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Halkaa Review : हलकी स्क्रिप्ट की वजह से हलका आपको कब्ज का एहसास दिलाएगी

फिल्म के सभी कलाकारों का शानदार अभिनय लेकिन बेअसर स्क्रिप्ट की वजह से दर्शकों को नहीं जमेगी हलका

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Updated On: Sep 07, 2018 06:03 PM IST

Abhishek Srivastava

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Halkaa Review : हलकी स्क्रिप्ट की वजह से हलका आपको कब्ज का एहसास दिलाएगी
निर्देशक: नील माधब पांडा
कलाकार: रणवीर शोरी, पाओली दाम, कुमुद मिश्रा, तथास्तु

इस बात में कोई शक नहीं है की हलका का कोर आइडिया शानदार है और इसके अंदर एक शानदार फिल्म बनने के सारे सामग्री मौजूद थे. चाहे इसकी कहानी हो या फिर इसके कलाकार - इन सभी की मदद से एक शानदार फिल्म का निर्माण हो सकता था जो मनोरंजन की आड़ में स्वच्छता का सन्देश दे सकती थी. लेकिन फिल्म में जो कुछ भी होता है वो इसके उलट ही होता है. सन्देश की आड़ में मनोरंजन का तड़का इस फिल्म में मारा गया है. एक लचर फिल्म बनाने में इसकी मदद इसकी ढीली स्क्रिप्ट करती है. इस फिल्म में एक ही चीज को कई बार दोहराया गया है जो बोर करने के अलावा दुसरा और कोई काम नहीं करता है. सरकारी महकमा, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनता की उदासी इस फिल्म में भी नजर आती है जो अमूमन ऐसे विषय वस्तु पर आधारित फिल्मों में होती है. ऐसी चीज़ो को आप इसके पहले कई बार देख चुके है और आखिर में थक हार कर आप यही कहते है की नयापन कहा है. नीला माधब पांडा की ये फिल्म आपको एक मिश्रित अनुभव देगी जिसमे आपको बोरियत ज्यादा और मनोरंजन कम मिलेगा.

कहानी एक बच्चे के टॉयलेट बनाने के जुनून को लेकर है

हलका की कहानी पिचकू (तथास्तु) के बारे में है जिसको खुले में शौच करने से परहेज है और उसका एक ही सपना है की वो रेल की पटरियों और सुनसान फ़ैक्टरी के बदले टॉयलेट जाकर खुद को हलका करे. जहां पिचकू के पिता (रणवीर शोरी) एक रिक्शा चालक है तो वही दूसरी तरफ उसकी मां एक अगरबत्ती की फैक्टरी में काम करती है. पिचकू के पिता को उसकी टॉयलेट की जिद से खासा चिढ़ मचती है. पिता का भी एक सपना है की वो अपना रिक्शा बेच कर एक ऑटो रिक्शा खरीद ले. जब पिचकू को अपनी इस मुहिम में अपने पिता से मदद नहीं मिलती है तब वो अपने सपने को खुद ही पूरा करने की ठान लेता है और उसकी इस कोशिश में उसका साथ मिलता है उसके दोस्त गोपी (आर्यन प्रीत) और चूरन बेचने वाले बाबा (कुमुद मिश्रा) का. इसके बाद की कहानी इन तीनों की टॉयलेट बनवाने की कवायद को लेकर ही है. कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब सरकार की तरफ से मिले पैसे को पिचकू का पिता ऑटो खरीदने में लगा देता है और उसके बाद पुलिस उसके घर गिरफ्तार करने की मंशा से पहुंच जाती है. तभी ऐन वक़्त पर पिचकू एक टॉयलेट दिखा कर अपने पिता की मदद करता है.

फिल्म के सभी कलाकारों का शानदार अभिनय लेकिन स्क्रिप्ट बेअसर

अभिनय की बात करें तो इस फिल्म में रणवीर शोरी और कुमुद मिश्रा जैसे कुछ एक अच्छे कलाकारों का जमावड़ा इस फिल्म में है और सही मायनों में अपने अभिनय से इस फिल्म में कुछ हद तक जान भी डाली है लेकिन एक लचर स्क्रीनप्ले उनकी सारी कोशिशों पर पानी फेर देता है. एक रिक्शेवाले की भूमिका में रणवीर शोरी ने अपना काम ईमानदारी से निभाया है और फिल्म में दवा बेचने वाले बाबा बने कुमुद मिश्रा की उपस्थिति से दर्शकों में एक तरह की उत्सुकता बनी रहती है. लेकिन इस कहानी के केंद्र में है तथास्तु जो पिचकू की भूमिका में है. तथास्तु के चेहरे पर मासूमियत लाने में निर्देशक नील माधब पांडा कामयाब रहे है और उनका अभिनय भी औसत से बेहतर है. जिस तरह से पिछले साल रिलीज़ हुई फिल्म टॉयलेट एक प्रेम कथा में खुले में शौच की समस्या को काफी हलके फुल्के ढंग से दिखाया गया था कुछ उसी तरह से इस फिल्म में भी उसी समस्या को एक बार फिर से उजागर किया गया है. लेकिन इस बार वो सीन्स अपना असर छोड़ने में कामयाब नहीं हो पाए है. अलबत्ता फिल्म के कुछ एक सीन्स बेहद इमोशनल बन पड़े है. जब पिचकू अपने पिता को गिरफ्तार होने से बचाता है तब निर्देशन की धार दिखती है. लेकिन पूरी फिल्म को देखने के बाद यही महसूस होता है कि कुछ चीजों की कमी फिल्म मे रह गई है.

नील माधब पांडा की ये फिल्म शार्ट फिल्म होती तो बेहतर होती

नील माधब पांडा इसके पहले अपनी फिल्मों से नेशनल अवार्ड भी हासिल कर चुके है और उनकी पिछली फिल्म कड़वी हवा जिसका विषय वस्तु पर्यावरण था को अच्छी ख़ासी शाबाशी मिली थी समीक्षक वर्ग की ओर से. लेकिन इस बार एक अधपके स्क्रीनप्ले की वजह से वो गच्चा खा गए है. इस फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है की इसे एक फिल्म का रूप दिया जाए. बेहतर यह होता की इस फिल्म को शार्ट फिल्म की तरह ट्रीट किया जाता. फिल्म देखते समय कई बार ये फीलिंग भी आती है की मै स्वच्छता अभियान का विज्ञापन देख रहा हुं. फिल्म में पिचकू और उसके माँ के बीच की जो बॉन्डिंग दिखाई गई है उसको देखने में मज़ा आता है. लेकिन फिल्म में इसे मोमेंट्स बेहद कम है और फिल्म के आखिरी पलो में इसकी कमी महसूस होती है. पौने दो घंटे की अवधि एक समय के बाद बोझ लगने लगती है. हलका को देखकर यही लगता है कि निर्देशक को किसी तरह का ब्रीफ मिला था की ये कुछ चीजें आपके सामने है और इन्ही के दम पर आपको एक फिल्म बनानी है. हल्का एक समझौते वाली फिल्म है. फिल्म से दुर रहने मे ही आपकी भलाई है.

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