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Review जीनियस : उत्कर्ष शर्मा फिल्म में पास बाकी सभी फेल

फिल्म जीनियस में दिखाई दिया नवाज़ुद्दीन का बेहद ही कमजोर अभिनय

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Updated On: Aug 24, 2018 06:16 PM IST

Abhishek Srivastava

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Review जीनियस : उत्कर्ष शर्मा फिल्म में पास बाकी सभी फेल
निर्देशक: अनिल शर्मा

अनिल शर्मा फिल्म जीनियस से निर्देशन की कमान लगभग पांच साल के बाद एक बार फिर से संभाल रहे है और इस बात में कोई शक नहीं है की उनकी कोशिश यही है की अपने बेटे को वो एक हीरो बना दे. उनकी इस कोशिश का मिला जुला असर है. खुद तो वो निर्देशन की परीक्षा में नाकाम साबित हुए है लेकिन उनके बेटे उत्कर्ष शर्मा ने दिखा दिया है की आगे चल कर उनके ऊपर निर्देशको की जमात अपना भरोसा जता सकते है. अगर एक फिल्म के हिसाब से जीनियस की बात करे तो एक अच्छी फिल्म के मापदंड पर ये कही से भी खरी नहीं उतरती है. लचर स्क्रीनप्ले, ढीला निर्देशन और ओवरएक्टिंग ने इस फिल्म की जान निकाल दी है. जीनियस को देखना समय और पैसे दोनों की ही बर्बादी है. अनिल शर्मा ने पूरी कोशिश की है की उनके बेटे ही फिल्म के केन्द्र बिंदु रहे और इस चक्कर में फिल्म में सुपर जीनियस बने नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की एंट्री फिल्म में इंटरवल के दौरान होती है. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. मजा तब किरकिरा हो जाता है जब नवाज़ भी अपने रोल में ढीले नज़र आते है जो एक शाॅक की तरह है.

जीनियस की कहानी के एक रॉ एजेंट की है

जीनियस की कहानी मथुरा के एक अनाथ लड़के वासुदेव शास्त्री (उत्कर्ष शर्मा) के बारे मे है जो कई मायनों में जीनियस है और उसके अंदर बौद्धिक शक्ति कूट कूट कर भरी हुई है. इसी वजह से उसका दाखिला आई आई टी में हो जाता है जहां पर उसे फिल्म की नायिका नंदिनी (इशिता चौहान) से प्रेम हो जाता है. पढ़ाई पूरी करने के बाद वो नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर जयकिशन प्रसाद (मिथुन चक्रवर्ती) की नजर में आता है और उसके बाद उसे भारत की विदेशी गुप्तचर संस्थान रॉ में नौकरी मिल जाती है. फिल्म की कहानी की शुरुआत दरअसल यही से होती है जब रॉ का पोरबंदर में एक मिशन पूरी तरह से नाकामयाब साबित होता है. इस मिशन में वासुदेव की टीम के कई लोग मारे जाते है और खुद उसके सुनने और चलने की शक्ति कम हो जाती है. सात महीने के बाद जब वो वापस रॉ ज्वाइन करता है तब उसके सीनियर अफसर उसे वापस जाने को कहते है क्योंकि उनका मानना है की मिशन की नाकामयाबी के पीछे उसी का हाथ था. उस मिशन का करता धर्ता एमआरएस (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) था. इसके बाद वासुदेव एक तरह से कमर कस लेता है की की वो कैसे भी एमआरएस को कानून की गिरफ़्त में लेकर आएगा.

