बेटा की वजह से पक्षी राजन एक बार फिर से आजाद हो जाता है और अपना कहर ढहाने लगता है. एक बार फिर से चिट्टी, पक्षी राजन को पराजित और वश में करने के लिए निकल पड़ता है. फुटबॉल स्टेडियम में फिल्म का क्लाइमेक्स होता है जो हिंदुस्तान के दर्शकों ने इसके पहले किसी भी फिल्म में देखा नहीं होगा.

स्पेशल इफेक्ट्स फिल्म के हीरो 

भले ही रोबोट 2.0 की अवधि ढाई घंटे की है लेकिन ये फिल्म कहीं भी आपको बोर नहीं करेगी. तकनीकी कारामात ऐसी हैं फिल्म में जो आपको अद्भुत लगेंगी और कई जगह पर आपको ये भी लगेगा कि आप एक हॉलीवुड की फिल्म देख रहे हैं.

लेकिन अगर इसके तकनीकी अस्पेक्ट्स  को कुछ समय के लिए दरकिनार भी कर दें तो इसकी कहानी ऐसी है जिसका सराबोर आपके निजी जिंदगी से है - मोबाइल फ़ोन्स आपके जीवन में किस तरह से जहर बो रहे हैं - इसी की बात कही गई इस फिल्म मे. शंकर ने एक भी मिनट फिल्म में बर्बाद नहीं किया है. उनको अपनी कहानी कहनी थी और वो पूरी अवधि तक उसी मंत्र से चिपके रहते हुए नजर आते हैं. लेकिन इसका खामियाजा भी उनको भुगतना पड़ा है.

पहली रोबोट अगर आपको याद होगी तो आपको ये भी याद होगा कि उस फिल्म में काफी ह्यूमर था. इस फिल्म में ह्यूमर की मात्रा ना के बराबर है यानी फिल्म में किसी भी तरह की राहत आपको नहीं मिलेगी सीन्स खत्म होने के बाद. सभी कुछ एक के बाद एक करके होते चला जाता है.

कुछ वही हाल अक्षय कुमार की बैक स्टोरी के बारे में है. ये बेहद ही दिल को छू लेने वाला है लेकिन उनकी कहानी में इमोशंस कहीं से उभर कर निकल नहीं पाते हैं. मुझे पता नहीं चल पाया कि इसके लिए जिम्मेदार अक्षय कुमार का अभिनय है या शंकर का निर्देशन. लेकिन अगर इस कमी को निकाल दे तो ये फिल्म आपका भरपूर मनोरंजन करेगी.

रजनीकांत का उम्दा अभिनय 

अभिनय की दृष्टि से रजनीकांत का काम फिल्म में काफी प्रशंसनीय है. वैज्ञानिक और रोबोट के रूप में उनके दोनों अवतार इस फिल्म में भी अलग नजर आते हैं जिसके लिए उनकी तारीफ करनी पड़ेगी. अक्षय कुमार की एंट्री फिल्म में सही मायनों में इंटरवेल के बाद होती है.

उनका काम साधारण है. कहने का आशय ये है कि अगर उनके बदले और कोई भी होता तो वो भूमिका निभा सकता था. एमी जैक्सन फिल्म में वशीकरण की रोबोट असिसटेंट बनी हैं और अपनी छोटी सी भूमिका में लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने में कामयाब रही हैं. लेकिन फिल्म का हीरो अगर कोई सही मायने में है तो वो हैं शंकर. दाद देनी पड़ेगी शंकर की सोच की. इतने बड़े पैमाने पर एक साई-फाई फिल्म बनाना और उसमें कम गलतियां करना - इन सभी के लिए शंकर बधाई के पात्र हैं.

पहली रोबोट में मनोरंजन की मात्रा ज्यादा थी 

रोबोट 2.0 एक अलग फिल्म है जो दर्शकों के लिए एक अनुभव होगा. लेकिन अगर इसकी तुलना पहले रोबोट से अगर की जाए तो ये कई जगहों पर उतनी खरी नहीं उतरती है. जब चिट्टी के मिनिएचर बोट्स फिल्म में एंट्री करते हैं तब वो पूरा सीक्वेंस थोड़ा अटपटा लगता है.

पक्षी राजन को डी न्यूट्रलाईज करने का पूरा सीन भी थोड़ा लम्बा बन पड़ा है और वो आगे चल कर वो बोर करने लगता है. लेकिन फिल्म के स्पेशल इफेक्ट्स आपको कहीं से बोर नहीं करेंगे. रोबोट 2.0 की जान इसके स्पेशल इफेक्ट्स में बसी हुई है. जाइये और जाकर इसका लुत्फ़ उठाइए, आपको पता चल जाएगा कि 550 करोड़ और तीन साल की मेहनत का नतीजा क्या निकला है. इस फिल्म को आप इस वीकेंड अपने परिवार के साथ देख सकते हैं.

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