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Review 'Firangi': कपिल से जिस कॉमेडी की उम्मीद थी वो उसमें हुए फेल

पढ़ें कपिल शर्मा की फिल्म 'फिरंगी' का ये मूवी रिव्यू

फ़र्स्टपोस्ट रेटिंग:

Updated On: Dec 01, 2017 04:07 PM IST

Abhishek Srivastava

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Review 'Firangi': कपिल से जिस कॉमेडी की उम्मीद थी वो उसमें हुए फेल
निर्देशक: राजीव धींगरा
कलाकार: कपिल शर्मा, इशिता दत्ता, कुमुद मिश्रा, एडवर्ड सानेनब्लिक

कपिल शर्मा की कॉमेडी का जो स्तर हमने अब तक उनके शो में देखा है उसे देखकर साफ तौर पर ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस फिल्म में कहीं से भी कॉमेडी का वो कमाल नजर नहीं आता. इस फिल्म में भौंडेपन की भरमार है जो कहीं से भी साफ सुथरी नहीं कही जा सकती. जो शब्द आप उनके जोक्स के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं उसे साधारण कैटेगरी में ही रखा जा सकता है.

अलबत्ता उनकी हाजिर जवाबी की टाइमिंग कमाल की है. लेकिन ये भी सच है कि आप टीवी शोज और फिल्मों को एक ही पलड़े पर नहीं रख सकते. फिरंगी में जोक्स तो जरूर हैं लेकिन वन लाइनर्स बेहद ही साधारण हैं जो आपको ज्यादा गुदगुदा नहीं पायेंगे. पीरियड फिल्मों की खास बात ये है कि उनको लेकर हमारे जेहन में उस जमाने के बारे में चीजें बसी होती हैं और उनके साथ ज्यादा छेड़खानी नहीं की जा सकती. लगभग 160 मिनट की ये फिल्म आपके धीरज का इम्तिहान लेती है. कहने की जरुरत नहीं है कि पासिंग मार्क्स मिलने में भी दिक्कत होती है. कपिल शर्मा की इस दूसरी फिल्म को आप बड़े आराम से हाशिये पर रख सकते हैं.

फिरंगी की कहानी सन 1920 की है जब हिंदुस्तान के ऊपर अंग्रेजों का राज था. फिल्म की कहानी मंगतराम (कपिल शर्मा) के बारे में है जिसका ये मानना है कि फिरंगी उतने भी बुरे नहीं हैं जितना लोग उनके बारे में समझते हैं. मंगतराम कुछ काम नहीं करता लेकिन उसके अंदर एक हुनर है और वो है लोगों के पीछे अपने पैर की मार से उनकी बीमारियों को ठीक करना.

जब उसका पाला अंग्रेज अफसर डैनियल (एडवर्ड सानेनब्लिक) से पड़ता है तो वो उसके हुनर से इतना प्रभावित हो जाता है कि उसे वहां अर्दली की नौकरी मिल जाती है. नौकरी मिलने के बाद उसकी कोशिश यही रहती है कि अपनी प्रेमिका सरगी (इशिता दत्ता) को अपनी नौकरी के बल पर रिझाए. सरगी पड़ोस के गांव की रहने वाली है जहां डैनियल और वहां के राजा इंद्रवीर (कुमुद मिश्रा) की योजना है एक शराब की फैक्ट्री लगाने की. गांव मे फैक्ट्री बनाने के लिए डैनियल और इंद्रवीर, मंगतराम की मदद लेते हैं ताकि वो गांव वालों को झांसा देकर उनकी जमीन अंग्रेजों के नाम करवा सकें. आखिरी में जब मंगतराम को अपनी गलती का एहसास होता है तब वो चीजों को ठीक करने में लग जाता है ताकि वो अपनी प्रेमिका की नजरों में गिर ना सके.