उत्कर्ष शर्मा फिल्म में पास बाकी सभी फेल

सच मायनों में इस फिल्म के अंदर एक बड़े ही कमाल का चूहे बिल्ली की कहानी छुपी हुई है लेकिन अनिल शर्मा के निर्देशन में ये कुछ और ही बन कर आया है जिसका एन्ड रिजल्ट कही से भी शानदार नहीं है. कुछ एक सीक्वेंसेस फिल्म में है जहां पर अनिल शर्मा के पुराने स्पार्क्स नज़र आते है लेकिन वो गिने चुने हुए ही है. फिल्म की शुरुआत बेहद ही सधे तरीके से होती है जब पोरबंदर के मिशन को दिखाया गया है लेकिन उसके बाद धीरे धीरे फिल्म दम तोड़ते हुए नज़र आती है और क्लाईमेक्स तक आप की हिम्मत जवाब दे चुकी होती है. अनिल शर्मा ने अपने बेटे से वो सब कुछ करवाया है जिसकी जरुरत एक बडे कैनवस की फिल्म में हीरो करता है यानी की उत्कर्ष ने मार धाड़, गाना, बड़े डायलॉग, सिक्स पैक यह सब कुछ फिल्म किया है. गनीमत यही है की उत्कर्ष को देखकर लगता है की इनके अंदर प्रतिभा है और एक अच्छे डायरेक्टर की कमान में इनका काम और निखर कर भविष्य में सामने आएगा. पिता का पुत्र प्रेम तब नज़र आता है जब जो जूनियर आर्टिस्ट्स की मदद से तालियों की गूंज क्रिएट करते है जब कभी भी उत्कर्ष कुछ अलग काम फिल्म में करता है. सब कुछ ठीक है लेकिन हीरोइन के साथ फ़्लर्ट वाले सीन में तो ऐसा नहीं करना चाहिए था.

नवाज़ुद्दीन का बेहद ही कमजोर अभिनय फिल्म में

फिल्म के कलाकारों के अभिनय की बात करे तो उत्कर्ष शर्मा का काम एक न्यूकमर के हिसाब से काफी सधा हुआ है. फिल्म के लिए उन्होंने मेहनत की है यह बात उनके हर सीन में नज़र आता है. नवाज़ुद्दीन की एंट्री फिल्म के इंटरवल के दौरान होती है लेकिन तबतक फिल्म का बंटाधार हो चुका होता है. नवाज़ कई सीन्स में हैम करते है और जीनियस मे शायद उन्होने अपने करियर का सबसे कमजोर अभिनय किया है . एनएसए के चीफ की भूमिका में मिथुन का काम साधारण है और उनकी भूमिका में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसको आप लम्बे समय तक के लिए याद करें. फिल्म में बिना वजह के कई ट्विस्ट्स को ऐसे ही ठूस दिया गया है जिसकी कोई जरुरत नहीं थी. इस फिल्म में जीनियस शब्द का इतनी बार इस्तेमाल किया गया है की शायद ये फिल्म हिट कराने का कोई मंत्र है. बार बार सुनकर इससे चिढ मचती है. नवाज को देख कर उनकी फिल्म किक में उनके अभिनय की याद आती है जिसमे उन्होंने अभिनय काम और हसी ठिठोली ज्यादा की थी.

अपनी फिल्म को बनाने का ढर्रा अनिल शर्मा को बदलना पड़ेगा

इस फिल्म को देखने की सिर्फ एक ही वजह हो सकती है और वो है उत्कर्ष का अभिनय. जाहिर सी बात है उनको फिल्म जगत में अभी एक लम्बा सफर तय करना है लेकिन इस बात का परिचय उन्होंने दे दिया है की अगर कहानी और निर्देशक का साथ उनको मिल जाये तो वो और भी बेहतर काम कर सकते है. अनिल शर्मा के निर्देशन में काम करना शायद उनके लिए सज़ा हो गई. लगभग पौने तीन घंटे की फिल्म को देखने का साहस किसी जमाने में लोगो के पास होता था लेकिन अब नहीं. और अब तब फिल्म में गाने डाल कर आप क्या साबित करना चाहते है. गाने भी तभी चलते है जब फिल्म की कहानी सटीक दिशा में जा रही होती है. जीनियस को देखने के लिए आपको साहस जुटाना पड़ेगा. समय की यही दरकार है की अनिल शर्मा अब आज के ज़माने की कहानी कहे.

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