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Film Review : मोहल्ला अस्सी की दास्तान निराली है, मनोरंजन के साथ सीख भी देती है फिल्म

इस फिल्म के बारे में यही कहा जा सकता है की सब्र का फल मीठा होता है. जाइये और मोहल्ला अस्सी का दीदार कीजिए, इस मोहल्ले में जीवन के सभी रस मौजूद है

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Updated On: Nov 15, 2018 10:24 PM IST

Abhishek Srivastava

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Film Review : मोहल्ला अस्सी की दास्तान निराली है, मनोरंजन के साथ सीख भी देती है फिल्म
निर्देशक: चंद्र प्रकाश द्विवेदी
कलाकार: सनी देओल, रवि किशन, साक्षी तंवर, सौरभ शुक्ला

देख कर दुख होता है की मोहल्ला अस्सी जैसी फिल्में अक्सर अपने विषयवस्तु की वजह से विवादों में घिर जाती है जिसका खामियाजा दर्शक वर्ग को उठाना पड़ता है. दर्शकों को खामियाजा इसलिए उठाना पड़ता है क्योंकि एक अच्छी फिल्म के अनुभव से उनको हाथ धोना पड़ता है. काफी सालों तक विवादों में घिरे रहने के बाद शुक्र है कि इस हफ्ते मोहल्ला अस्सी के दीदार दर्शकों को हो जायेंगे. कहने की जरुरत नहीं की उनका पाला एक अच्छी फिल्म से पड़ेगा. कुछ महीने पहले आई अनुभव सिन्हा की फिल्म 'मुल्क' ने लोगों को असली बनारस से रूबरू कराने में मदद की थी. मोहल्ला अस्सी के बारे में ये कहा जा सकता है की अगर मुल्क ने आपको बनारस की सैर करवाई थी तो चंद्र प्रकाश द्विवेदी की ये फिल्म आपको बनारस के रूह से आपकी मुलाकात करवाएगी. काशीनाथ की सिंह की कहानी काशी का अस्सी के ऊपर बनी ये फिल्म एक शानदार फिल्म का उदाहरण है.

चंद्र प्रकाश द्विवेदी का शानदार निर्देशन

ये सुनकर काफी अजीब लगता है की मोहल्ला अस्सी को बनाने वाले है चंद्र प्रकाश द्विवेदी जो इसके पहले पिंजर और जेड प्लस जैसी फिल्में बना चुके है. समीक्षको ने दोनों ही फिल्मों की तारीफ जम कर की थी जब ये रिलीज हुई थी लेकिन 15 साल के फिल्मी करियर में बॉलीवुड ने उनको महज दो फिल्मों को ही बनाने का मौका दिया. मोहल्ला अस्सी को देखकर लगता है की उनके साथ किसी तरह की नाइंसाफी हुई है. बनारस की पृष्ठभूमि में बनी ये फिल्म समाज के ऊपर करारा वार करती है. एक धर्म-निरपेक्ष समाज में जब साम्प्रदायिक माहौल के जहर का रिसाव शुरू हो जाता है तब चीज़ो को बदलने में समय नहीं लगता है. फिल्म के आखिर में यह भी बताया गया है की इन सभी चीजों से एक आम आदमी के जीवन में कोई बदलाव नहीं आता है. बदलाव तभी आता है जब वो समय के साथ खुद को सुधारने की कवायद में लग जाता है. इस फिल्म की कहानी के लिए बनारस से शानदार मेटाफर नहीं हो सकता था.

बनारस की ये कहानी निराली है

मोहल्ला अस्सी की कहानी काशी में रहने वाले धर्मनाथ पांडे (सनी देयोल) के बारे मे है जो काशी के तट पर पंडा है और जजमान जो भी दान दक्षिणा उसको पूजा में देते है उसी की बदौलत उसका घर चलाते है. कन्नी (रवि किशन) बनारस का गाइड है जो अपनी होशियारी से बनारस आयें विदेशी सैलानियों को किराये पर घर दिलाकर गाइडिंग के अलावा अपनी अच्छी खासी कमाई कर लेता है. जब एक विदेशी सैलानी को घर दिलाने की बात आती है तो मोहल्ला अस्सी में रहने वाले एक पांडा अपना घर किराये पर देने पर राजी हो जाता है लेकिन ऐन वक़्त पर धर्मनाथ पांडे पुरे मामले मे अपनी टांगे यह कह कर अड़ा देते है की जिन विदेशियों की कोई सभ्यता नहीं होती उनको कोई घर कैसे दे सकता है. इसी बीच जब पूजा पाठ से जब पाडें जी आमदनी कम हो जाती है तब पांडे जी बच्चों को संस्कृत पढ़ना शुरू कर देते है ताकि थोड़ा धन अर्जन और हो सके. लेकिन जब वो काम भी उनके हाथ से छूट जाता है तब विपदा का पहाड़ उनके ऊपर टूट पड़ता है. ये वही समय होता है जब कर सेवको ने अयोध्या की ओर कुच किया था राम मंदिर बनाने के लिए. लेकिन चुनाव के परिणाम के बाद उनको कई चीजो का आखिर में ज्ञान हो जाता है.

फिल्म के सभी कलाकारों का जबर्दस्त अभिनय

मोहल्ला अस्सी में जो भी कलाकार है उनको देखने के बाद ये कहना बेहद मुश्किल है की किस अभिनेता का अभिनय सबसे बेहतर है. फिल्म के सभी कलाकारों ने अपने अभिनय से इस फिल्म में जान डाल दी है. कम शब्दों में कहे तो उनको देखने के बाद यही जान पड़ता है की वो सभी बनारस के ही बाशिंदे है. अगर रवि किशन को देख कर लगता है की वो सचमुच में बनारस के गाइड है तो वही अनुभूति सौरभ शुक्ला, सनी देओल को देख कर होता जो फिल्म में पंडे बने है. फिल्म में साक्षी तंवर भी है जो सनी देओल की पत्नी की भूमिका में है. देखकर दुःख होता है की उनके टैलेंट के ज्यादा ख़रीदार बॉलीवुड में नहीं है. लेकिन शानदार कलाकारों के इस जमावड़े में अगर कोई आपका ध्यान खीचेंगें तो वो है सेवा निवृत प्रिसिंपल गया सिंह की भूमिका में मिथिलेश चतुर्वेदी. चाय के गल्ले में चाय की चुस्की से साथ दुनिया को गरियाने का अंदाज उनका निराला है.

मनोरंजन के साथ साथ यह फिल्म आपको सीख भी देगी

फिल्म देखते वक्त आपको किसी बात की शिकायत नहीं होगी सिवाय फिल्म के आखिर के पलो के दौरान जब ये फिल्म उपदेश देने लगती है. मोहल्ला अस्सी में मनोरंजन के अलावा आपको सीख भी मिलेगी. आपको ये देखने का मौका मिलेगा की साम्प्रदायिक उन्माद जब समाज में घुस जाता है तब वो कितना खतरनाक होता है. २०१५ में यह फिल्म बन कर पूरी तरह से तैयार हो गई थी लेकिन सिनेमा घर का सफर पूरा करने में इसको तीन साल लग गए. इस फिल्म के बारे में यही कहा जा सकता है की सब्र का फल मीठा होता है. जाइये और मोहल्ला अस्सी का दीदार कीजिए, इस मोहल्ले में जीवन के सभी रस मौजूद है.

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