आजकल जब बड़े सितारों की 120 मिनट की फिल्में झेलनी मुश्किल हो जाती है तो आप समझ सकते हैं कि कपिल शर्मा की 160 मिनट की फिल्म को झेलना कितना मुश्किल और जटिल काम मेरे लिए रहा होगा. इस फिल्म को रबर की तरह बेवजह खींचा गया है. नतीजा ये निकल कर आया कि कपिल शर्मा जिनके लिए कॉमेडी उनका सबसे बड़ा शस्त्र है, उसके अलावा इमोशंस के हर रंग भरते हुए इस फिल्म में नजर आएंगे जो बेहद अटपटा लगता है.

कपिल को पर्दे पर देख कर ही लगता है कि अपने रोल में वो खुद को असहज महसूस कर रहे है. जिस तरह से मंगतराम का किरदार लिखा गया है वो अपने आप में थोड़ा समझ के परे है. अंग्रेजों के लिए काम करने वाला और उनकी जी हुजूरी करने वाला मुलाजिम अचानक से भारत के स्वाधीनता की आवाज उठाने लगता है ये अजीब लगता है. कपिल, मंगतराम के रोल में किसी भी तरह का असर छोड़ने में नाकामयाब रहे हैे. उनके अभिनय और कॉमेडी का अंदाज बेहद ही साधारण है. कुछ सीन्स में उनका कमाल जरूर दिखाई देता है लेकिन वो बेहद ही कम हैे.

एक भ्रष्ट राजा के रोल में कुमुद मिश्रा काफी जचे हैं. डैनियल के रोल में हैं अमेरिकन अभिनेता एडवर्ड सानेनब्लिक जो इसके पहले कई हिंदी फिल्मों में फिरंगियों के रोल निभा चुके हैं. इतनी सारी फिल्मों के बाद हम एक बात तो कह सकते हैं कि जो जगह बॉब क्रिस्टो के देहांत के बाद खाली हो गई थी, उसकी पूर्ति अच्छी तरह से एडवर्ड ने कर दी है. एक गांधी भक्त के रोल में अंजन श्रीवास्तव काफी जंचे हैं.

देखकर आश्चर्य होता है कि फिल्म के निर्देशक ने स्क्रिप्ट की खामियों को नजर अंदाज कर दिया है. उनका सबसे बड़ा कसूर तो यही है कि उनकी फिल्म की लम्बाई ढाई घंटे के ऊपर है. इस फिल्म के ऊपर लगान का हैंगओवर जरूर नजर आता है लेकिन ये सूरज को दिया दिखाने वाली बात हो जाती है.

कपिल शर्मा की ये दूसरी फिल्म है और अपनी पहली फिल्म 'किस किस को प्यार करूं' में भी वो ओच्छी कॉमेडी के अलावा और कुछ नहीं कर पाए थे. ये बिलकुल साफ है कि टेलीविजन के स्टारडम की आड़ में कपिल फिल्मों में अपनी जगह बनाना चाहते हैं लेकिन कोई उनको ये बताए कि टेलीविजन में काम करना बल्कि यूं कहे की एंकरिंग करना, फिल्मों में एक्टिंग करने के बराबर नहीं होता.

राजीव ढिंगरा इसके पहले पंजाबी फिल्में बना चुके हैं और हिंदी फिल्म जगत में उनकी ये पहली कोशिश है. अगर कपिल शर्मा को इस तरह का रोल उन्होंने ऑफर किया था तो ये उनकी सबसे बड़ी भूल थी. कपिल अपनी इमेज के अब खुद ही गुलाम बन चुके हैं और उनको और किसी रूप में देखने में दर्शकों को परेशानी होगी. आपके दिमाग की सेहत आपके हाथों में है बाकी मर्जी आपकी. और हां कपिल के लिए यही सलाह होगी कि फिल्मों में घुसने की जी तोड़ मेहनत पर लगाम दें, बेहतर होगा कि वो अपने टेलीविजन के करियर को ही आगे बढ़ाएं.

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